मोहन भागवत का सामयिक सुझाव

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  • मुसलमानों को डराया गया है, उन्हें भय से निकलना चाहिए


भारतीय मुसलमान जिनकी जनसंख्या एक करोड़ 60 लाख के आसपास है, को डरने की जरूरत नहीं है। जैसे भारत में दूसरे अल्पसंख्यक अपने आप को सुरक्षित महसूस करते हैं, वैसे ही उनकी स्थिति होनी चाहिए।

  • मोहम्मद नासिर

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत के संबोधन का स्वागत किया गया है। यह भारतीय संविधान के प्राथमिक सिद्धांतों को पुनस्र्थापित करता है। जो विभिन्न विश्वासों में समानता, सर्वसमावेशी भाव और ही परस्पर समभाव पर आधारित हैं। उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों की एकता के तीन आधार बिंदुओं पर जोर दिया-एक मातृभूमि, एक परंपराएं और एक पूर्वज। श्री भागवत का भाषण इन उभरते हुए मिथकों से पैदा भय को दूर करने का प्रयास था कि इस्लाम खतरे में है और संघ अल्पसंख्यकों के खिलाफ है। यदि गुमराह अनुयायी अपने नेताओं के भरोसे रहते हैं तो इनसे भ्रमित होने की काफी गुंजाइश है।

भागवत के पहले संघ के सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल भी कह चुके हैं कि भारतीय मुसलमान जिनकी जनसंख्या एक करोड़ 60 लाख के आसपास है, को डरने की जरूरत नहीं है। जैसे भारत में दूसरे अल्पसंख्यक अपने आप को सुरक्षित महसूस करते हैं, वैसे ही उनकी स्थिति होनी चाहिए। मुसलमान डरे हुए हैं इसका क्यों इतना हल्ला मचाया जाता है। इतिहास को देखें तो मुसलमान कभी बहुसंख्यक नहीं रहे लेकिन उनकी राजनीतिक शक्ति उनकी संख्या के अनुपात में ज्यादा रही है। उदाहरण के लिए ब्रिटिश उपनिवेश हैदराबाद में मुस्लिमों की जनसंख्या 12% थी और वे अल्पसंख्यक नहीं माने जाते थे लेकिन शासन में उनकी अच्छी खासी आवाज थी।

किसी भी लोकतांत्रिक देश में जो व्यक्तिगत आजादी और सुशासन के मूल्यों पर चलता हो, अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के सशक्तिकरण की बजाय उनकी संख्या नहीं गिनी नहीं जाती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पिछले साल दिए गए अपने भाषण में सशक्तिकरण के ही विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला था, जैसे महिलाओं की शिक्षा, आर्थिक स्वावलंबन, रोजगार और उद्यमिता। भारतीय मुसलमान शांतिपूर्ण सहअस्तित्व और मिली-जुली संस्कृति की महत्ता को समझते हैं और वे राष्ट्रीय सीमाओं को धर्म के आधार पर बांटने का परिणाम जानते हैं।

पाकिस्तान में धर्म को एकता का आधार बताया गया था लेकिन 1971 में वह देश के विभाजन को नहीं रोक सका। अरब देशों में भी एक भाषा, एक सभ्यता और एक धर्म है लेकिन वे सब भी राष्ट्रीय एकता का आधार नहीं बन सके। भारतीय संविधान के निर्माता जानते थे कि भारत की विविधता में एकता का भौगोलिक आधार भी है। यहां विविधता की बहुत गुंजाइश है और इस अनेकता में एकता की भावना निहित है। इस विविधता से ही इतिहास को गलत ढंग से व्याख्या करने, विभाजन और विदेशी आक्रमण की स्थितियां पैदा हुईं। धार्मिक सहिष्णुता और मिली-जुली संस्कृति इस खाई को पाटती है। भागवत ने इस बात पर जोर दिया है। उन्होंने राष्ट्रीय एकता के लिए संवाद बनाए रखने के महत्व को रेखांकित किया है।

उन्होंने इस राष्ट्रीय एकता में राजनीति की भूमिका को गौण बताते हुए सुझाव दिया कि राजनीति को इससे परे रखना चाहिए। उन्होंने कहा है कि यहां राजनीति लोगों को जोडऩे का आधार नहीं हो सकती। एकता को तोडऩे का हथियार जरूर बन सकती है। भागवत की की टिप्पणी की पहली आलोचना राजनीतिकों की तरफ से ही आई। असदुद्दीन ओवैसी ने हिंदुत्व के विचार को मुसलमानों पर अत्याचार का कारण बताया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उप कुलपति तारिक मंसूर ने भागवत के इस सद्भावपूर्ण विचार का स्वागत किया और कहा कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय इसका एक मंच हो सकता है। 19वीं शताब्दी के समाज सुधारक सर सैयद अहमद खान ने उपनिवेशवादी भारत में इसी मंशा से मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना की थी।
(लेखक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं। लेख साभार)

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