मध्यप्रदेश के वनांचलों में राष्ट्रबोध और स्वाधीनता चेतना

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  • रंजना चितले, कथाकार व स्तंभकार

देश में जहां कहीं भी स्वाधीनता का युद्ध हुआ उसका अधिकांश अप्रत्यक्ष परिणाम मध्यप्रदेश ने सहा है। इस धरती के जनजाति वीरों ने संघर्ष की कभी प्रत्यक्ष कमान संभाली तो कभी अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग दिया। यातनाएं सहीं, प्रताडऩाएं भोगी लेकिन मोर्चे पर डटे रहे। जनजातियों का शौर्य और बलिदान स्वाधीनता के हर मोर्चे पर सतत चला है।

यह 1857 के पहले, प्रथम स्वाधीनता संग्राम और 1942 की अंतिम लड़ाई में ही नहीं उससे पूर्व भी रहा। जनजातियों का संघर्ष अपने साम्राज्य विस्तार के लिए अकबर द्वारा किए गए दमन में भी हुआ और इससे सैकड़ों साल पहले शकों के आक्रमण के शिकार भी इस प्रदेश के वनवासी हुए और वनवासियों की ही संगठित शक्ति से विक्रमादित्य ने शकों को खदेड़कर सिंधुनद तक धकेला था।

जनजातीय शौर्य की यह दास्तान अंग्रेजों के विवरणों से मिलती हैं। जबलपुर का अंग्रेज कमाडेंट 24 अप्रैल 1818 को एक पत्र नागपुर के रेजीडेंट जेकिन्स को लिखता है। (मध्यप्रदेश में स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास प्रधान संपादक द्वारिका प्रसाद मिश्र की पुस्तक में उल्लेखित) सिवनी, छपारा और अड्डा गांव से मिलने वाली सूचनाओं से यह प्रकट होता है कि गोंड़ और अप्पा साहब के अनुयायी प्रतिदिन सशक्त होते जा रहे हैं। वस्तुत: अप्पा साहेब उस जमाने में नागपुर के शासक थे लेकिन उनकी असली ताकत मध्यप्रदेश के गोंड आदिवासी थे। अंग्रेजों की कैद से पलायन के बाद अप्पा साहेब भौंसले ने लगभग 24 वर्ष मध्यप्रदेश के वन अंचलों में ही बिताए।

वे 12 मई 1818 को अंग्रेजों की कैद से जबलपुर के समीप वनवासी क्षेत्र में पहुंचने में सफल हुए। उनकी तलाश में अंग्रेजों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। मध्यप्रदेश के गोंड जनजाति योद्धा न तो आतंक से डरे और न लालच में आए। उन्होंने अप्पा साहेब को शरण दी अंग्रेजों से लोहा लिया और आतंक भी सहा। वनवासियों के शौर्य की गाथा बैतूल के जंगलों में भी मिलती है। जुलाई 1818 में बैतूल स्थित कैप्टन स्पार्क अपनी एक टुकड़ी के साथ जंगलों में गया। उसकी टुकड़ी में तीन हजार सिपाही थे। उसे सूचना मिली थी कि अप्पा साहेब भौसले जंगल में हैं। इस टुकड़ी ने पहले आतंक मचाया बाद में वनवासियों ने इस पूरी टुकड़ी को मेलघाट, भैंसदेही, आमला, सावनेर और मुल्ताई के जंगलों में घेरकर मार डाला।

1857 में अंग्रेजों के विरुद्ध जो लड़ाई झांसी, कानपुर और मेरठ में लड़ी गई। पराजय के बाद सभी स्वतंत्रता सैनानी मध्यप्रदेश के जंगलों में शरण लेने आए। शिवपुरी से सागर तक और चंदेरी से नीमच तक समस्त वनांचल स्वाधीनता सैनिकों से भर गया जिन्हें वनवासियों ने आश्रय दिया और छुपाया इनकी तलाश में अंग्रेजों की फौजों ने सारे जंगल उजाड़े, वन ग्रामों में आग लगा दी लेकिन किसी भी वनवासी ने विश्वासघात नहीं किया।
झाबुआ के टंट्या भील ने जीवन भर अंग्रेजों से संघर्ष किया और लगभग बीस सालों तक अंग्रेजों की पुलिस को छकाया। वह भी गद्दारी के आधार पर ही मारा गया पराजित नहीं हुआ।

1857 में ही मालवा की समस्त क्रांति जिसका नेतृत्व भले ही शहजादा फिरोज, बख्तावर सिंह या किन्हीं और नायकों ने किया हो लेकिन असली मोर्चा मालवा के भीलों ने लिया, उन्हीं के सर्वाधिक प्राण गए किन्तु इतिहास की पुस्तकों में उनका उल्लेख यदा कदा ही मिलता है। 1857 के विप्लव में लगभग 3200 भील सैनिक केवल राष्ट्रचेतना के आधार पर ही युद्ध कर रहे थे। जिसका खामियाजा उन्हें इस क्रांति की असफलता के बाद 1862 तक भुगतना पड़ा।

मध्यप्रदेश के वनअंचलों में स्वतंत्रता संघर्ष की आग कभी ठंडी नहीं हुई। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सिवनी या बैतूल जिलों में पुलिस की गोली से प्राण देने वाले अधिकांश वनवासी ही थे। और फिर 1947 के बाद भोपाल रियासत को भारतीय गणतंत्र में विलीन करने के आंदोलन के दौरान भौंरासा में हुए गोलीकांड में बसंत पंचमी को होने वाले चार में दो शहीद वनवासी ही थे। इतिहास में इसका शायद ही कहीं उल्लेख हो लेकिन जनजातियों की स्वाधीनता चेतना राष्ट्रबोध और आरंभिक संघर्ष ने ही आगे चलकर स्वाधीनता संग्राम का स्वरूप लिया।

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