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कन्या पूजन : नवरात्रि में शक्ति का पूजन

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कन्या पूजन जैसे कार्यक्रम समाज के दोनों वर्गों के मन पर एक ही हिंदू समाज के अंग होने की अमिट छाप छोड़ते हैं। कन्याएं भी स्वयं में दैवी अंश का अनुभव करती हैं और निष्कलंक एवं उदात्त जीवन जीने के लिए प्रेरित होती हैं। इस प्रकार जो सामाजिक समरसता उत्पन्न होती है उसे अन्य बहुत से अवसरों पर तज्जन्य सहज व्यवहार के रूप में और बल मिलता है। यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता अर्थात जहां नारियों की पूजा होती है वहां देवताओं का वास होता है। यह उद्घोष हिंदू समाज से कन्या भ्रूण हत्या ही नहीं, नारी के प्रति समस्त अपराधों को समूल समाप्त करने की क्षमता रखता है।

  • शतरूपा

नवरात्रि शक्ति का पर्व है और शक्ति की प्रतीक नारी है। भारतीय धर्मग्रंथों में नारी को शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करना बड़ा दूरगामी विचार है। धर्मशास्त्र ही नहीं, यह वास्तव में समाजशास्त्र का विषय भी है। नारी को शक्ति और शक्ति को दुर्गा के रूप में प्रतिष्ठित करके समाज में स्त्री के सम्मान को सुनिश्चित किया गया है। स्त्री जगत की मातृसत्ता और सृष्टि की आधार है। इसे प्रतिष्ठित करने के लिए दुर्गा को जगज्जनी का रूप निरूपित किया गया।

मनीषियों ने साल में दो बार नवरात्रि की रचना कर शक्तिरूपा की आराधना का विधान किया और कन्या की पूजा का अनुष्ठान स्थापित किया। इस प्राचीन परंपरा को आज के संदर्भ में देखें तो यह सामाजिक संतुलन की धुरी नजर आती है। समाज की कई बुराइयों के निर्मूलन का उपाय इसमें निहित है।

शास्त्रों में कन्या की पूजा की विधान किया गया है। दुर्गा के साथ 1 वर्ष के स्त्री-शिशु को कन्या कहा गया है तो तीन वर्ष तक अभया और 3 से 5 वर्ष की कन्या को जया कहा गया है। 5 से 8 वर्ष तक कन्या, 9 से 10 वर्ष की श्रेष्ठ कन्या, 10-12 वर्ष की पूर्ण कन्या, 12 से 14 वर्ष की गोरी हो गई और 14 से 16 में आई तो षोडशी हो गई। तो कौन सी कन्या लेंगे पूजन में कन्या, सुकन्या, अभया या जया। इसका भी निर्देश है। एक अन्य विभाजन में बताया गया है कि 2 वर्ष की कन्या कुमारी, 3 वर्ष की कन्या त्रिमूर्ति, 4 वर्ष की कन्या कल्याणी, 5 वर्ष की कन्या रोहिणी, 6 वर्ष की कन्या कालिका, 7 वर्ष की कन्या चंडि,का 8 वर्ष की कन्या शांभवी, 9 वर्ष की कन्या दुर्गा और 10 वर्ष की कन्या सुभद्रा कहलाती है।

दशहरे के उत्सव में दुर्गा अष्टमी के दिन कन्या पूजन की प्रथा उत्तर भारत में प्रचलित है। अविवाहित बालिकाएं अलग-अलग परिवारों में मां दुर्गा की प्रतिनिधि के रूप में आमंत्रित की जाती हैं। उनके आने पर गृह लक्ष्मी द्वारा उनका पद प्रक्षालन किया जाता है और उन्हें सुसज्जित आसन पर बैठाया जाता है तथा पूजन उपहार और भोजन प्रसाद समर्पण के साथ कन्या पूजन संपन्न होता है। देश में सेवा भारती ने इसे एक अभियान का स्वरूप दिया। सरकारी स्तर पर कन्या भ्रूण हत्या को रोकने और लिंगानुपात में सुधार करने के लिए कन्या पूजन का कार्यक्रम शुरू किया गया।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लाड़ली लक्ष्मी योजना शुरू करने के साथ सरकारी कार्यक्रमों के शुभारंभ पर कन्या पूजन की परंपरा शुरू करवाई। सेवा भारती के प्रयासों से अनेक सेवा बस्तियों से आने वाली निर्धन एवं तथाकथित अस्पृश्य जातियों की बालिकाएं उच्च संस्कृति के शिक्षित संपन्न और मध्यम श्रेणी के परिवारों में यह संपन्न सम्मान प्राप्त करती हैं। इस परंपरा से ही हीनता और संपन्नता का भेद मिटाकर उच्च निम्न के मनोविकार स्वत: समाप्त होते दिखाई देते हैं।

हो. वे. शेषाद्रि ने लिखा है-उत्तर भारत के अनेक भागों में दुर्गा देवी के प्रकृति करण के रूप में कन्या कुमारी या अविवाहित आ के पूजन की परंपरा है। अब तक कन्या पूजन का कार्य अपने अपने पड़ोस में किया जाता था जो अपना वास्तविक अर्थ हो चुका है। दिल्ली, हरियाणा, मेरठ, बृज और उत्तरप्रदेश के अन्य क्षेत्रों के स्वयंसेवकों ने इस प्रथा को एक नया अर्थ दिया है। यहां दिल्ली का एक दृष्टांत दिया जा रहा है जो इस नई दिशा का परिचायक है।

नगर के विभिन्न भागों से 10000 से ऊपर कन्या पूजन में सम्मिलित हुईं इनमें से लगभग 5000 सेवा बस्तियों से थीं। 1000 उच्च वर्गीय परिवारों में सभी कन्याओं का पूजन समान भक्ति भाव और उत्साह के साथ किया गया। पूजन का कार्य स्वत: ही परिवार के वयोवृद्ध व्यक्ति या दंपति के द्वारा कन्याओं के चरण प्रक्षालन से आरंभ होता है। तत्पश्चात उन्हें तिलक किया जाता है। इसी रीति से उच्च वर्ग के क्षेत्रों में कन्याओं को पूजन के लिए बलजीत नगर सेवा बस्ती में आमंत्रित किया गया था।
स्वभावत: ऐसे कार्यक्रम समाज के दोनों वर्गों के मन पर एक ही हिंदू समाज के अंग होने की अमिट छाप छोड़ते हैं। कन्याएं भी स्वयं में दैवी अंश का अनुभव करती हैं और निष्कलंक एवं उदात्त जीवन जीने के लिए प्रेरित होती हैं।

इस प्रकार जो सामाजिक समरसता उत्पन्न होती है उसे अन्य बहुत से अवसरों पर तज्जन्य सहज व्यवहार के रूप में और बल मिलता है। यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता अर्थात जहां नारियों की पूजा होती है वहां देवताओं का वास होता है। यह उद्घोष हिंदू समाज से कन्या भ्रूण हत्या ही नहीं, नारी के प्रति समस्त अपराधों को समूल समाप्त करने की क्षमता रखता है। जरूरत है इस उद्घोष को जीवन में उतारने की। नव दुर्गा उत्सव पर कन्या पूजन हवन हेतु अग्नि प्रदान करने वाली कन्या का पूजन हमारी संस्कृति में कन्या के महत्व को रेखांकित करता है। आज पुन: उसी भावना को बलवती बनाने की आवश्यकता है। वर्तमान समाज की कई समस्याओं का समाधान भी इसी में है।

दूसरे धर्मों ने भी कन्या को मान दिया

इस्लाम के पैगंबर मोहम्मद साहब ने कन्या हत्या रोकने के लिए भाषण देने, आंदोलन चलाने और ‘कानून, अदालत या जेलÓ का प्रकरण बनाने के बजाय केवल इतना कहा है कि जिस व्यक्ति के बेटियां हों, वह उन्हें जिंदा गाड़कर उनकी हत्या न कर दें, उन्हें सप्रेम स्नेहपूर्वक पालें, पोषे। उन्हें नेकी, शालीनता, सदाचरण, ईश परायणता की उत्तम शिक्षा दीक्षा दें। बेटों को उनसे बढ़कर न मानें। एक रिश्ता ढूंढकर बेटियों का घर बसा दें तो वह स्वर्ग में मेरे साथ रहेगा।

मुस्लिम समाज कुरान शरीफ की इस प्रलोभन भरी शिक्षा को अपनाकर बेटी को अच्छी परवरिश से स्वर्ग प्राप्ति का अवसर मानकर प्रसन्न हो सकता है और लालच में ही सही, पर लड़कियों के प्रति अपराध रुक सकते हैं। जरूरत है इस विश्वास में भरपूर आस्था की। कुरान में कहा गया है कि जन्नत में हिसाब किताब वाले दिन जिंदा गाड़ी गई बच्ची से अल्लाह पूछेगा कि वह किस जुर्म में कत्ल की गई थीं इस तरह कन्या वध करने वालों को अल्लाह की ने चेतावनी भी दी। ईसाई समाज में भी पत्नी को बेटर हाफ का दर्जा और लेडीज फर्स्ट की संकल्पना नारी के प्रति सम्मान की सूचक है। जैन संप्रदाय में तो छोटे से छोटे कीटाणुओं तक की हिंसा वर्जित है। इस तरह अन्य धर्मों में भी मां के महत्व के अनेकानेक उदाहरण मिलते हैं।

नवरात्रि में विधान

श्री दुर्गा के अनन्य भक्तों को वर्ष में दो बार आने वाले नवरात्रि के त्योहार की अष्टमी अथवा नवमी तिथि को यथाशक्ति कुमारी कन्याओं को भोजन कराना चाहिए। इन कन्याओं की संख्या 9 अति उत्तम अथवा यथाशक्ति दो होनी चाहिए। इनकी आयु 2 वर्ष से 10 वर्ष के भीतर होनी चाहिए क्योंकि विधान है कि इस बात का ध्यान रखें कि कन्या पूर्णता स्वस्थ हो।पूजन उपरांत कन्या से अपने मस्तक पर अक्षत लगवाएं और दक्षिणा देकर देवी को प्रसन्न करें।

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