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तंबाकू के जहर में धुआं होती जिंदगी

प्रितम एस. गेडाम
हमारे समाज और देश में तंबाकू का जहर पीढ़ी दर पीढ़ी को लगातार तबाह कर दर्दनाक मौत के कगार पर खड़ा कर रहा है। विडंबना देखिये कि तंबाकू जैसा नशीला घातक जहर हमारे आसपास बड़ी ही आसानी से उपलब्ध होता है। छोटे-छोटे बच्चों से लेकर युवा वर्ग, महिला और बुजुर्ग तक तंबाकू की लत के आदी बन चुके है। आजकल तो शहरों में ई-सिगरेट का ट्रेंड खूब चल पड़ा है, जो नई पीढ़ी को आकर्षित कर रहा है। तंबाकू जलाने पर उस धुएँ से निकलने वाले कई जहरीले रसायन और यौगिक मानव शरीर के लिए हानिकारक होते हैं। तंबाकू से निकलनेवाला निकोटिन भी हेरोइन, कोकीन और अल्कोहल के समान ही नशे की लत है, यह निकोटिन सेकंड के भीतर मस्तिष्क तक पहुंच जाता है। धूम्रपान फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है, मांसपेशियों को ऑक्सीजन की आपूर्ति कम कर सहनशक्ति को भी कम करता है, निकोटिन के अलावा तंबाकू में अमोनिया, आर्सेनिक, कार्बन मोनोऑक्साइड, टार, नेफ़थलीन, रेडियोधर्मी यौगिक, हाइड्रोजन साइनाइड, सीसा, चूना, कैडमियम, मेन्थॉल जैसे जहरीले तत्व होते है।
तंबाकू मानवीय शरीर को घातक बीमारियों की ओर धकेलता है। धूम्रपान करने वाले अन्यों के मुकाबले 13-14 साल पहले मर जाते है। हर साल, एचआईवी/एड्स, अवैध दवाओं, आत्महत्याओं, हत्याओं, सड़क दुर्घटनाओं और आग से संयुक्त रूप से जितने लोगों की मृत्यु होती है, उससे अधिक लोगों की मृत्यु तंबाकू से होती है। हर दिन 2800 और हर साल 10 लाख भारतीय तंबाकू संबंधित रोगों के कारण असमय जान गवाते है। 35-69 वर्ष की आयु के व्यक्तियों के लिए भारत में वर्ष 2011 में तंबाकू के उपयोग के कारण सभी बीमारियों से कुल आर्थिक लागत 1,04,500 करोड़ रुपये थी।
धूम्रपान करने वालों को फेफड़ों के कैंसर होने की संभावना 20-25 गुना अधिक होती है, दिल का दौरा पड़ने की गुंजाईश 2-3 गुना ज्यादा, अचानक मौत का 3 गुना ज्यादा खतरा, स्ट्रोक का 2 गुना अधिक जोखिम, सांस की तकलीफ से पीड़ित होने की संभावना 3 गुना अधिक होती है। लंबे समय तक तंबाकू का सेवन करने से फेफड़े, मुंह, होंठ, जीभ, भोजन नली, गले और मूत्राशय का कैंसर हो सकता है। वैश्विक स्तर पर, हर साल 600,000 मौतें सेकंड हैंड स्मोक के कारण होती हैं। दुनिया के लगभग आधे बच्चे तंबाकू के धुएं से प्रदूषित हवा में सांस लेते हैं।

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