Home लेख सहशिक्षा बन्द खिड़कियां खोलने की सार्थक दिशा

सहशिक्षा बन्द खिड़कियां खोलने की सार्थक दिशा

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ललित गर्ग, वरिष्ठ पत्रकार
lalitgarg11@gmail.com

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के सदर अरशद मदनी का एक विरोधाभासी बयान चर्चा में हैं। उनका यह बयान कि लड़कियों और लड़कों की शिक्षा अलग-अलग होनी चाहिए, एक प्रतिगामी विचार तो है ही, भारतीय संविधान की मूल भावना के भी खिलाफ है। जब हम नया भारत, सशक्त भारत बनाने की ओर अग्रसर हो रहे हैं, ऐसे समय में इस तरह के संकीर्ण विचारों की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

आज जब अफगानिस्तान में तालिबान के काबिज होने के साथ अफगानी बच्चियों और औरतों के भविष्य को लेकर जब पूरी दुनिया चिंता में डूबी हुई है, तब ऐसे विसंगतिपूर्ण बयानों को कोई भी हिन्दुस्तानी खारिज ही करेगा। एक मंजिल, एक रास्ता और एक दिशा- फिर समाज एवं राष्ट्र को बनाने वाली दो शक्तियां आगे-पीछे क्यों चले? क्यों इन मूलभूत शक्तियों के मिलन-प्रसंग, साथ-साथ चलने में संकीर्णता की बदली ऊपर लाई जाती है? क्यों दो हाथ मिलने की बात को ओट में छिपाने की वकालत की जाती है?

इक्कीसवीं सदी के भारतीय समाज ने सोच के स्तर पर भी लंबा सफर तय कर लिया है। देश के सभी वर्गों की बेटियां आज मुख्यधारा में शामिल हो तरक्की की नई-नई इबारतें लिख रही हैं। ऐसे नये बनते भारत में सहशिक्षा की सफलता के नये मुकाम भी हासिल हो चुके हैं, फिर क्यों अरशद मदनी लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग स्कूल-कॉलेज खोले जाने का आलाप जप रहे हैं। इसलिए केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने मदनी को उचित याद दिलाया है कि भारत शरीयत से नहीं, बल्कि संविधान से संचालित एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है, और भारतीय संविधान ने अपनी बेटियों को बेटों के बराबर सांविधानिक अधिकार दिए हैं। एक नागरिक के तौर पर अपने बेहतर भविष्य के लिए वे हर वह फैसला कर सकती हैं, जो इस देश के लड़कों को हासिल है।


भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में एवं प्रगतिशीलता के युग में लड़के और लड़कियों को अलग-अलग शिक्षा देने जैसी बातें अपरिपक्व एवं संकीर्ण सोच की परिचायक हैं। क्यों स्त्री को दूसरी श्रेणी का नागरिक माना जाता है, जबकि स्त्री की रचनात्मक ऊर्जा का उपयोग व्यापक स्तर पर देश के समग्र विकास में हो रहा है। जिन समुदायों में आज भी स्त्री को हीन और पुरुष को प्रधान माना जाता है और इसी मान्यता के आधार पर परिवार, समाज और राष्ट्र के विकास में स्त्री एवं पुरुष की समान हिस्सेदारी नहीं होती, उन समुदायों को अपनी सोच की अपूर्णता पर विचार करना चाहिए, सोच को व्यापक बनाना चाहिए। ‘एक हाथ से ताली नहीं बजती ‘ , ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, ‘अकेली लकड़ी, सात की भारी आदि कुछ कहावतें हैं, जो स्त्री-पुरुष समानता की श्रेष्ठता को प्रमाणित करती हैं।

स्त्री और पुरुष जब तक अकेले रहते हैं, अधूरे होते हैं। अकेली स्त्री या अकेले पुरुष से न सृष्टि होती है, न समाज होता है और न परिवार होता है। जो कुछ होता है, दोनों के मिलान से होता है। इसी दृष्टि से स्त्री और पुरुष को एक-दूसरे का पूरक माना गया है। इसकी नींव को मजबूती देने में सहशिक्षा का प्रयोग कारगर है, प्रासंगिक है। भारत तो सदियों से स्त्री-पुरुषों की समानता की पैरवी करता रहा है। भगवान महावीर ने अपने धर्मसंघ में पुरुषों को जितने आदर से प्रवेश दिया, उतने ही आदर से महिलाओं को भी प्रवेश दिया। न केवल महावीर बल्कि गांधी, स्वामी विवेकानन्द, आचार्य तुलसी जैसे महापुरुषों ने भी स्त्री-पुरुष के बीच की दूरियों को मिटाने एवं असमानता को दूर करने के प्रयत्न किये।

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