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प्रकृति और पर्यावरण की आजादी का मतलब

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  • नीरजा माधव, साहित्यकार

स्पष्ट सी बात है कि जब हम प्रकृति और पर्यावरण की बातें कर रहे होते हैं उस समय हम कम से कम सात सौ से अधिक विलुप्त होती चिडिय़ों की प्रजाति की बातें कर रहे होते हैं । पांच हजार से अधिक वृक्षों की प्रजातियों की रक्षा की बात कर रहे होते हैं और सैकड़ों प्रकार के खनिजों के धरती के गर्भ से दोहन तथा करोड़ों लोगों के प्यास की बातें कर रहे होते हैं जो बुझती है भारत की नदियों के मीठे जल से ।

जब हम पृथ्वी वासियों से जंगलों को बचा लेने की गुहार कर रहे होते हैं , वास्तव में उस समय हम अरबों करोड़ों लोगों की प्राण वायु की रक्षा की बातें कर रहे होते हैं जो इन जंगलों,पेड़ों से नि:सृत होती है गंधवाही हवा के रूप में। प्रकृति और पर्यावरण की आजादी का मतलब है धरती पर मौसमों और जलवायु की आजादी और इस प्रकार मनुष्य को खुलकर सांस ले पाने की आजादी।

आइए हम एक विहंगम दृष्टि डालते हैं इस कोरोना के संकट काल में अपने पर्यावरण के ऊपर। इतिहास में सन् 2020 – 21 को करुणा के कारण विश्व में हुई करोड़ों मासूम मौतों के लिए जाना जाएगा तो वहीं स्वच्छ पर्यावरण के एक जरूरी पाठ के लिए भी याद किया जाएगा। कोरोना संकट काल में जहां एक ओर दुश्चिंताओं और अनिश्चितता के काले बादल छाए रहे वहीं हल्की ही सही एक आश्वस्त करने वाली बयार भी चली। कोरोना संक्रमण से बचने के लिए पूरे विश्व में लॉकडाउन किया गया। लोग अपने अपने घरों में बंद रहे ।रेलें, हवाई जहाज, बसें या परिवहन के अन्य साधनों के पहिए रुके रहे। कारखाने, दुकानें सब बंद।

इस लॉकडाउन का पर्यावरण पर एक बहुत ही सकारात्मक प्रभाव पड़ा। सैकड़ों वर्षो में शायद पहली बार आसमान तमाम विषैली गैसों, धुएं, गुबार से मुक्त होकर एकदम साफ और नीला दिखाई पड़ा ।खबर आई की यमुना नदी की कालिमा अपने पुराने नीले रंगत में लौट आई है।गंगा नदी का जल भी साफ हो गया था। फूलों पर तितलियों और मधुमक्खियों की आवाजाही बढ़ गई । चिडिय़ा खुले आसमान में उड़ान भरने लगी थीं। फूलों पत्तियों की रंगत कुछ और निखर गई ।लताओं में ,घने कुंजो में चिडिय़ों की चहचहाहट कुछ ज्यादा ही भर गई।

वैज्ञानिक बताने लगे कि प्रदूषण के कारण जो ओजोन परत में छिद्र हुआ था और जो मानवता के लिए तथा धरती के लिए भी घातक था, वह ओजोन छिद्र बहुत हद तक इस साफ पर्यावरण और हानिकारक गैसों के अभाव में भरने लगा जो एक शुभ संकेत था पृथ्वी वासियों के लिए। मौसम वैज्ञानिक और पर्यावरणविद बताने लगे कि महानगरों में हवा की गुणवत्ता में एकाएक इस कोरोना संकट काल में सुधार हुआ ।पर्यावरण के साफ होने की स्थिति लगभग पूरे विश्व में हुई।

ऋग्वेद और अथर्ववेद में लगभग 90 से 99 नदियों का उल्लेख है जिनमें गंगा , यमुना, सरस्वती ,सिंधु, गोदावरी ,नर्मदा ,कावेरी , शिप्रा आदि प्रमुख हैं और अत्यंत पवित्र मानी गई हैं। गंगा यदि आर्यावर्त की सभ्यता और संस्कृति का प्रमाण है तो दूसरी ओर एक पूरी की पूरी सभ्यता ही सिंधु के नाम हो जाती है। ये तमाम नदियां वृहत्तर भारत की जीवन रेखा की तरह हैं। प्रकृति की गोद में तमाम वे पशु पक्षी लॉकडाउन के दिनों में निर्द्वंद्व विचरते देखे गए जो हमारे तथाकथित मशीनी विकास के कोलाहल और गुबार से सहम कर कहीं दुबके- छिपे रहते थे ।यह कोरोना काल का एक सकारात्मक पर्यावरणीय पक्ष है।

इस कोरोना ने हम सभी को आत्मसाक्षात्कार का एक अवसर तो दे ही दिया है। विश्व के तमाम देशों को मिल बैठकर इस पर विचार करना चाहिए कि क्या वे आने वाले समय में भी धरती का दोहन करके उसे खोखला करते रहेंगे या अपनी दानवी महत्वाकांक्षाओं पर अंकुश लगाकर आवश्यकता भर ही धरती मां से मांगेंगे ? क्या मृत नदियों की लाशें लेकर हम नई दुनिया में प्रवेश करेंगे या दोनों किनारों पर वन प्रांतरों के बीच कल- कल का मधुर संगीत बिखेरती नदियों और साफ नीले आकाश को छूने की प्रतिस्पर्धा करते पहाड़ों और उन्मुक्त विचरते पक्षियों के कलरव गान के साथ प्रकृति की गोद में हम अपना आने वाला समय बिताएंगे?

यही वह समय है जब विश्व को तय करना है कि आर्थिक वर्चस्व और हथियारों की होड़ की मनुष्यता विरोधी राजनीति छोड़ हम धरती के अपने अपने भूखंड पर सहअस्तित्व के साथ जीते हुए अपना समय शांति में बिताएंगे ।यह सब तब होगा जब हम प्रकृति का दोहन बंद करेंगे। प्रकृति को प्रकृति के हवाले कर देंगे ।कभी भी इस अहंकार में नहीं रहेंगे कि हम उसके चिर स्वामी हैं।

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