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नारी संचेतना के आग्रही सप्रेजी

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डॉ. मंगला अनुजा

भारतीय नवजागरण का एक आयाम समाज सुधार भी था। सप्रेजी का नारी संचेतना विषयक सोच इसकी पुष्टि करता है। उन्हीं के शब्दों में उनके विचारों का अनुशीलन समीचीन होगा। ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ के दूसरे अंक में ‘नारी धर्म’ शीर्षक से ‘गृहकार्य में स्त्री का अधिकार’ के अन्तर्गत वे लिखते हैं – ”घर के सब भले बुरे कामों में स्त्री का अधिकार सचमुच बड़ा प्रबल और दुर्निवार होता है। बिना स्त्री के ‘घर’ ही नहीं कह सकते। कहा भी है कि ‘गृहिणी गृहमुच्यते’ गृहिणी अर्थात् गृह की स्वामिनी कुल स्त्री को ही गृह कहते हैं। अब यदि इतना बड़ा अधिकार उसे न दिया जाता तो मनुष्य को गृहस्थाश्रम में रहने से क्योंकर सुख प्राप्त होता?’

अंक 3 में ‘लड़कियों की बातचीत’ में पढऩे को मिलता है- ”सचमुच विलायती पत्रों में हमारी बहुत कुछ निन्दा की गई है, उन पत्रों को पढ़कर उसने मुझे ऐसा बतलाया कि, हिन्दुस्तान की सब स्त्रियाँ अज्ञानी, मूर्ख और बेसमझ होती हैं, उन्हें अच्छा शिक्षण नहीं मिलता, छुटपन ही में उनका ब्याह हो जाता है। …. हाँ, उस बीबी ने जो लिखा है कि इस देश के लोग अपनी स्त्रियों को कैदियों की नांई घर में बन्द रखते हैं, पुरूषों की अपेक्षा उनको नीच समझते हैं, उन्हें लिखना-पढऩा बिलकुल नहीं आता … ये सब परदेशियों के मिथ्या आरोप हैं, विलायत में रहने वाले हमारे घर का हाल क्या जानें? ….

हिन्दू धर्म के अनुसार किसी धर्मकृत्य में पुरुषों को अकेले बैठने का अधिकार नहीं है … उसको ‘सहधर्म-चारिणी’ यह अत्युच्च पद प्राप्त हुआ है … सरस्वती जी, यदि तुम्हारा कहना सच मानें तो किसी स्त्री के जब लड़का होता है तब उसकी बधाई बजती है … और जब लड़की होती है तब कुछ भी आनन्द नहीं मनाते … स्त्री को ‘अबला’, ‘भीरू’ आदि हीनतासूचक शब्दों से सम्बोधन करते हैं, इसका क्या मतलब? … वे लोग समझते हैं कि हम निरी अज्ञान, जंगली हैं … स्त्रियों को शिक्षण देने से ज्ञान का मार्ग खुल जाता है …

फुरसत के समय नींद, आलस और लड़ाई झगड़े में वे अपना बहुमोल समय नहीं बितातीं … अंग्रेजी बीबीयाँ हमसे अधिक विद्या सीखती हैं पर मैंने सुना है कि उनकी तबियत बड़ी नाजुक होती है … बड़ी मिजाजिन और फजूलखर्च करने वाली होती हैं, वे अपने पति की थी कुछ परवाह नहीं करतीं … बम्बई की लड़कियाँ …. एक दो पुस्तकें पढ़कर टूटी-फूटी विद्या आते ही जवान-जवान लड़कियां ‘प्रेम पुस्तकें’ पढऩे लगीं, इससे तो यही भला है कि उनको लिखना पढऩा कुछ भी न सिखाया जाय ….. खराब पुस्तकों के पढऩे से परिणाम भी खराब होगा, इसमें क्या शक है? परन्तु यह लिखने-पढऩे का दोष नहीं।’

महिला पत्रकारिता को प्रोत्साहन देते हुए सप्रे जी ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ के अंक 10 में ‘भारत भगिनी मासिक पत्रिका’ की समीक्षा करते हैं- ”यही एक स्त्रियों की सबसे पुरानी मासिक पत्रिका है, जिसकी संपादिका श्रीमती हरदेवी धर्मपत्नी मुं. रोशनलाल बी.ए. व्यारिस्टर एट ला और पुत्री स्वर्गवासी राय कन्हैयालाल एक्जीक्यूटिव इंजीनियर लाहौर हैं। इसमें स्त्रियों के हाथ के लिखे हुए बड़े सुन्दर सुन्दर लेख उत्तम रीति से छपते हैं। स्त्रियों की वर्तमान दशा का पूरा चित्र खींचकर सर्वसाधारण में दिखाना तथा उन्हें अधोगति से निकालने के सुगम उपाय बताना इसका मुख्य उद्देश्य है।

राष्ट्र की उन्नति स्त्रियों से

‘मर्यादा’ 1915 में सप्रेजी का लेख ‘स्त्रियाँ और राष्ट्र’ छपा, जिसमें वे लिखते हैं – ”राष्ट्र की उन्नति और अवनति स्त्रियों की उन्नति और अवनति पर अवलम्वित है। … प्राय: सब धर्मों की प्रवृत्ति सामाजिक विषयों पर नियम बनाने की ओर देख पड़ती है। इससे विवाह को धार्मिक विधि का स्वरूप प्राप्त हो गया और प्रत्येक स्त्री के लिए विवाह एक आवश्यक संस्कार बन गया। इसका यह परिणाम हुआ कि स्त्रियों की बहुत सी स्वाधीनता मार्यादित हो गई।’

”जब तक समाज में स्त्री और पुरुष दोनो के अधिकार समान भाव के न होंगे तब तक समाज की उन्नति न होगी और स्त्री पुरुषों में स्वाभाविक प्रेम का बंधन न रहेगा।’ उनकी मान्यता थी – ”जिन राष्ट्रों में स्त्रियों की स्वाधीनता तथा उनके हक पर पूरा ध्यान दिया जाता है, वे उन्नति के मार्ग में एक एक कदम आगे बढ़ते चले जाते हैं और जो राष्ट्र इन बातों पर ध्यान नहीं देते वे निस्तेज और बलहीन होकर पराधीनता की कड़ी जंजीर में बंध जाते हैं।’

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