न साम्यवाद, न पूंजीवाद, भारतीय मूल्यों पर आधारित तीसरा रास्ता दिखाने वाले

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  • जितेंद्र गुप्त, निवर्तमान अखिल भारतीय अध्यक्ष, लघु उद्योग भारती


श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी, मेरे लिए यह नाम बहुत ही प्रेरणादायक है। मैं बहुत ही सौभाग्यशाली हूं कि उनके साथ मेरा काफी संपर्क रहा। मेरे पिता श्री जगदीश गुप्त भारतीय मजदूर संघ के कार्यकर्ता रहे, उन्हीं के कारण आदरणीय ठेंगड़ीजी से मेरा मिलना जुलना रहा। पिताजी ठेंगड़ीजी को अपना आदर्श मानते थे।

1942 में वह संघ के प्रचारक बने और विभिन्न राज्यों, जहां संघ का कुछ काम ही नहीं था, ऐसे केरल और पश्चिम बंगाल में उन्होंने अपना काफी समय दिया। भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ, अधिवक्ता परिषद, स्वदेशी जागरण मंच ऐसे अनेक संगठनों की प्रारंभिक भूमिका, श्री ठेंगड़ी ने निभाई। 12 वर्ष तक वह राज्यसभा में भी रहे, जहां उन्होंने जनसंघ की आर्थिक दिशा क्या हो, इस पर काफी कुछ लिखा है।

वह हमेशा कहते थे कि समाज में 99.9 प्रतिशत लोग वह होते हैं, जो वर्तमान के हिसाब से चलते हैं। केवल 0.1 प्रतिशत लोगों को अपनी परंपरा, अपने समाज की चिंता होती है। संगठनों में ऐसे लोग जितने बढ़ेंगे, अपना कार्य उतना सरल होगा। श्री रामकुमार भ्रमर की पुस्तक ‘पथिक की पूर्व भूमिका में ठेंगड़ीजी ने कार्यकर्ता के बारे में अच्छा वर्णन किया है।उन्होंने कहा कार्यकर्ता ऐसा होना चाहिए, जैसे हनुमानजी। हनुमानजी का अपना कुछ नहीं गया था, सीताजी से सीधा उनका कोई संबंध नहीं था, फिर भी लंका गए और अपनी पूंछ में आग लगवाई, अत: कार्यकर्ता का मन भी अपने काम के प्रति इसी प्रकार का होगा तो काम में सिद्धता शीघ्र आएगी।

1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ। उनका स्पष्ट मानना था कि यह राष्ट्रीयकरण नहीं, सरकारीकरण है और हम देख रहे हैं कि जो एनपीए बढ़ा है, उसमें सरकारों का बहुत बड़ा हाथ है। ठेंगड़ीजी हमेशा कहते थे- न साम्यवाद, न पूंजीवाद। जो तीसरा रास्ता भारत का है, भारतीय चिंतन का है, हिंदू संस्कृति का है। उसी दृष्टि से उन्होंने कहा कि साम्यवाद खत्म होगा और वह हुआ भी। एक अन्य भाषण में उन्होंने कहा कि 2010 के बाद पूंजीवाद का भी पतन होगा और वर्तमान में आज कोरोना काल में हम उस स्थिति को भी देखते हैं कि हर देश अपने अपने हिसाब से सोच रहा है, डब्ल्यूटीओ के संबंध में।

जब स्वदेशी जागरण मंच का गठन 1991 में हुआ, उस समय भी उनकी भूमिका भारत के प्रति बहुत ही स्पष्ट रही है और आज उन्होंने जो-जो कहा, वह हम सत्य होते देख रहे हैं। ठेंगड़ीजी का व्यक्तित्व इतना बड़ा है कि उनको शब्दों में बांधना बहुत ही मुश्किल है। छोटे -छोटे कार्यकर्ता का भी ध्यान वह किस तरह से रखते थे, भोपाल के प्रवास में, सारे बड़े लोग उनके लिए तैयार रहते थे, लेकिन फिर भी छोटे कार्यकर्ता(दायित्व में) के यहां भोजन करना , उनके साथ बैठना उनका एक बहुत बड़ा गुण था।
राजनीति के बारे में उनका स्पष्ट चिंतन था। एक बार मैं उनसे मिलने उनके निवास नॉर्थ एवेन्यू दिल्ली गया।

उस समय 1998 में मध्यप्रदेश में भाजपा बुरी तरह हारी थी। बातचीत में उन्होंने मुझसे पूछा कि मध्यप्रदेश में भाजपा क्यों हारी? चर्चा उपरांत उनका बड़ा स्पष्ट आकलन था कि किसी भी बड़े व्यक्ति को सीधे चुनाव में उतारना नीचे के कार्यकर्ताओं को बेदखल करना है। किसी भी बड़े को यदि चुनाव लड़ाना है तो उसको ऐसी जगह से चुनाव लड़ाना चाहिए, जहां धरातल पर हमारा कार्य बहुत कम है।

ठेंगड़ी जी जैसा सरल व्यक्तित्व और स्पष्ट चिंतन मैंने अभी तक और देखा ही नहीं। कलकत्ता की कुमार सभा ने उनका सम्मान किया था। वहां उन्होंने बड़ी स्पष्टता से कहा कि हर विजय में पराजय के बीज छुपे होते हैं तथा हर पराजय में विजय के बीज। यदि कार्यकर्ता का मन स्थिर है, तो वह उसे दिखाई देते हैं। स्थिर मन है तो वह यह सब देख सकता है। उनके इस कथन से बहुत ही स्पष्ट होता है कि विजय के समय अति उत्साहित होना उचित नहीं है।

ठेंगड़ीजी 2004 में 14 अक्टूबर को हमारे बीच से गए लेकिन उसके पूर्व भारतीय अर्थनीति और समाज को लेकर उनका जो चिंतन था, वह बहुत सारे प्रकाशनों में आया है। आज उनके जाने के बाद लगभग 17 वर्ष हो गए हैं। उन्होंने बड़ा स्पष्ट कहा था कि हमें अपने देश- परंपरा के आधार पर, एक तीसरा रास्ता चुनना होगा, जिसमें प्रकृति, पर्यावरण तथा मानव का समन्वय हो, वही इस देश-दुनिया का भला कर सकेगा। उनके जन्मदिवस पर इतना ही कहना उचित होगा कि उन्होंने हमारे देश के लिए जो रास्ता दिखाया है, हम उस पर अपने-अपने सामर्थ्य से बढ़ेंगे तो हम जिस चिंतन और परंपरा के लिए कार्य कर रहे हैं, शीघ्र ही यशस्वी होंगे।

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