Home लेख नागपंचमी आज : भारतीय समाज जीवन का हिस्सा थे नाग

नागपंचमी आज : भारतीय समाज जीवन का हिस्सा थे नाग

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  • नारायण व्यास, वरिष्ठ पुरातत्ववेत्ता

हमारे यहां नाग पूजा प्राचीन समय से चली आ रही है। साहित्य में वर्णन मिलता ही है। पुरातत्व के दृष्टिकोण से देखें तो नाग प्रतिमाएं ईसा पूर्व से मिलती है। ये प्रतिमाएं मानव एवं नागस्वरूप में भी मिलती है। महाभारत का जनमेजय का नाग यज्ञ प्रसिद्ध है। रामायण महाभारत में शेषनाग के अवतार लक्ष्मण एवं बलराम को मानते हैं।

पहली शताब्दी से तीसरी शताब्दी के मध्य नाग जाति के लोग ग्वालियर, विदिशा क्षेत्र में थे। इनकी राजधानी पद्मावती वर्तमान पवाया थी जो ग्वालियर के निकट थी। ये लोग भारशिव नाग कहलाते थे। शिव भक्त होते थे,हमेशा कंधे पर शिवलिंग ले जाया करते थे। इनमें लगभग बारह शासक हो चुके हैं। इनमें प्रसिद्ध भवनाग तथा अमर नाग थे। इनके तांबे के सिक्के विदिशा सांची क्षेत्र में मिलते हैं। जहां इनका क्षेत्र था नाग प्रतिमाएं स्थापित करते थे। सांची, फिरोजपुर, गुलगांव, नागोरी में वर्तमान में भी ये प्रतिमाएं देखी जा सकती है।

नागोरी सांची के निकट ग्राम का नाम वहां पहाड़ी पर रखी मानवकद नाग प्रतिमा से हुआ हैं। कुछ प्रतिमाएं सांची संग्रहालय में भी रखी है। दसवीं ग्यारहवीं शताब्दी के कयी मंदिरों का प्रवेश द्वार नाग शाखा के नाम से जाना जाता है। उसमें निचले भाग में नाग युग्म को नमस्कार मुद्रा में यानी अंजलि मुद्रा में बनाया जाता है।

भोपाल के आसपास ग्रामों में भी नाग प्रतिमा के भग्न अवशेष मिलते हैं। देवरी के निकट गोरखपुर ग्राम के तालाब के किनारे पूजा स्थल पर बहुत सुन्दर नाग प्रतिमा लगी हुई है। वर्तमान में आसपास ग्रामों में प्रवेश द्वार के दोनों ओर नागपंचमी के चित्र बनाएं जाते हैं। नागपंचमी प्रतिवर्ष श्रावण मास में शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है।

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