करोड़ों लोगों की सुनवाई करने के लिए सुसंगत नीति की आवश्यकता

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– सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या सौ गुना बढ़ाएं, तब भी सब मामलों का निराकरण संभव नहीं

सर्वोच्च न्यायालय के जजों की संख्या सौ गुनी बढ़ा दी जाए, अर्थात 31 के स्थान पर 3100 कर दी जाए, तो भी वे सभी मिलाकर कुल 3200000 लोगों के मामलों का ही निराकरण कर पाएंगे। पर आवश्यकता तो 138 करोड़ लोगों के मामलों का निराकरण करने की है। इसलिए स्पष्ट है कि जजों की संख्या बढ़ाना कोई उपाय नहीं है।

  • ओमप्रकाश सुनरया

मीलॉर्ड, कृपया ध्यान दें। हमारे सर्वोच्च न्यायालय का प्रारंभ 28 जनवरी 1950 को हुआ। उस समय उसमें एक मुख्य न्यायाधीश मिलाकर कुल 8 न्यायाधीश थे। सुबह 10:00 से 12:00 और बाद में दो से चार कुल 4 घंटे ही दिन भर में बैठते थे। प्रारंभ के वर्षों में एक वर्ष में कुल 28 दिन ही सर्वोच्च न्यायालय की सिटिंग होती थी। उस समय भारत की जनसंख्या लगभग 36 करोड़ थी। कानून के अनुसार अत्यंत छोटे बच्चों से लेकर मूर्तियां, कंपनियां और कारपोरेशन सभी सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखने के लिए जा सकते थे। इसलिए यदि ऐसा मान लें कि कुल 36 करोड़ लोग वर्ष में एक बार तो अपने विवाद को सुलझाने या अपने अधिकारों का संरक्षण करने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाते, तो कम से कम 5 मिनट तो सर्वोच्च न्यायालय हर एक व्यक्ति को देता।

न्यायालय को प्रत्येक मामले को पहले समझना पड़ता है, फिर सुनना पड़ता है, सुनने के पश्चात विचार करना पड़ता है मन में निर्णय बनाना पड़ता है, फिर उस निर्णय को लिखाना पड़ता है, लिखे हुए निर्णय को जांचना पड़ता है। इसलिए हर व्यक्ति के मामले को समझने, सुनने और निर्णय सुनाने तक लगभग आधा घंटा तो सर्वोच्च न्यायालय को देना ही पड़ता। इसका अर्थ है कि 36 करोड़ लोगों के मामलों को सुलझाने के लिए लगभग 18 करोड़ घंटे सर्वोच्च न्यायालय को चाहिए थे। पर सर्वोच्च न्यायालय वर्ष में केवल 28 दिन बैठता था और प्रतिदिन केवल 4 घंटे की सिटिंग होती थी ।

इस प्रकार 28 म 4 बराबर 112 घंटे कुल सर्वोच्च न्यायालय के पास वर्ष भर में थे। कुल पूंजी 112 घंटों की और आवश्यकता 180000000 घंटों की! न तो हमारे संविधान निर्माता नासमझ थे और न ही उस समय के हमारे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश नासमझ थे। संविधान के सर्वोच्च न्यायालय संबंधी प्रावधानों का ठीक से अध्ययन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि सर्वोच्च न्यायालय सारे भारतीयों के सारे मामलों की सुनवाई के लिए बनाया ही नहीं गया है।


अब सर्वोच्च न्यायालय में जजों की संख्या 31 हो गई है। उनके सुनवाई के घंटे भी थोड़ा सा बढ़ गए हैं। सुनवाई के दिन भी लगभग 190 हो गए हैं। यदि ऐसा मान ले कि औसतन 10 बेंच प्रतिदिन सुनवाई करती हैं। होमवर्क को मिलाकर प्रतिदिन करीब 8 घंटे प्रत्येक न्यायाधीश काम करता है। वर्ष में लगभग 200 दिन ऐसा काम होता है। तो वर्ष भर में कुल 16000 घंटे सर्वोच्च न्यायालय के पास मामलों का निर्णय करने के लिए रहते हैं। जैसा कि पहले हम देख चुके हैं कि यदि प्रत्येक मामले को न्यूनतम आधे घंटे भी दिया जाए तो अधिक से अधिक 32000 व्यक्तियों के मामलों को सर्वोच्च न्यायालय वर्ष भर में निपटा सकता है। पर अभी तो भारत की जनसंख्या 138 करोड़ है। इसलिए पूंजी कुल 32000 की और आवश्यकता 138 करोड़ की। इसलिए यह दिन के प्रकाश की तरह स्पष्ट है कि व्यावहारिक दृष्टि से यह असंभव है कि सुप्रीम कोर्ट सभी व्यक्तियों के सभी मामलों को निपटा सके।

यदि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की संख्या सौ गुनी बढ़ा दी जाए, अर्थात 31 के स्थान पर 3100 कर दी जाए, तो भी वे सभी मिलाकर कुल 3200000 लोगों के मामलों का ही निराकरण कर पाएंगे। पर आवश्यकता तो 138 करोड़ लोगों के मामलों का निराकरण करने की है। इसलिए स्पष्ट है कि जजों की संख्या बढ़ाना कोई उपाय नहीं है। फिर यह भी विचार करने योग्य है कि क्या 3100 जजों वाला सर्वोच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय रह जाएगा। आए दिन, बल्कि एक ही दिन में कई बार ऐसी स्थितियां बन सकती हैं, जब सर्वोच्च न्यायालय की एक बेंच दूसरी बेंच के प्रतिकूल निर्णय दे रही है!

एक सामान्य गृहिणी और एक सामान्य गृहस्थ अच्छी तरह से जानता है कि जितनी चादर हो, उतना ही पैर पसारना चाहिए। किसान हो या व्यापारी, विद्यार्थी हो या कर्मचारी, या इंजीनियर हो या वैज्ञानिक सभी यह देखते हैं कि उनका लक्ष्य क्या है और उनके पास उपलब्ध संसाधन क्या है? उसी के आधार पर अपनी योजना बनाते हैं, नीति निर्धारण करते हैं, और फिर क्रियान्वयन का काम शुरू करते हैं। कितने दुख और आश्चर्य की बात है कि हमारे सर्वोच्च न्यायालय ने करोड़ों लोगों में से वह किसको सुनेगा इसकी कोई नीति बनाई ही नहीं। परिणाम यह निकला कि हर न्यायाधीश ने अपनी रुचि, प्रकृति और सुविधा के अनुकूल मामलों को सुना।

138 करोड़ लोगों में से 99 प्रतिशत भारतीयों की तो हैसियत ही नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय में खर्च करने के लिए समय और धन लगा सकें। जो समय और धन लगा सके, उनकी सुनवाई हो गई। यह तो बिल्कुल अशोभनीय है, गरिमाहीन है। समता के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है। संवैधानिक, सभ्य और शालीन व्यवहार यह होता कि विधिवत एक नीति बनाई जाती और उस नीति का कड़ाई से पालन होता। अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के जैसे एक स्क्रीनिंग कमेटी बनाई जाती, जो दरवाजे पर ही अनुपयुक्त मामलों को वापस कर देती।

अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 136 के भयानक दुरुपयोग के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने ही अपने ही फैसलों में उल्लेख किया है। आज किसी भी दिन सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष की कार्य सूची का अवलोकन करें, तो यह स्पष्ट होगा कि 90 से 99 प्रतिशत मामले अनुच्छेद 32 या अनुच्छेद 136 के अंतर्गत ही हैं । जबकि संविधान में इन अनुच्छेदों का समावेश अत्यंत अपवाद स्वरूप परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा हस्तक्षेप किए जाने के संबंध में ही किया गया था।

अनुच्छेद 136 के संबंध में पृथक से सर्वोच्च न्यायालय ने कोई नीति के निर्धारण भले ही न किया हो, परंतु अपने निर्णयों में बार-बार सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात को रेखांकित किया है कि इस अनुच्छेद के अंतर्गत शक्तियों का प्रयोग केवल अत्यंत अपवाद स्वरूप परिस्थितियों में ही किया जाना है । पर सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय का, सर्वोच्च न्यायालय ने ही बार-बार उल्लंघन किया है,बिना ओवर रूल किए किया है ।इस बात का उल्लेख स्वयं सर्वोच्च न्यायालय के ही एक निर्णय में आया है।

सर्वोच्च न्यायालय की दैनिक कार्य सूची में 80 से 90 प्रतिशत मामले अनुच्छेद 136 के अंतर्गत पाए जा सकते हैं। ये सीधा-सीधा सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन तो है ही, संविधान के अनुच्छेद 141 का भी उल्लंघन है और वह उल्लंघन भी स्वयं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा। सर्वोच्च न्यायालय की भीड़ बढऩे का यह एक प्रमुख कारण है।

प्रथम लॉ कमीशन ने ही इस दुरुपयोग के संबंध में चेताया था। इस दुरुपयोग से स्वयं सुप्रीम कोर्ट की कार्य क्षमता घटी है। उच्च न्यायालय का महत्व घटा है । मामलों के निराकरण की गति कम हुई है । अनगिनत मामले बिना किसी पर्याप्त कारण के केवल अनुच्छेद 136 के गलत प्रयोग के कारण लटके रहते हैं। निर्भया का प्रसिद्ध केस भी इस अनुच्छेद 136 के गलत प्रयोग के कारण इतना लंबा खींचा था।


जिस जनहित याचिका (पीआईएल) की बड़ी संजीवनी की तरह शुरुआत की गई थी, सभी जानते हैं कि कितना भयानक दुरुपयोग उसका हो रहा है। इसका संविधान में कोई उल्लेख नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 32 के संबंध में कोई नीति का निर्धारण सर्वोच्च न्यायालय ने नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने प्रारंभिक फैसले में ही सबको सीधे सर्वोच्च न्यायालय आने की छूट दे दी जबकि ऐसी छूट पर अनुच्छेद 136 के मामले में रोक लगा दी।

वास्तव में पूर्व वर्णित व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण सर्वोच्च न्यायालय में सीधे आने की परिस्थितियां अपवाद स्वरूप ही रहना चाहिए। पर अनुच्छेद 32 में तो कोई बंधन है ही नहीं। जहां 136 में बंधन है, अभी उसका भी कोई पालन नहीं हो रहा। इसे देखने, समझने व सुधारने की जिम्मेदारी सर्वोच्च न्यायालय की नहीं तो और किसकी है?

अनुच्छेद 32 के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय को संविधान के अनुरूप एक सुनिश्चित नीति का निर्धारण करना होगा। सर्वोच्च न्यायालय के ही निर्णयों के द्वारा अनुच्छेद 136 के संबंध में जो नीति निर्धारित की गई है, उसका कड़ाई से पालन करना होगा। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सतत सतर्कता, दृढ़ता और हिम्मत दिखाये जाने पर बिल्कुल आश्चर्य नहीं होगा कि 80 से 90 प्रतिशत मामले सुप्रीम कोर्ट की भीड़ में से कम हो जाए।
(लेखक पूर्व न्यायाधीश व विधि के प्राध्यापक हैं।)

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