Home लेख महात्मा गांधी: भारत में साकार होता बापू का ग्राम स्वराज्य

महात्मा गांधी: भारत में साकार होता बापू का ग्राम स्वराज्य

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रंजना चितले, कथाकार व रंगकर्मी

भारत गांवों में बसता है। गांव आत्मनिर्भर होंगे तभी देश संपन्न-समृद्ध होगा। गांवों को आत्मनिर्भर बनाने की जो सैद्धांतिक बात गांधी जी ने कही थी उसे व्यवहार में बदला है प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने।

उन्होंने देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लोकल को वोकल करना और फिर उसे ग्लोबल बनाने का अभियान चलाया है। यह स्वप्न गांधीजी का था उसे संकल्प के रूप में दीनदयाल जी ने व्यक्त किया और उसे आज के परिप्रेक्ष्य में साकार कर रहे हैं प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी।

131 करोड़ जनसंख्या वाले भारत देश की निर्भरता दूसरे देशों पर न बनी रहे इसके लिये प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने आत्मनिर्भर भारत निर्माण का अभियान चलाया है। आत्मनिर्भर भारत से आशय हर क्षेत्र में देश की सहभागिता को मजबूत करना है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने गांव को मजबूत करने और स्वावलंबी बनाने के लिए ग्राम स्वराज्य का मंत्र दिया था। आत्म निर्भर भारत ग्राम स्वराज्य के आगे की कड़ी है।

गांधीजी कहते थे ग्राम स्वराज्य की मेरी कल्पना यह है कि वह एक ऐसा पूर्ण प्रजातंत्र होगा, जो अपनी अहम जरूरतों के लिए अपने पड़ोसी पर भी निर्भर नहीं रहेगा। और फिर भी बहुतेरी दूसरी जरूरतों के लिए जिनमें दूसरों का सहयोग अनिवार्य होगा- वह परस्पर सहयोग से काम लेगा। इस तरह हर एक गांव का पहला काम यह होगा कि वह अपनी जरुरत का अनाज और कपड़े के लिए कपास खुद पैदा कर ले। उसके पास व बच्चों के लिए मन बहलाव के साधन और खेल-कूद के मैदान वगैरह का बंदोबस्त हो सके। इसके बाद भी जमीन बची तो उसमें वह ऐसी उपयोगी फसलें बोयेगा, जिन्हें बेचकर वह आर्थिक लाभ उठा सके।

हर एक गांव की अपनी एक नाटकशाला, पाठशाला और सभा भवन रहेगा। पानी के लिए उसका अपना इंतजाम होगा। गांव के सभी लोगों को शुद्ध पानी मिला करेगा। कुंओं और तालाबों पर गांव का पूरा नियंत्रण रखकर यह काम किया जा सकता है। बुनियादी तालीम के आखिरी दर्जे तक शिक्षा सबके लिए लाजिमी होगी। जहां तक हो सकेगा, गांव के सारे काम सहयोग के आधार पर किये जायेंगे। जात-पात और क्रमागत अस्पृश्यता के जैसे भेद इस ग्राम-समाज में बिलकुल नहीं रहेंगे।
गांव का शासन चलाने के लिये हर साल गांव के पांच आदमियों की एक पंचायत चुनी जायेगी। इसके लिए नियमानुसार एक खास निर्धारित योग्यता वाले गांव के बालिक स्त्री-पुरुषों को अधिकार होगा कि वे अपने पंच चुन लें। इन पंचायतों को सब प्रकार की आवश्यक सत्ता और अधिकार रहेंगे।

ग्राम स्वराज्य की गांधीजी की जो कल्पना थी उसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आधार रखने वाला संपूर्ण प्रजातंत्र काम करेगा। व्यक्ति ही अपनी इस सरकार का निर्माता भी होगा। अपने गांव के साथ वह सारी दुनिया की शक्ति का मुकाबला कर सकेगा। क्योंकि हर एक देहाती के जीवन का सबसे बड़ा नियम यह होता है कि वह अपनी और अपने गांव की इज्जत की रक्षा के लिये मर मिटे।

गांव वालों में ऐसी कला और कारीगरी का विकास होना चाहिये, जिससे बाहर उनकी पैदा की हुई चीजों की कीमत की जा सके। जब गांवों का पूरा-पूरा विकास हो जायेगा, तो देहातियों की बुद्धि और आत्मा को संतुष्ट करने वाली कला-कारीगरी के धनी स्त्री-पुरुषों की गांवों में कमी नहीं रहेगी। गांव में कवि होंगे, चित्रकार होंगे, शिल्पी होंगे, भाषा के ममर्ज्ञ और शोध करने वाले लोग भी होंगे। जिंदगी की ऐसी कोई चीज न होगी जो गांव में न मिले। इस तरह से गांवों की पुर्नरचना का काम आज से ही शुरू हो जाना चाहिये। गांवों की पुर्नरचना का काम कामचलाऊ नहीं, बल्कि स्थायी होना चाहिये।

उद्योग, हुनर, तंदरुस्ती और शिक्षा इन चारों का सुंदर समन्वय करना चाहिये। इन सबके मेल से पेट में आने के समय से लेकर बुढ़ापे तक का खूबसूरत फूल तैयार होता है। मैं किसी उद्योग और शिक्षा को अलग नहीं मानता हूं, बल्कि उद्योग को शिक्षा का जरिया मानता हूं। आदर्श भारतीय ग्राम इस तरह बनाया जायेगा कि उसमें आसानी से स्वच्छता की पूरी-पूरी व्यवस्था रहे। गांव की गलियां और सड़कों को धूल मुक्त किया जाये।

गांव में आवश्यकतानुसार कुंए होंगे। सब लोगों के लिए पूजा के स्थान होंगे, सबके लिये सभा भवन होगा। मवेशियों को चरने के लिये गांव का चारागाह होगा। सहकारी डेयरी होगी। प्राथमिक और माध्यमिक शालायें होंगी जिनमें मुख्यत: औद्योगिक शिक्षा दी जाएगी। मेरी कल्पना की ग्राम इकाई मजबूत होगी। ऐसे गांवों को अगर स्वावलंबन के आधार पर अच्छी तरह संगठित किया जाये, तो वह बहुत कुछ कर सकते हैं।

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