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पाठ्य पुस्तकों में सामने आता भारत बोध

  • प्रमोद भार्गव
    राष्ट्रीय शैक्षिक एवं अनुसंधान और प्रशिक्षण परिशद् (एनसीईआरटी) की पुस्तकों में पढ़ाए जाने वाले पाठों में बदलाव की शुरूआत साकारात्मक नजरिए से शुरु हो गई है। अब 12वीं कक्षा की राजनीति विज्ञान की किताब में से बाबरी मस्जिद, हिंदुत्व की राजनीति 2002, गुजरात दंगों से जुड़े पाठ को हटा दिया है। इसकी जगह ‘राम जन्मभूमि आंदोलन की विरासत क्या है ‘इस पाठ को जोड़ा गया है। इससे पहले इतिहास की पुस्तकों में राखीगढ़ी और आर्यों के मूल स्थान से जुड़े पाठ जोड़े गए है। इन परिर्वतनों को लेकर राजग सरकार पर पाठ्यक्रम में कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों ने शिक्षा में भगवाकरण के आरोप लगाए है। इस सिलसिले में एनसीईआरटी के निदेशक दिनेश सकलानी का कहना है कि पढ़ाई का उद्देश्य हिंसक नागरिक बनाना नहीं है। हमें छात्रों को दंगों के बारे में क्यों पढ़ाना चाहिए। वैसे भी पाठ्यपुस्तकों में बदलाव एक वैश्िवक प्रथा है, जो शिक्षा के हित में है। विद्यार्थियों को इतिहास में हुई हिंसक और बर्बरतापूर्ण घटनाओं के बारे में पढ़ाना जरूरी नहीं है, इसलिए साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर कई अहम बदलाव किए गए हैै। सकलानी ने इशारों में कहा है कि जब 1984 के दंगों से जुड़े पाठों को हटाया गया था, तब उस पर इतना हंगामा नहीं हुआ था। जाहिर है, विभिन्न विषयों के पाठों में हो रहे बदलाव से छात्र अब भारत बोध की गरिमा से गौरवान्वित होंगे। एनसीआरटी की पुस्तकों में वाकई सकारात्मक बदलाव हो रहे है। इसके पहले भारतीय ज्ञान प्रणाली के संदर्भ में महरौली के लौहे स्तंभ के बारे में भी बताया गया है। भारतीय दुनिया में धातु विज्ञान से जुड़े अनुसंधानों के मामले में बहुत आगे थे। ऋग्वेद में लौहे के आविष्कार के बारे में बताया गया है। इसी क्रम में सोना, तांबा और कांसा धातुओं के आविश्कार किए गए। अतएव ऐसे पाठों को जोड़ना भारतीय विज्ञान की विरासत को छात्रों के सामने लाना है। इसी क्रम में भारत के इतिहास में आर्य अब आक्रामणकारी नहीं, बल्कि भारतीय मूल के रूप में दर्शाए गए हैं। 21 वर्ष की खींचतान और दुनियाभर में हुए अध्ययनों के बाद आखिरकार यह तय हो गया कि ‘आर्य सभ्यता’ भारतीय ही थी। राखीगढ़ी के उत्खनन से निकले इस सच को देश के पाठ्यक्रमों में शामिल करने का श्रेय ‘राखीगढ़ी मैन‘ के नाम से प्रसिद्ध हुए प्राध्यापक वसंत शिंदे को जाता है। एनसीईआरटी की कक्षा 12वीं की किताब में बदलाव किया गया है। इसमें इतिहास की पाठ्य पुस्तक में ‘ईंट, मोती और हड्डियांःहड़प्पा सभ्यता‘ नामक पाठ में आर्यों को मूल भारतीय होना बताया है। इसके अलावा कक्षा 7, 8, 10 और 11 के इतिहास और समाजशास्त्र के पाठ्यक्रमों में भी बदलाव किया गया है।
    इतिहास तथ्य और घटना के सत्य पर आधारित होता है। इसलिए इसकी साहित्य की तरह व्याख्या संभव, नहीं है। विचारधारा के चश्मे से इतिहास को देखना उसके मूल से खिलवाड़ है। परंतु अब आर्यों के भारतीय होने के संबंधी एक के बाद एक शोध आने के बाद इतिहास बदला जाने लगा है। इस सिलसिले में पहला शोध स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय के टॉमस कीवीषील्ड ने किया था। 2003 में ‘अमेरिकन जर्नल आॅफ ह्यूमन जेनेटिक्स‘ में प्रकाशित इस शोध-पत्र में सबसे पुरानी जाति और जनजाति के वंषाणु (जीन) के आधार पर आर्यों के भारत का मूल निवासी बताया गया था। हालांकि वर्श 2009 में वाराणसी हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो लालजी सिंह और प्रो थंगराज ने भी आनुवांशिक परीक्षण के बाद आर्यों को मूल भारतीय बताया था। 2019 में प्रो वसंत शिंदे द्वारा राखीगढ़ी उत्खनन से मिले 4000 साल पुराने वंशाणु की जांच में सबसे बड़ा सच सामने आया। शोध में पाया गया कि राखीगढ़ी से मिला जीन वर्तमान के प्रत्येक भारतीय व्यक्ति में उपलब्ध हैं। इसके आधार पर यह तथ्य स्थापित हुआ कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति आर्यों द्वारा निर्मित है। एनसीआरईटी के इतिहास पाठ्यक्रम निर्धारण समिति के अध्यक्ष बनने पर प्रो शिंदे ने इस तथ्य के आधार पर पाठ्यक्रम में संशोधन कराए हैं। इसी पुस्तक में मराठा शासक छत्रपति शिवाजी के नाम के साथ छत्रपति और महाराज जोड़ा गया है। इसी तरह कक्षा 12वीं के समाजशास्त्र विषय के पाठ्यक्रम से सांप्रदायिक दंगों के चित्र हटाए गए है। इतिहास पुस्तकों में यह बदलाव सिनौली-राखीगढ़ी में हुए उत्खननों में मिले साक्ष्यों के आधार पर संभव हुआ है।
    गोया, अब यह अवधारणा पलट गई है कि आर्य न तो विदेशी थे और न ही उन्होंने कभी भारत पर आक्रमण किया। अतएव आर्य भारत के मूल निवासी थे। हरियाणा के हिसार जिले के राखीगढ़ी में की गई पुरातत्वीय खुदाई में 5000 साल पुराने मिले दो मानव कंकालों के डीएनए अध्ययन के निश्कर्ष से यह धारणा सामने आई है। इन कंकालों में एक पुरुष और एक स्त्री का था। इनके कई नमूने लेकर उनका आनुवांशिक अध्ययन पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग, भारत सरकार, डेक्कन विश्व-विद्यालय पुणे, सीसीएमबी हैदराबाद और हार्वड स्कूल आॅफ मेडिसन बोस्टन यूएसए ने किया है। इस डीएनए विश्लेषण में यह भी स्पष्ट हो गया है कि आर्य और द्रविड़ मूल भातीय हैं। राखीगढ़ी हड़प्पा सभ्यता के सबसे बड़े केंद्रों में से एक है। करीब 300 एकड़ में फैले इस क्षेत्र में पुरातत्वविदों ने 2015 में उत्खनन किया था।
    आर्य हमलावर के रूप में विदेश से आए होते और नरसंहार किया होता तो मानव कंकालों के शरीर पर घावों के निशान होते। भारतीय संस्कृति और भाषाएं नष्ट हो गई होतीं। ऐसा होता तो आक्रमण की बात सिद्ध होती। व्यापार व पर्यटन आदि के लिए भारत में विदेशी समय-समय पर आते रहे हैं और भारतीय भी विदेश जाते रहे हैं। इन कारणों से जीन में मिलावट होती रही हैं। साफ है, आर्य भारत के ही थे। प्रोफेसर शिंदे ने राखीगढ़ी के उत्खनन के समय बताया था कि अलग-अलग खुदाई में 106 से भी ज्यादा नर-कंकाल मिले हैं। साथ ही भिन्न आकार व आकृति के हवन-कुंड और कोयले के अवषेश मिले हैं। तय है भारत में 5000 साल पहले हवन होते थे। यहीं सरस्वती और इसकी सहायक दृष्यवंती नदी के किनारे हड़प्पा सभ्यता के निशान मिले हैं। ये लोग सरस्वती की पूजा करते थे।आनुवांशिक संरचना के आधार पर हैदराबाद की संस्था ‘सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलाॅजी’ के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस शोध से जो निष्कर्ष सामने आए थे, उनसे स्पष्ट हुआ था कि मूल भारतीय ही ‘आर्य‘ थे। इस शोध का आधार भारतीयों की कोशिकाओं का आनुवंशिक ढांचा है, जिसका सिलसिलेबार अध्ययन किया गया।

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