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मोदी सरकार और देश की सुदृढ़ अर्थव्यवस्था

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  • मनमोहन सरकार की गलतियों का बोझ भी उठा रही यह सरकार

मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां देश के हित में साबित हो रही है। लेकिन राज्यों में छोटे और मझले व्यापारियों के हित में भी राज्य सरकारों को अर्थव्यवस्था के मामलों में आईएएस अधिकारियों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए , बल्कि ऐसे विषयों पर पकड़ रखने वाले अशासकीय विद्वानों, नागरिकों, व्यापारियों , उपभोक्ताओं से भी विचार करके नीतियां कानून बनाना चाहिए , जो ज्यादा लाभदायक होगा।

  • डॉ. विश्वास चौहान

वैसे तो मैं लॉ प्रोफेसर हंू, लेकिन आर्थिक वित्तीय विवाद भी कोर्ट में ही उलझाए सुलझाए जाते हैं क्योंकि ये विवाद ये आर्थिक नीतियां विधि के विद्यार्थियों को पढ़ाना भी होती हैं, इसलिए थोड़ी रुचि इस क्षेत्र में रही है।

भारतीय लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था का महत्व

चूंकि भारतीय लोकतंत्र में सत्ताओं का उद्भव-पतन चुनावों पर निर्भर करता है, वहीं चुनाव में सफलता के दो मापदण्ड होते हैं-एक विचारधारा दूसरा विकास। चूंकि विकास के मूल में ‘सुदृढ़ अर्थव्यवस्था’ एक महत्वपूर्ण कारक होती है इसलिए विपक्ष के राजिनीतिज्ञों द्वारा सदैव सत्तापक्ष की आर्थिक नीतियों को कटघरे में खड़ा किया जाता है। लेकिन आजकल मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष विवश होकर मूक बना हुआ है क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था की दिशा सही है। हम कुछ बिंदुओं से इसे जांच सकते हैं।

भ्रष्ट व्यापारियों से वसूली

देश के विभिन्न बैंकों का पैसा लेकर भागे भगोड़ों के बारे में प्रवर्तन निदेशालय ने बड़ी जानकारी दी है। इसमें बताया गया है कि विजय माल्या, नीरव मोदी, मेहुल चौकसी की संपत्ति जब्त करने के साथ-साथ इसके कुछ हिस्से को केंद्र सरकार और पब्लिक सेक्टर्स बैंक को स्थानांतरित भी किया गया है। प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी ने विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चौकसी की कुल 9371.17 करोड़ की संपत्ति जब्त कर सरकारी बैंकों को दे दी है। इसमें से 8441 करोड़ की संपत्ति अब तक स्थानांतरित की गई है। वहीं इससे पहले कोर्ट के ऑर्डर के बाद 25 जून को 800 करोड़ की संपत्ति ट्रांसफर की गई थी। इस तरह अब तक कुल 9371.17 करोड़ रुपये की संपत्ति बैंकों को सौंपी जा चुकी है।

विदेशी ऋण एवं जीडीपी की स्थिति

मार्च 2014 के अंत में भारत का विदेशी ऋण 440.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर था, एवं विदेशी ऋण-जीडीपी अनुपात (यानि कि जीडीपी की तुलना में विदेशी ऋण का प्रतिशत) 23.3 प्रतिशत था। उस समय कुल विदेशी मुद्रा भंडार 304.2 बिलियन डॉलर था। यानी कि विदेशी मुद्रा भंडार से अधिक विदेशी ऋण। दिसंबर 2020 के अंत में, भारत का विदेशी ऋण 563.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर था,और विदेशी ऋण-जीडीपी अनुपात 21.4 प्रतिशत था; कुल विदेशी मुद्रा भंडार 579 बिलियन डॉलर था। यानी विदेशी ऋण से अधिक विदेशी मुद्रा भंडार था। यह आंकड़े 31 मार्च 2021 के अनुसार है एवं वित्त मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध है। दूसरे शब्दों में, मोदी सरकार के समय में ना केवल विदेशी ऋण कम हुआ है, बल्कि भारत की वित्तीय स्थिति सुदृढ़ हुई है।

पूर्व की सरकार की नीतियां

हम सभी ने यह समाचार पढ़ा ही होगा कि कैसे कांग्रेस की सरकार ने लाखों करोड़ रुपये की उधारी (ऑयल बांड्स) के द्वारा पेट्रोल की कीमत को कृत्रिम रूप से कम रखा। कांग्रेस सरकार द्वारा 10-12 वर्ष पूर्व लियेे गये ‘सस्तेÓ तेल का भुगतान आज की पीढ़ी को अक्टूबर 2021 से मार्च 2026 तक करना होगा। उधार पर धंधा करने का मतलब यह होता है कि आने वाली सरकार और आने वाली पीढिय़ां उस कर्ज को चुकाती फिरेंगी, जिससे वे निवेश नहीं कर पाएंगे और उन पीढिय़ों के विकास में बाधा आएगी।

मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने आते ही वाजपेयी सरकार के आर्थिक सुधारों को दरकिनार कर दिया तथा दो ऐसे कदम उठाए गए जिसने भारत की अर्थव्यवस्था का बंटाधार कर दिया था। पहला, कांग्रेस सरकार ने वित्तीय अनुशासन को भंग कर दिया, बजट का घाटा बढ़ता गया, महंगाई बढ़ती गई और विकास दर से अधिक हो गयी। अगर महंगाई की दर विकास दर से अधिक हो जाए तो इसका अर्थ यह है कि आप और गरीब हो रहे हैं।

कहने के लिए देश विकास कर रहा है लेकिन महंगाई से आपकी होने वाली आय पहले की तुलना में कम हो गई। महंगाई से अभिजात्य वर्ग को लाभ मिलता है क्योंकि उन्होंने अगर 100 करोड़ लोन का लिया था तो 10 प्रतिशत महंगाई दर के कारण एक वर्ष में उसकी वैल्यू 90-91 करोड़ रह जाती है, जबकि बढ़ी हुई कीमत के नाम पर वे आपसे अधिक दाम वसूलते हैं। रियल स्टेट इस का जीता जागता उदाहरण है।

मनमोहन सरकार में बैंकों ने एकाएक लापरवाही से बिना किसी प्रामाणिक आधारों के ऋण देना शुरु कर दिया। वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में बैंकों द्वारा ऋण देने की दर 18 प्रतिशत के आसपास थी लेकिन कांग्रेस सरकार के पहले वर्ष में यह दर 31 प्रतिशत उसके बाद 37 प्रतिशत थी। तदोपरांत ऋण देने की दर लगातार काफी अधिक रही। ऐसे ऋण दिए गए जिनके चुकने की कोई आशा नहीं थी। यहां तक की ऋण चुकाने के लिए भी ऋण दिए गए। ऐसे सारे ऋण मोदी सरकार की झोली में एनपीए या खराब लोन के रूप आ गिरे।

वास्तव में, यह सारे ऋण मनमोहन सरकार ने आने वाले पीढ़ी के लिए छोड़े। कारण यह है कि मोदी सरकार यह ऋण ‘अपनी’ जेब से नहीं चुका रही है। पिछली पीढ़ी के इस उधार, एनपीए या खराब लोन को आज की पीढ़ी पर कर लगाकर ही चुकाया जा रहा है। भारतीय सभ्यता में परिवार के वरिष्ठ सदस्य फल का पेड़ लगाते हैं जिससे आने वाली पीढ़ी उस फल को खा सके। मनमोहन नीच कांग्रेस सरकार ने तो परिवार के वरिष्ठ सदस्यों द्वारा लगाए गए फल के पेड़ काटकर, उसकी लकड़ी जलाकर अपने तथा अपने मित्रों के भोजन को गर्म रखा।

कुल मिलाकर केंद्र की मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां देश के हित में साबित हो रही है। लेकिन राज्यों में छोटे और मझौले व्यापारियों के हित में भी राज्य सरकारों को अर्थव्यवस्था के मामलों में आईएएस अधिकारियों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए , बल्कि ऐसे विषयों पर पकड़ रखने वाले अशासकीय विद्वानों, नागरिकों, व्यापारियों, उपभोक्ताओं से भी विचार करके नीतियां कानून बनाना चाहिए, जो ज्यादा लाभदायक होगा।

(लेखक म.प्र. निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग के प्रशासनिक सदस्य हैं।)

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