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कर्नाटक चुनावः राजनीतिक पैंतरे और चुनौतियां

  • चेतनादित्य आलोक
    कर्नाटक विधानसभा चुनाव सबसे बड़े और कड़े चुनावी मुकाबलों में से एक साबित होने वाला है, जहां 10 मई को 224 सीटों के लिए मतदान होगा और 13 मई को परिणाम घोषित किये जायेंगे। कर्नाटक में वैसे तो मुकाबला त्रिकोणी यानी भाजपा, कांग्रेस एवं जनता दल-एस के बीच होता रहा है, लेकिन इस बार उम्मीद है कि मुख्य चुनावी संघर्ष भाजपा और कांग्रेस के बीच होगा। भाजपा ने राज्य में चुनावी आगाज पिछले वर्ष नवंबर महीने में ही कर दिया था, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बंगलुरू हवाई अड्डे के नवनिर्मित दूसरे हिस्से का उद्घाटन करने के बाद कर्नाटक की जनता के साथ एक भावनात्मक संवाद स्थापित किया था। इसके अतिरिक्त उन्होंने 400 वर्ष पुराने बंगलुरू शहर की स्थापना करने वाले केम्पेगौड़ा की 110 फीट ऊंची भव्य प्रतिमा का अनावरण भी किया था। कुल मिलाकर प्रधानमंत्री का वह कार्यक्रम हमेशा की तरह स्थानीय जनता के हृदय में पैठ बनाने की एक शानदार पहल थी, जिसे आगामी विधानसभा चुनाव के बरक्स एक महत्वपूर्ण एवं कारगर राजनीतिक प्रयास कहना गलत नहीं होगा। वैसे भी नरेंद्र मोदी एवं अमित शाह वाली भाजपा चुनावी तैयारियों के लिए अब घोषणाओं की मोहताज नहीं रहती, बल्कि उसकी चुनावी तैयारियां तो अब साल भर लगातार चलती ही रहती हैं।
    एक सर्वे के आधार पर इस बार भाजपा एवं जनता दल-एस (जेडीएस) के वोट शेयर में थोड़ी गिरावट की आशंका जतायी जा रही है।
    सर्वे में प्राप्त आंकड़ों के अनुसार इस बार भाजपा के कुल वोट शेयर में 1.3 प्रतिशत और जेडीएस के पिछली बार के 18 प्रतिशत वोट शेयर में भी थोड़ी गिरावट की आशंका है। वहीं कांग्रेस के वोट शेयर में लगभग दो प्रतिशत की वृद्धि होने की संभावना जतायी गयी है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि इस बार राज्य में भाजपा का कुल वोट शेयर लगभग 34.7 प्रतिशत एवं कांग्रेस का कुल वोट शेयर 40 प्रतिशत तक रह सकता है। सर्वे के अनुसार राज्य की 50 प्रतिशत जनता ने राज्य की भाजपा सरकार के कामकाज को खराब जबकि 28 प्रतिशत ने अच्छा और 22 प्रतिशत ने औसत स्तर का बताया। हालांकि यह आवश्यक नहीं कि सर्वे में प्राप्त आंकड़े हमेशा सही साबित हों। चुनावी इतिहास में विशेष कर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व में अब तक कई बार ये आंकड़े गलत साबित हुए हैं। इन सबके बावजूद इस बार के विधान सभा चुनाव में भाजपा, कांग्रेस और जेडीएस के लिए राज्य में अनेक चुनौतियां भी हैं, जो चुनावी परिदृश्य को अंशतः या पूर्णतः बदल सकती हैं।
    एक तरफ बोम्मई सरकार के विरूद्ध सत्ता विरोधी लहर तथा पार्टी नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप भाजपा की प्रमुख चुनौतियां हैं तो दूसरी ओर कांग्रेस के बड़े नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा एवं पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, प्रियंका गांधी तथा राहुल के करीबी नेताओं समेत राज्य पार्टी अध्यक्ष की साख भी दांव पर लगी हुई है, जिनसे पार्टी एवं समर्थकों को बड़ी अपेक्षाएं हैं। यही नहीं, भाजपा के प्रमुख नेता बीएस येदिउरप्पा के अतिरिक्त पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा, संगठन और सरकार के चाणक्य कहे जाने वाले केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, केंद्रीय मंत्री मनसुख मांडविया एवं धर्मेंद्र प्रधान की साख भी दांव पर लगी हुई है, जिनके कंधे पर पार्टी ने इस बार कर्नाटक का दंगल जीताने की जिम्मेदारी डाली है। इनके अतिरिक्त कांग्रेस के पुराने धार्मिक एवं सामाजिक ध्रुवीकरण की राजनीति को मात देने के लिए भाजपा द्वारा चला गया नया सामाजिक ध्रुवीकरण वाला दांव भी इस चुनाव में कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।

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