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अमेरिकी सैनिकों की वापसी वामपंथी साजिश तो नहीं?

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प्रमोद भार्गव, वरिष्ठ पत्रकार
pramod.bhargava15 @gmail.com

ताकतवर अमेरिकी सैनिकों की अफगानिस्तान से एकाएक वापसी के फैसले से दुनिया हैरान है। पूर्ण रूप से सेना की वापसी के बाद अफगानिस्तान में घटनाक्रम किस तरह की करवटें लेगा, इस प्रश्न का उत्तर अंतरराष्ट्रीय सामरिक व कूटनीतिज्ञ जानकारों के पास भी नहीं है। परंतु अब अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी के सांसद जिम बैंक्स के बयान के बाद इस पहेली पर पड़ी धूल छंटती दिख रही है।

दरअसल यह सवाल पूरी दुनिया में उठ रहा है कि क्या अमेरिका व मित्र राष्ट्रों की सेनाएं इतनी कमजोर हैं कि लोकतंत्र व मानवता विरोधी तालिबान के समक्ष घुटने टेक दें? इस पृष्ठभूमि में अब समझ आ रहा है कि अमेरिका के जो बाइडेन के नेतृत्व वाली डेमोक्रेटिक सरकार का यह सब किया-धरा है। आशंका जताई जा रही है कि जिस चीन के साथ पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आरपार की लड़ाई लडऩे की ठान ली थी, उसी के समर्थक तालिबानियों के समक्ष बाइडेन एकाएक झुक गए? क्या चीन और बाइडेन ने वामपंथी वैचारिक मत समर्थन के चलते ऐसा किया ? और फिर एकाएक फौज को अफगान से वापस बुलाने की घोषणा कर दी?

हालांकि अमेरिकी सेना की वापसी का तालिबान से समझौता कतर की राजधानी दोहा में फरवरी 2020 में डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में ही हुआ था। लेकिन ट्रंप ने तालिबान के इस दावे को मानने से इंकार कर दिया था कि वह अफगानिस्तान का इस्लामिक आका है। ट्रंप आनन-फानन में हथियारों का जखीरा अफगान की धरती पर ही छोड़कर सेना वापसी के पक्ष में भी नहीं थे। इस वजह का खुलासा अब अमेरिका की विपक्षी पार्टी रिपब्लिकन करने लगी है। पार्टी के सांसद जिम बैंक्स ने कहा है कि बाइडेन सरकार की जल्दबाजी की वजह से तालिबानियों को अफगान में बड़ी ताकत मिल गई है।

तालिबान के हाथ 85 बिलियन डॉलर के अमेरिकी सेना के अस्त्र-शस्त्र लग गए हैं। इनमें 75 हजार सैनिकों को ढोने वाले वाहन, 200 से ज्यादा विमान और हॉक हेलिकॉप्टर, 6 लाख लघु व मझौले हथियार और बड़ी मात्रा में गोला-बारूद शामिल हैं। यह ताकत इतनी बड़ी है कि तालिबानियों के पास दुनिया के 85 प्रतिशत देशों से कहीं ज्यादा ब्लैक हॉक लड़ाकू हेलिकॉप्टर आ गए हैं। इस हवाई ताकत से तालिबानी पगलाकर कहीं भी कहर ढा सकते हैं। इनमें नाइट डिवाइस और बुलैटप्रुफ जैकेट भी हैं। हालांकि तालिबान के हाथ वे बायोमेट्रिक लैपटॉप व कंप्युटर भी आ गए हैं, जिनमें अमेरिका की मदद करने वाले अफगानियों के नाम व पते दर्ज हैं। साफ है, तालिबानी इन लोगों से चुन-चुन कर क्रूर बदला लेंगे ? अमेरिकी सेना के पूर्व सलाहकार जोनाथन स्क्रोडन का कहना है कि लड़ाकू विमानों और हेलिकॉप्टरों पर कब्जा कर लेना तो आसान है, लेकिन इनका इस्तेमाल कठिन है। क्योंकि इन्हें उड़ाने के लिए पूरी एक प्रशिक्षित टीम की जरूरत पड़ती है।

उड़ान भरने के बाद इनमें सुधार की भी जरूरत होती है। इनकी देखभाल के लिए निजी ठेकेदार थे, जो अफगान के तालिबान के कब्जे में आने से पहले ही लौट आए हैं। फिर भी खतरे से इंकार नहीं किया जा सकता है। अलबत्ता एक शंका यह भी उठ रही है कि आतंकियों के हाथ जो हथियार आए हैं, उनकी वे कालाबजारी भी कर सकते है। तालिबान बदला हुआ दिखाने का दावा भले ही कर रहा हो, लेकिन उसके साथ जो अन्य आतंकी संगठन हैं, उनसे दूरी बनाना मुश्किल है। यही वजह है कि तत्काल 5 लाख से भी ज्यादा अफगानी जान जोखिम में डालकर देश छोडऩे को तैयार हैं। क्योंकि इन्हें अपना भविष्य अनिश्चिता के अंधकार में डूबा लग रहा है।

बावजूद तालिबानी इन हथियारों को पाकर इसलिए मजबूत लग रहे हैं, क्योंकि जो 80 हजार अफगानी सैनिक तालिबानियों के सामने समर्पण कर चुके हैं, उनमें से कुछ इन हथियारों व हेलिकॉप्टरों को चलाने में अमेरिकी प्रशिक्षकों द्वारा दक्ष कर दिए गए हैं। धर्म व नस्लीय एकरूपता के चलते ये तालिबान के साथ खड़े हो गए हैं। जिम बैंक्स का बयान इसलिए भी तार्किक है, क्योंकि बाइडेन चुनाव-प्रचार के दौरान कहते रहे हैं कि वे चीन से तनावपूर्ण संबंध नहीं रखेंगे।

जबकि डोनाल्ड ट्रंप ने चीन द्वारा कोविड-19 वायरस के कृत्रिम रूप में सृजन की आशंकाओं के चलते अनेक प्रतिबंध लगा दिए थे। इस आशंका की पुष्टि अमेरिका द्वारा की गई उस एअर स्ट्राइक से भी हुई है, जिसके चलते आईएस-खुरासान गुट के उस चरमपंथी को मार दिया है, जिसने काबुल हवाई अड्ढे पर आत्मघाती हमले की साजिश रची थी।

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