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अंतर्राष्ट्रीय ओजोन दिवस: पर्यावरण संरक्षण में स्वच्छ ऊर्जा की भूमिका

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ओजोन लेयर के संरक्षण की जागरूकता के लिए ‘अंतर्राष्ट्रीय ओजोन दिवस’ के रूप में मना रहा है। ये वही ओजोन लेयर है, जो सूर्य की हानिकारक अल्ट्रा-वायलेट किरणों को पृथ्वी की सतह पर पहुँचने से रोकने के साथ साथ हमारे लिए एक ढाल बनकर, हमें मुख्यत: त्वचा संबंधी कैंसर और अन्य हानिकारक रोगों से भी काफी हद तक बचाती है।

  • अमृतेश श्रीवास्तव, वरिष्ठ प्रबंधक (मीडिया), एन पी सी आई एल, मुंबई
    mcuread.pavitra@gmail.com


पर्यावरण के प्रति सामाजिक प्रतिबद्धता की दृष्टि से पूरा विश्व, आज के दिन को ओजोन लेयर के संरक्षण की जागरूकता के लिए ‘अंतर्राष्ट्रीय ओजोन दिवस के रूप में मना रहा है। ये वही ओजोन लेयर है, जो सूर्य की हानिकारक अल्ट्रा-वायलेट किरणों को पृथ्वी की सतह पर पहुँचने से रोकने के साथ साथ हमारे लिए एक ढाल बनकर, हमें मुख्यत: त्वचा संबंधी कैंसर और अन्य हानिकारक रोगों से भी काफी हद तक बचाती है।

मगर जिस प्रकार से मानव निर्मित गतिविधियों और पर्यावरणीय प्रदूषण (कार्यालयों, घरों एवं गाडिय़ों में प्रयुक्त होने वाले एयर कंडीशनर्स और रेफ्रीजेरेटर्स द्वारा निकलने वाली क्लोरोफ्लोरो कार्बन, हयड्रोफ्लोरो कार्बन, हैलोन्स इत्यादि के उत्सर्जन से) के चलते पिछले कुछ वर्षों मेंइस लेयर को नुकसान पहुंचा, इस लेयर का संरक्षण हम सभी का उत्तरदायित्व है।

वर्ष 1987 में आज ही के दिन, मोंट्रियल प्रोटोकॉल के तहत विश्व के 197 देशों से अनुग्रह किया गया था, कि ओजोन लेयर को नुकसान पहुंचाने वाले हानिकारक तत्वों के उत्पादन को धीरे-धीरे ख़त्म किया जाए औरवर्ष 2050 से 2070 के बीच में, इस लेयर को फिर से 1980 के दौरान वाले अपने वास्तविक स्वरूप में लाया जाए। इसी के तहत पिछले कुछ समय में विश्व स्तर पर किए गए अनुसंधान और विशेष प्रयासों के चलते इस लेयर के संरक्षण में काफी हद तक सफलता भी प्राप्त हुई है, जो कि संतोषप्रद है ।

मगर आज जो सबसे ज्यादा विचलित करने वाली एक समस्या हमारे सामने उभर कर आई है, वो है बढ़ता हुआ वैश्विक तापमान और उसके कारण होने वाला जलवायु परिवर्तन । अभी हाल ही में इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आई पी सी सी) द्वारा प्रकाशित 6ह्लद्ध असेसमेंट रिपोर्ट ने पूरी दुनिया का ध्यान जिस तरह से अपनी ओर आकर्षित किया है, वो निसंदेह हम सब के लिए गहन चिंता का एक बड़ा विषय साबित हो सकता है ।

विकास की बुलंदियों को छूने की होड़ के चलते जिस प्रकार से पर्यावरण की उपेक्षा की गयी है, वो दिन दूर नहीं जब हमारी आने वाली पीढिय़ों को इसका गंभीर दुष्परिणाम झेलना पड़ेगा। इस रिपोर्ट के अनुसार, आगामी 20-30 सालों में पृथ्वी के वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेलशियस तक की वृद्धि होने का अनुमान लगाया गया है, जो निसंदेह ये सोचने पर मज़बूर करता है कि आखिऱ हमेंविकास की क्या कीमत चुकानी होगी । ये रिपोर्ट ये भी दर्शाती है कि हम अपने पर्यावरण को बचाने के लिए कारगर और ठोस कदम उठाने में बिलकुल भी सफल नहीं हो पाये हैं और ये पूरी तरह से प्रकृति के नैसर्गिक रूप में बदलाव के लिए मानवीय हस्तक्षेप को परिलक्षित करती है।

वर्ष 2015 में पेरिस में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय क्लाइमेट कॉन्फ्रेंस, कॉप-21 (21 कॉन्फ्रेंस ऑफ दा पार्टीज) सम्मेलन में विश्व के 196 देशों ने संकल्प लिया था कि पर्यावरण के वैश्विक तापमान वृद्धि को प्री-इंडस्ट्रियल लेवेल से ज्यादा न बढ़ाते हुए इस वृद्धि को 2 डिग्रीसेलशियस या फिर उससे भी कम केवल 1.5 डिग्री सेलशियस के आस पास रखा जाएगा और इसके लिए तमाम विकसित देशों को 21वीं सदी के मध्य तक कार्बन फुटप्रिंट में पूरी तरह से कटौती करने के लिए आग्रह किया गया था । लेकिन इस बात का जरा भी अनुमान नहीं था कि ये रिपोर्ट इतनी जल्दी ही सभी प्रयासों को धता बताते हुए आपको चौंकने पर मज़बूर कर देगी । इस रिपोर्ट का बारीकी से आंकलन करते हुए सम्पूर्ण विश्व को इस गंभीर चुनौती का सामना करने के लिए वर्तमान में की जा रही कोशिशों को और भी अधिक प्रभावी बनाने के लिए प्रयास करने होंगे ।


आज वास्तव में धरती का बढ़ता हुआ तापमान सबके लिए चिंता का विषय है, क्योंकि विगत कुछ वर्षों में जिस तरीके से असहनीय गर्मी में बढ़ोत्तरी हुई है, उससे जंगलों में भीषण आग का लगना, हीट वेव्स का बढऩा, ग्लेशियर्स का पिघलना, कहीं असमय और मूसलाधार बरसात और उसके पश्चात प्रलयकारी बाढ़ का प्रकोप,तो कहीं सूखे की भयावह स्थिति,जाड़ों के दिनों की संख्या में कमी एवं गर्मी के दिनों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी इत्यादि । अगर आज देखा जाए तो विश्व का कोई भी ऐसा देश बचा नहीं है, जो इस प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं से अछूता रह गया हो। इस रिपोर्ट में भारत और अन्य साउथ एशियाई देशों के लिए भी जिस प्रकार से पर्यावरण असंतुलन की तस्वीर पेश की गयी है वो वास्तव में हमारे लिए ख़तरे की घंटी है ।

इस रिपोर्ट के मुताबिक जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा प्रभाव उन शहरों पर पड़ेगा जो ख़ास तौर पर समुद्र के किनारे बसे हैं । मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे भारतीय महानगरों के लिए भी एक बड़ी चुनौती आने वाली है जहां बताया गया है, कि अगली एक सदी में समुद्र के जल स्तर में काफी बढ़ोत्तरी देखने को मिल सकती है, जिससे कोस्टललाइन पर गुजऱ बसर करने वाले लोगों के जीवन यापन पर निसंदेह रूप से प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है । तो ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यही उठता है कि आखिऱ इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है? हम या हमारी महत्वकांक्षा जो हमें, हमारे संसाधनों के लगातार दोहन करने के लिए प्रेरित कर रही है। तो क्या अब वो वक्त आ गया है, जहां हमें अपनी महत्वकांक्षाओं पर कुछ हद तक अंकुश लगाने की जरूरत है।

एक बात तो तय है कि अगर विकास चाहिए तो पर्यावरण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है । इसे भी हमें साथ ले कर चलना होगा, क्यूंकि पर्यावरण की कीमत पर अर्जित किया गया विकास आगे चलकर हमे विनाश की तरफ ही अग्रसर करता है । आज पेट्रोल और डीजल गाडिय़ों के साथ साथ थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाला धुंआ एवं कल-कारखानों से निकलने वाली अन्य हानिकारक गैसों के उत्सर्जन के चलते वातावरण को अत्यंत नुकसान पहुंचा है और जिसकी वजह से सम्पूर्ण विश्व को आज जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग का सामना करना पड़ रहा है ।

इसलिए जहां एक ओर पर्यावरण की सुरक्षा हमारी प्रतिबद्धता होनी चाहिए वहीं दूसरी ओर पहले से चल रहे विश्व स्तरीय अनुसंधानोंऔर उनके परिणामों के समुचित क्रियान्वयन को और भी अधिक प्रभावी बनाने होंगे, जिससे पर्यावरण को बिना नुकसान पहुंचाए हम दीर्घकालिक विकास के लक्ष्यों को हासिल कर सकें । क्यूंकि ये समस्या गंभीर है, इसीलिए हमें कार्बन डाइ ऑक्साइड एवं अन्य ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर जल्द ही लगाम लगाने की आवश्यकता है, ताकि आगे आने वाले खतरों को कम किया जा सके ।

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