मनुष्य को समाज से जोडऩे का पर्व है मकर संक्रांति

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मकर संक्रांति नववर्ष का स्वागत पर्व है यह पर्व पूरे देश में श्रद्धा, आस्था, हर्षोल्लास और उमंग से मनाया जाता है

मकरसंक्रांति नववर्ष का स्वागत पर्व है। यह पर्व पूरे देश में श्रद्धा, आस्था, हर्षोल्लास और उमंग के साथ मनाया जाता है। मकर संक्रान्ति सूर्य पूजा का पर्व है। मकर संक्रान्ति का दिन देवताओं के लिए सूर्योदय माना जाता है। पृथ्वी का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश संक्रांति कहलाता है और पृथ्वी के मकर राशि में प्रवेश को मकर संक्रांति कहते हैं।

  • सुरेश पचौरी, भारत सरकार में रक्षा उत्पादन, कार्मिक एवं संसदीय कार्य राज्य मंत्री रहे

हमारी संस्कृति में त्यौहारों एवं उत्सवों का खास महत्व होता है। ये त्यौहार हमारी चेतना में शुभ कार्य करने का संकल्प लेने का अवसर प्रदान करते हैं। त्यौहार सिर्फ परंपराओं से जुड़े नहीं होते बल्कि उसके पीछे ज्ञान, विज्ञान, प्रकृति, स्वास्थ्य और आयुर्वेद के कई अहम रहस्य जुड़े होते हैं। हमारे व्रत, पर्व और उत्सवों में हमारी संस्कृति का अर्थ छुपा होता है। मकरसंक्रांति नववर्ष का स्वागत पर्व है। यह पर्व पूरे देश में श्रद्धा, आस्था, हर्षोल्लास और उमंग के साथ मनाया जाता है।

मकर संक्रान्ति सूर्य पूजा का पर्व है। मकर संक्रान्ति का दिन देवताओं के लिए सूर्योदय माना जाता है। पृथ्वी का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश संक्रांति कहलाता है और पृथ्वी के मकर राशि में प्रवेश को मकर संक्रांति कहते हैं। मकर संक्रांति पर्व हमारी संस्कृति की पर्यावरणीय चेतना का पर्व है। सूर्य का मकर रेखा से उत्तरी कर्क रेखा में जाना उत्तरायण कहलाता है और सूर्य का कर्क रेखा से दक्षिण मकर रेखा में जाता दक्षिणायन कहलाता है।

मकर संक्रान्ति के दिन से सूर्य का भ्रमण उत्तरायण में होता है। यह पर्व बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है। मकरसंक्रांति देश के लगभग सभी राज्यों में मनाया जाने वाला सामान्य पर्व है। भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक स्थितियां इसके लोकरूप में थोड़ी भिन्नता तो लाती हैं परंतु इस उत्सव का मूल भाव दर्शन और कारण एक ही है। असम में बिहू पर्व के नाम से मकरसंक्रांति को मनाते हैं। महाराष्ट्र और कर्नाटक में इस दिन महिलाएं तिल-गुड़, रोली और हल्दी बांटती हैं और कहावत है कि ‘तिल गुड़ खा लो और मीठा-मीठा बोलो। ‘पंजाब और हरियाणा में इसे ‘लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है।

इस दिन अंधेरा होते ही आग जलाकर तिल, गुड़, चावल की आहुति दी जाती है इस सामग्री को तिलचैली कहते हैं। तमिलनाडु में मकर संक्रांति को पोंगल के रूप में मनाया जाता है। इस दिन सूर्य देव को नैवेद्य चढ़ाया जाता है। सूर्य पृथ्वी पर जीवन का स्रोत है। सूर्य की आराधना से जुड़ा हर पक्ष जीवन की स्तुति ही है। इसलिए इसमें सेहत और आरोग्य का महत्व शामिल हो जाता है। मकरसंक्रांति, लोहड़ी और पोंगल, प्रकृति के उत्सव हैं।

यह वैदिक उत्सव है। इस त्यौहार का संबंध प्रकृति, ऋतु परिवर्तन और कृषि से है। ये तीनों चीजें ही जीवन का आधार हैं। प्रकृति के कारक के तौर परसूर्य देव की पूजा की जाती है, सूर्य देव की इस स्थिति के अनुसार ऋतु परिवर्तन होता है और बसंत ऋतु प्रारंभ होती है। सूर्य कृषि के देवता होते हैं, सूर्य अपनी तेज से अन्न को पकाता है, समृद्ध करता है, जिससे मानव समुदाय का भरण-पोषण होता है। कृषक समाज मकर संक्रान्ति को आभार दिवस के रूप में मनाते हैं।

मकरसंक्रांति पर्व के चार मुख्य आयाम हैं। पहला धर्म है स्नान और दान का, दूसरा संस्कृति का, जहां इसमें भोजन, भजन व नृत्य का उल्लास है। तीसरा खगोल शास्त्र व ज्योतिष का, जहां यह उत्तरायण माघी व मकर संक्रांति के नामों की सार्थकता पाता है और चौथा व्यवहार व विज्ञान का, जहां यह नई फसल और हौसले के पर्व के रूप में पहचान पाता है।

मकरसंक्रांति के दिन स्नान और दान का विशेष महत्व है। आज के दिन देश की प्रमुख नदियों जैसे गंगा, यमुना में और मध्यप्रदेश में मां नर्मदा में स्नान का विशेष महत्व होता है। हमारे धर्म ग्रंथों में स्नान को पुण्यजनक के साथ स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभदायक माना जाता है। मकर संक्रान्ति के दिन सूर्य से मिलने वाली ऊर्जा हमारे शरीर और मन को अनूठी शक्ति देती है, इसलिए आज हम भगवान सूर्य को अर्घ देकर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। आज के दिन हम मां नर्मदा में स्नान कर, भगवान सूर्य की पूजा कर, अन्न का दान करते हैं। इस दिन गुड़, तिल, रेवड़ी और गजक का प्रसाद बांटा जाता है।

मकर संक्रान्ति के दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनिदेव से नाराजगी त्यागकर उनके घर गये थे, इसलिए इस दिन को सुख और समृद्धि का माना जाता है और इस दिन पवित्र नदी में स्नान, दान और पूजा करने से पुण्य कई गुना बढ़ जाता है। इस दिन दान करने से सूर्य देवता प्रसन्न होते हैं। सूर्य देवता को मां नर्मदा के जल में तिल डालकर अघ्र्य देने से परिवार को देवताओं और पितरों का आशीर्वाद मिलता है। वहीं तिल के दान से शनि के दोष दूर होते हैं। तिल और गुड़ के दान से मंगल से पीडि़त दोष भी समाप्त होते हैं।

मकर संक्रान्ति को विशेष पुण्यदायी माना गया है। इस पर्व पर दान देने के पीछे हमारी संस्कृति में परोपकार की भावना का महत्व नजर आता है। यह पर्व उपवास की भी सीख देता है। खुद अन्न का त्याग कर दूसरों को अन्न दान करना हमें यह याद दिलाता है कि हमें सिर्फ अपना ही नहीं, औरों का भी ध्यान रखना है। जब तक एक भी इंसान भूखा है, हमारा खाना, हमारा सुख सब बेकार है। हमारे ऋषिगण कभी अन्न-वस्त्र, कभी खिचड़ी, कभी तिल-गुड़ या अन्य जरूरत की चीजों का दान दिलवाकर दरिद्र को नारायण समझकर उसे भोजन करवाने की सीख देते हैं, इसलिए हमारे यहां दान को धर्म कहा गया है और उसके पीछे मानव कल्याण की भावना छुपी हुई है।

मकर संक्रान्ति के दिन देश के कई इलाकों में पतंग उड़ाने पर विशेष जोर दिया जाता है। वहां पर संक्रान्ति पतंगों के रूप में उड़ान का पर्व बन जाता है। पतंगे हवा के साथ भी उड़ती है और हवा के खिलाफ भी उड़ती हैं। पतंगें मन के परवाने की तरह बन जाती हैं। इस तरह यह पर्व हमें आकाश से जोड़ता है। पतंग उड़ाने के पीछे मुख्य कारण होता है सूर्य के प्रकाश में समय बिताना। सुबह के सूर्य का प्रकाश त्वचा, हड्डियों और पूरे शरीर के लिए लाभकारी होता है। यह हमारी लोकरीत में विटामिन-डी की समस्या का हल है।

पर्व स्नान पर मेले का आयोजन, बिखरी हुई ग्रामीण संस्कृति को एकजुट रखने का प्रयास होता है। इससे व्यक्ति और समाज के जीवन में नई चेतना का संचार होता है। इन मेलों से हमें देश और समाज की स्थिति का यथार्थ बोध होता है। इसमें सामाजिक समरसता और एकता की प्रेरणा मिलती है। मकर संक्रांति के दिन मां नर्मदा के तट कई जगहों पर मेले का आयोजन होता है, जिसमें सदियों से जो मानव मूल्य हमारी धरोहर के रूप में हैं और पंरपरा से जो जीवन मूल्य हमें विरासत में मिले हैं उन पर नये संदर्भों में चर्चा करने का अवसर मिलता है।

खगोलीय स्थिति से मकर संक्रान्ति का विशेष महत्व है। ज्योतिष गणना के अनुसार ग्रहों की स्थिति का मनुष्य के जीवन पर विशेष असर होता है। आज के दिन सूर्य, चंद्र एवं शनि की स्थिति ने एकरूपता होती है। सूर्य वाणी का, चंद्रमा मन का एवं शनि कर्म का प्रतीक ग्रह है। इनकी एकरूपता का सीधा संकेत है कि हमारे मन, कर्म और वचन में एकरूपता हो। आज का दिन व्यक्ति को अपनी निजता से ऊपर उठकर सृष्टि से जुडऩे का अवसर होता है। यह पर्व व्यष्टि से समष्टि के रूप में हमारे निजी जीवन, सामाजिक जीवन एवं पूरे राष्ट्र के जीवन में नये विचारों के चिंतन का अवसर प्रदान करता है।

सूर्य का उत्तरायण होना, अंधकार से प्रकाश की ओर उन्मुख होना है, जो भारतीय संस्कृति के मूल मंत्र ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय को भी प्रतिध्वनित करता है। अर्थ है – हम प्रकाश की ओर चले, माघ का सूर्य तप कहलाता है। उत्तरायण यानि कर्म की ओर चलना, तपस्या करना। जैसे सूर्य तपता है वैसे हम भी तप करें। यह त्यौहार हमारी एकता, समानता और विश्वास का प्रतीक होने के साथ-साथ ही व्यक्ति को ईश्वर और प्रकृति के रिश्ते का बोध कराता है। मकरसंक्रांति है, तन के स्नान का, धन के दान का और मन की उड़ान का।

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