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लाल बहादुर शास्त्री: मखमली आवरण में फौलादी व्यक्तित्व

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  • पीवी नरसिंहराव, पूर्व प्रधानमंत्री

लाल बहादुर शास्त्री की चिर स्थाई स्मृति एक अवबोधक, बुद्धिमान, ईमानदार और धर्मभीरू व्यक्ति की है। मुझे उनकी याद एक ऐसे व्यक्ति के रूप में भी आती है जो दृढ़ संकल्प वाले व्यक्ति थे और स्वयं को सदैव व्यस्त रखते हुए एक के बाद एक मंजिल पार करते गए। नम्र और छोटे डीलडौल वाले उस व्यक्ति का इरादा फौलादी था। शास्त्रीजी के जीवन की कहानी वास्तव में एक विलक्षण घटना है।

एक साधारण सी स्थिति से शुरुआत करके और अनेक प्रकार की कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए वे देश के कुछ उच्चतम पदों पर आसीन हुए। इस लंबी यात्रा के दौरान वह सदैव सहिष्णुता, आपसी समझ- बूझ, नम्रता और विवेक, कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प के अपने गुणों का पालन करते रहे। लोगों की भलाई के लिए उनके जीवन पर्यंत संघर्ष में यही गुण वास्तव में आधार स्तंभ रहे थे।

सर्वगुण संपन्न ता के कारण वे जवाहरलाल नेहरू के निकट आते गए जो उन्हें अपना विश्वसनीय सहयोगी मानते थे। प्रधानमंत्री के रूप में उनका चयन निर्बाध शुरुआत थी जिससे अन्य लोगों को भारी मात खानी पड़ी। इस घटना से सर्वाधिक यह बात सामने आई कि हमारा लोकतंत्र कितना परिपक्व है। प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल यद्यपि बहुत कम था किंतु वह काफी उल्लेखनीय था और उन्होंने उसी महान निष्ठा को बनाए रखा जो नेहरू जी में विद्यमान थी। सार्वजनिक मसलों के प्रति शास्त्री जी के दृष्टिकोण में कुछ सहजता सी थी। शायद यह उनकी स्वाभाविक प्रकृति में बसा था।

यह शायद इसलिए भी था क्योंकि वह लंबे समय तक लोगों की सेवा में रहे और स्वतंत्रता संघर्ष में करीब से जुड़े रहे। तो क्या वह जीवन के उस घोर परिश्रम का परिणाम था जिससे शास्त्री जी को संघर्ष करना पड़ा? उन्होंने बार-बार भारतीय यथार्थ के मूल सिद्धांतों को दोहराया। कठिनाइयों का समाधान करने तथा लोगों के साथ बातचीत में उन्होंने इसी यथार्थता पर जोर दिया। शास्त्री जी इस यथार्थ को कभी नहीं भूले। यह एक ऐसी यथार्थता थी जो सचिवालय के मंडपों, गलियारों तथा साफ-सुथरी दीर्घाओं से भी काफी दूर तक फैली हुई थी। यह एक ऐसी यथार्थता थी जो हमारे नगरों तथा कस्बों की संकरी और टेढ़ी-मेढ़ी गलियों तथा हमारे गांव के लोगों के छोटे-छोटे घरों में भी समाई हुई थी।

कृषि विकास में ही उन्हें भारत का उज्ज्वल भविष्य दिखाई दिया। कृषि पर हमारा भोजन, सुरक्षा, औद्योगिक विकास तथा स्थानीय स्तर पर हमारी प्रतिनिधि राजनीतिक संस्थाओं का पूर्ण विकास निर्भर करता है। 1 अक्टूबर 1964 को राष्ट्र को दिए संबोधन में उन्होंने कहा था कि ‘इस विस्तृत देश में हमने एक बार फिर ग्राम पंचायत प्रणाली की स्थापना की है। ये पंचायतें तभी बेहतर कार्य कर सकती हैं जब आर्थिक संपन्नता हो। अत: इन पंचायतों का यह सर्वप्रथम कर्तव्य है कि यह कृषि उत्पादन में वृद्धि करने के लिए हर संभव प्रयास करें जिससे यह संपन्नता आ सके।’

यहां तक कि देश को आर्थिक दृष्टि से मजबूत करने के लिए लोगों का आह्वान करते हुए शास्त्री जी के विवेक तथा समझ ने उन्हें बार-बार इस बात पर बल देने को मजबूर किया कि एक ऐसा मजबूत आधार बनाने की आवश्यकता है जिस पर एक स्थाई ढांचे का निर्माण किया जा सके। उनकी कार्य नीति में अनुशासन तथा चरित्र बल को सर्वाधिक महत्व दिया गया तथा वे चाहते थे की अग्रणी लोग जनता को रास्ता दिखाएं, जैसा कि महात्मा गांधी ने दिखाया तथा वे लोगों में यह विश्वास पैदा करें कि नैतिक बल चरित्र बल तथा अनुशासन का कोई विकल्प नहीं है।

शास्त्री जी की विनम्रता, विरोधी विचारों की सराहना करने की उनकी निपुणता, उनमें कूट-कूट कर भरी सहिष्णुता और भारतीय यथार्थ की प्रखर भावना ने एक संसदविद के रूप में उनकी कार्यप्रणाली को एक दिशा प्रदान की। इसके अतिरिक्त उनके पास वह अनुभव भी था जो उन्होंने तत्काल यूनाइटेड प्रोविंसेस के मुख्यमंत्री पंडित जी बी पंत के संसदीय सचिव के रूप में कार्य करते हुए प्राप्त किया था।

बाद में एक संसद सदस्य के रूप में तथा एक मंत्री के रूप में उन्होंने दूसरों को अपनी बात समझाते हुए उनके दृष्टिकोण को समझने की कला का भरपूर प्रदर्शन किया। यह एक ऐसी बात थी जो उन में प्रचुर मात्रा में विद्यमान थी तथा लोगों के प्रति हमारी संस्कृति तथा हमारे रहन-सहन के ढंग के प्रति उनकी सहानुभूति के माध्यम से झलकती थी। प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण के पश्चात 11 जून 1964 को राष्ट्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था- हमारी प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा में भी कोई ना कोई महत्वपूर्ण बात है।

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