जलियांवाला बाग अमिट स्मृति

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  • अश्विनी अग्रवाल, पूर्णकालिक सदस्य, राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 28 अगस्त को अमृतसर में पुनर्निर्मित जलियांवाला बाग स्मारक का उद्घाटन करेंगे। अंग्रेजों द्वारा किये गए भीषण नरसंहार की घटना के एक सदी से भी अधिक समय बीत जाने के बाद, देश इसकी प्रासंगिकता पर सवाल उठा सकता है। भारत ने सदियों से बहुत सारे आक्रमणों का सामना किया है, जिनमें हजारों निर्दोष लोगों की मौत हुई थी। प्रत्येक आक्रमण के बाद जिन्दगी चलती रही। यह दृष्टिकोण लोकप्रिय पंजाबी कहावत – खादा पीता लहे दा, बाकी अहमद शाहे दा (जो कुछ भी उपलब्ध है, खाते-पीते रहो;शेष को अहमद शाह अब्दाली लूट ले जाएगा)में परिलक्षित होता है। लेकिन यह कहावत जलियांवाला बाग त्रासदी को लेकर सिद्ध नहीं हो पाई, क्योंकि इसे लोग कभी भुला नहीं पायेंगे।

जलियांवाला बाग हत्याकांड में लगभग एक हजार निर्दोष लोगों को ब्रिटिश ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर ने बेरहमी से गोलियों से भून डाला था। ये लोग 13 अप्रैल 1919 को खुशी के त्योहार, बैसाखी को मनाने के लिए इक_ा हुए थे। इस नरसंहार ने घायल राष्ट्र की स्मृति पर एक दुखद व अमिट छाप छोड़ी है। इतिहास की इस त्रासदी के बारे में विभिन्न विद्वानों द्वारा कई पुस्तकें लिखी गयी हैं।

मार्च 1919 में रॉलेट एक्ट अधिनियम को लागू करना, पंजाब में मार्शल लॉ की घोषणा, पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट-गवर्नर माइकल ओ डायर की भूमिका, रेजिनाल्ड डायर द्वारा हत्याकांड को अंजाम देना और उसके बाद गठित हंटर समिति द्वारा सभी दोषियों को दोषमुक्त करना आदि ऐसी घटनाएं हैं, जिनके बारे में सभी जानते हैं और जिनकी पुनरावृत्ति की आवश्यकता नहीं है। यह अंग्रेजों की एक सुनियोजित गहरी साजिश थी, जिसके तहत भारतीयों को कुचलने के लिए अमानवीय कृत्यों के माध्यम से आतंक का राज स्थापित किया गया,जो किसी भी सभ्य देश के लिए अकल्पनीय रूप से शर्मनाक स्थिति थी।

अंग्रेजों के कार्यों के पीछे के कारणों का पता लगाने के लिए तत्कालीन ब्रिटिश प्रशासन के मनोविज्ञान को समझना होगा। तभी यह स्पष्ट हो पायेगा कि आकस्मिक रूप से होने वाली यह अकेली घटना नहीं थी, जो एक रुग्ण दिमाग के अविचारित कार्यों के कारण घटित हुई थी। भारत के 1857 के पहले स्वतंत्रता आन्दोलन बाद से, अंग्रेज बुरी तरह भयभीत हो गए थे। उनके शासन के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों की किसी भी पुनरावृत्ति की संभावना ने उन्हें बहुत डरा दिया था। 20वीं सदी की शुरुआत में लाला हरदयाल, लाला लाजपत राय और अजीत सिंह जैसे नेताओं को निर्वासित कर दिया गया था, लेकिन इससे भी अंग्रेजों का भय कम नहीं हुआ।

कुछ राजनीतिक नेताओं के नरम रवैये के आधार पर उन्होंने सोचा कि अत्यधिक प्रताडऩा के उपाय से वे राष्ट्रीय भावना के उदय को आसानी से दबा सकते हैं, ताकि उनका शासन निरंतर जारी रहे। भारतीयों में राष्ट्रीय भावना के जाग्रत होने से अंग्रेज पूरी तरह बेखबर रहे। प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1918) के दौरान ब्रिटेन तथा इसके सहयोगी देशों के पक्ष में भारतीय जनता और सैनिकों की बहादुरी के प्रति भी अंग्रेज पूरी तरह कृतघ्न बने रहे। एक छोटा-सा बहाना, यहां तक कि हड़ताल जैसा एक शांतिपूर्ण विरोध भी उनकी बर्बर कार्रवाई के लिए पर्याप्त था।

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