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सांस्कृतिक पुनरुत्थान के पथ पर अग्रणी भूमिका में मध्यप्रदेश

  • लोकेन्द्र सिंह
    पिछले आठ-दस वर्षों का सिंहावलोकन करने पर ध्यान आता है कि यह भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का दौर है। इस अमृतकाल में भारत अपने ‘स्व’ की ओर बढ़ रहा है। अयोध्या में भव्य एवं दिव्य श्रीराम मंदिर का निर्माण हो रहा है। श्रीराम ने जिस संघर्ष और धैय के मार्ग को चुना था, उनके भक्तों ने भी मंदिर निर्माण के लिए उसी का अनुसरण किया। अब बेहिचक सरयू के तट पर दिव्य दीपावली मनायी जाती है। केदारधाम से लेकर काशी के विश्वनाथ मंदिर और अवंतिका (उज्जैन) में बाबा महाकाल का लोक साकार रूप ले रहा है। भारत जब करवट बदल रहा है, तब मध्यप्रदेश सांस्कृतिक पुनर्जागरण की बेला में कहाँ पीछे छूट सकता है। मध्यप्रदेश में शिवराज सरकार भी अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने-संवारने में अग्रणी भूमिका निभा रही है। इस संदर्भ में ‘राम वन गमन पथ’ के निर्माण का निर्णय करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जो कहा, उसे समझना चाहिए- “आज देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए हम प्रतिबद्ध हैं”। मुख्यमंत्री का यह वक्तव्य संकेत करता है कि सांस्कृतिक पुनरुत्थान के इस दौर में मध्यप्रदेश चूकना नहीं चाहता है। स्वतंत्रता के समय से ही भारत को अपने सांस्कृतिक मान-बिंदुओं को संवारने का जो काम शुरू कर देना चाहिए था, वह अब जाकर शुरू हो रहा है, तो फिर अब रुकना नहीं है। श्रीसोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के समय जो हिचक हमारे स्वतंत्र भारत के प्रारंभिक नेतृत्व ने दिखायी, उस व्यर्थ की हिचक से वर्तमान नेतृत्व मुक्त है। हमारे वर्तमान नेतृत्व को न केवल अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गौरव है अपितु वह उसके संवर्धन के लिए प्रतिबद्ध भी दिखायी देता है।
    मध्यप्रदेश में सांस्कृतिक पुनर्जागरण की गति में तीव्रता 2016 के बाद दिखायी देती है, जब उज्जैन में आयोजित ‘सिंहस्थ’ के दौरान ‘वैचारिक कुंभ’ की महान परंपरा को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया गया। वैचारिक महाकुंभ से निकले अमृत स्वरूपी 51 मार्गदर्शक बिंदुओं के प्रकाश में सरकार ने आगे बढ़ना शुरू किया। ‘महाकाल लोक’ का निर्माण भी उन्हीं 51 बिंदुओं में से एक था। शिवराज सरकार ने महाकाल लोक को साकार करके भारत की प्राचीन संस्कृति, उसके दर्शन एवं शिक्षाओं को समाज तक पहुँचाने का सराहनीय कार्य किया है। महाकाल लोक के दर्शन के लिए लगातार बहुत बड़ी संख्या में देश-प्रदेश से लोग पहुँच रहे हैं। ये सब दर्शनार्थी/पर्यटक अपने साथ यहाँ से क्या लेकर जाते होंगे? नि:संदेह, भारत की ज्ञान-परंपरा और जीवनमूल्यों को सीखकर ही जाते होंगे। सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के लिए प्रतिबद्ध सरकार ने महाकाल लोक को मिल रहे जन-प्रसाद से उत्साहित होकर, सांस्कृतिक पुनरुत्थान की अगली कड़ी में ओरछा में श्रीराम राजा कॉरिडोर एवं वनवासी राम लोक, जाम सावली में हनुमान धाम, सलकनपुर में देवी लोक, दतिया में माई पीतांबरा का धाम और श्रीराम वन गमन पथ का निर्माण होना है। वहीं, ओंकारेश्वर में जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य की स्मृति में एकात्म धाम का विकास लगभग पूर्णता की ओर है। एकात्म धाम के विशाल परिसर में सात केंद्र बनेंगे, जो भारत के वास्तु और स्थापत्य कलाओं पर आधारित होंगे। यहाँ आचार्य शंकर की जीवन यात्रा पर केंद्रित संग्रहालय तो बनेगा ही, यह स्थान अद्वैत का शोध-संस्थान भी बनेगा। याद रखें कि ओंकारेश्वर आचार्य शंकर की ज्ञान स्थली है। यह वही स्थान है, जहां से अद्वैत दर्शन की शिक्षा प्राप्त करके उनके जीवन की महायात्रा आरंभ हुई थी। मूल रूप से उसी अद्वैत दर्शन के लोकव्यापीकरण की दिशा में एकात्मधाम को विकसित किया जा रहा है।
    मध्यप्रदेश सरकार ‘श्रीराम वनगमन पथ’ के निर्माण की दिशा में भी निर्णायक कदम बढ़ा चुकी है। वनवास के कालखंड में प्रभु श्रीराम जहां से गुजरे थे, उस मार्ग को विकसित करने की मांग हिन्दू समाज की ओर से काफी समय से की जा रही है। विभिन्न सरकारों ने भी कई बार ‘राम वन गमन पथ’ के निर्माण की घोषणा की है लेकिन अब तक इस दिशा में ठोस पहल कभी नहीं हुई। पहली बार मध्यप्रदेश सरकार ने ठोस पहल करते हुए ‘श्री रामचंद्र पथ गमन न्यास’ का गठन करने का निर्णय लिया है। चूंकि सबसे अधिक समय राम ने मध्यप्रदेश में गुजारा इसलिए राम पथ का निर्माण मध्यप्रदेश की जिम्मेदारी भी है। यह सुखद है कि मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार आनंद के साथ अपनी इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए आगे आई है।
    यह जो सांस्कृतिक पुनर्जागरण हो रहा है, यह देश-प्रदेश की सर्वांगीण उन्नति का आधार भी बनेगा। भारत की एकता एवं अखंडता का सूत्र भी हमारी संस्कृति है। प्राचीन इतिहास के पृष्ठ भी जब हम उलटकर देखते हैं, तब हमें ध्यान आता है कि आचार्य चाणक्य से लेकर आचार्य शंकर तक ने भारत को शक्ति सम्पन्न एवं एकजुट करने के लिए संस्कृति का ही आधार लिया। जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने भी अपने समय में देश को जोड़ने और एकात्म स्थापित करने के लिए सांस्कृतिक पक्ष पर ही काम किया। ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध देशभर में चल रहे आंदोलनों का प्राण भी संस्कृति थी। भारत भूमि के साथ उत्तर से दक्षिण एवं पूर्व से पश्चिम तक जो हमारा नाता है, उसका भी आधार संस्कृति है। दुनिया में भारत की संस्कृति ने ही सबसे पहले कहा था कि सबके मूल में एक ही तत्व है। जड़-चेतन में एक ही ब्रह्म है। इसलिए ही भारत में बाहरी तौर पर तो विविधता दिखाई देती है, किंतु अंदर से सब एक-दूसरे से जुड़े हैं। क्योंकि, सब मानते हैं कि सबमें एक ही तत्व है।
    हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत ने विश्व में जो सम्मान प्राप्त किया है, वह आर्थिक प्रगति से कहीं अधिक अपनी सांस्कृतिक विरासत एवं सांस्कृतिक जीवनमूल्यों के नाते किया है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने स्पष्ट किया है कि जब तक हम भारत के चित्त को नहीं समझेंगे, उसे जानेंगे नहीं और उससे जुड़ेंगे नहीं, तब तक हम भारत को ‘भारत’ नहीं बना सकते।

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