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साहित्य: अक्षरा का विशेषांक: मालती जोशी की याद

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मध्यप्रदेश की सुपरिचित कथाकार मालती जोशी सत्तासी की हो गईं। कोविड काल में उनके व्यक्तित्व और रचनाधर्मिता को भोपाल की पत्रिका ‘अक्षरा ने बखूबी याद किया। एक पूरा अंक मालतीजी को समर्पित किया जो 4 जून को उनके जन्मदिन के उपहार बतौर समर्पित किया। कैसा सुंदर संयोग है कि एक और महिला रचनाकारृ सुदर्शन प्रियदर्शिनी पर उज्जैन की पत्रिका ‘समापवर्तन ने अंक निकाला।

ये कथाकार अमेरिका में बसी हैं। मालतीजी इंदौर में रहती थीं। तब मालवा में उनकी उपस्थिति बनी रहती थी। अब वे मालवा की मिट्टी को लेकर महाराष्ट्र में हैं। अनीता सक्सेना ने उन पर लिखे आलेख के शीर्षक में उन्हें मालवा की हीरा और मालवा की मीरा बताया है। अक्षरा ने उन पर परिश्रमपूर्वक 28 आलेख जुटाए। जिनमें ज्यादातर उनसे जुड़े संस्मरणों पर आधारित हैं लेकिन कुछ उनके लेखन की चीर-फाड़ भी करते हैं। संपादक कैलाशचंद्र पंत ने लिखा है कि उनका विचार मालतीजी की कहानियों को लेकर स्त्री विमर्श के नए आयामों पर सार्थक संवाद का रहा।

हम देखते हैं कि छोटे-छोटे (केवल प्रसार में, विचार में बड़े) पत्र-पत्रिकाएं बड़ा गंभीर काम करते हैं। अक्षरा और समापवर्तन का ऐसा ही काम है। मालती जोशी को हमारी और हमसे वरिष्ठ पीढ़ी ने खूब पढ़ा है। अब वे 87 साल की हैं। अनीता उन्हें कहती हैं-बिना कहानी को देखे अपनी कहानी का शब्दश: पाठ करने वाली कहानीकार। उनकी चालीस से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। गुलजार ने उनकी कहानियों पर धारावाहिक बनाए। मालती जोशी की कहानियां हमारे अपने कौटुंबिक वातावरण के कथ्य लगते थे जिनमें स्त्री पात्र कहीं पारंपरिक भारतीय समाज की भूमिका में अपनी बात कहते नजर आते हैं तो कहीं मुखरित होकर।

मुकेश वर्मा ने लिखा है-प्रेमचंद की महान परंपरा का सशक्त और सक्षम अनुसरण मालती जी के कथा साहित्य में मिलता है। वे हमारे पाठकों के इसलिए बहुत नजदीक हैं क्योंकि मध्यमवर्गीय और सांस्कारिक परिवारों की तरल-सरल संवेदनाओं को गहरी तल्लीनता से रेखांकित करती हैं। मुरैना, भोपाल में रहने के दौरान उन्होंने छोटे कस्बों के समाज को खुद जीया। उनके पुत्रों ऋषि जोशी व सच्चिदानंद जोशी ने उनकी इस पृष्ठभूमि में बनती उनकी सोच को उभारने की कोशिश की है।

सूर्यकांत नागर ने उन्हें नारीगत संवेदनाओं की प्रवक्ता तो सूर्यबाला ने हिंदी कहानी की साम्राज्ञी -बताया है। मालतीजी ने कोविड काल की दुखती रग पर हाथ रखा है। इन दिनों श्रद्धांजलियों के नाम पर खूब जीवनगाथाएं, संस्मरण और आत्मकथ्य लिखे जा रहे हैं। मालतीजी कहती हैं-मैं इनसे सहमत नहीं हूं। किसी को अपना कोई मरने के बाद ही क्यों याद आता है। फिर जो व्यक्ति अपनी बात साफ करने के लिए दुनिया में नहीं है, उसके ऊपर अपनी मर्जी से कुछ क्यों लिखा जाए। दरअसल अतीत को कुछ लोग हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।

(समीक्षक)

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