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‘हिन्दी दिवस’: मातृभाषा में शिक्षा यानी शिक्षा का भारतीयकरण

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  • मनुष्य के सशक्तीकरण, जीवनस्तर के सुधार व निर्णय लेने की प्रक्रिया में शिक्षा की भूमिका

1991 मे लाए गए भूंडलीय आर्थिक उदारवाद के कारण जिस बेतुके ढंग से शिक्षा संस्थानों का व्यवसायीकरण हुआ और साहित्य व मानविकी विषयों को भी जिस बेढंगेपन से रोजगारोन्मुखी बनाने की कोशिश की गई, इससे शिक्षा के मूल पर आघात हुआ, विश्वविद्यालय अप्रजातांत्रिक हो गए।

  • प्रमोद भार्गव, साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार
    pramodbhargava15@gmail.com

नई शिक्षा नीति के चलन में आने के बाद मातृभाषाओं में शिक्षा की जो सर्वश्रेष्ठ देन होगी, वह नागरिक में राष्ट्रबोध जगाने के साथ उसका व्यक्ति के स्तर पर भारतीयकरण करना। कल का विद्यार्थी ही कालांतर में देश का नागरिक होता है। दरअसल अब नई शिक्षा नीति के अंतर्गत वास्तव में राष्ट्र की लुप्त कर दी गई सांस्कृतिक संपदा के महत्व को अंगीकार करते हुए ज्ञान, कर्म, संस्कार, भाषा, संस्कृति और कौशल दक्षता को विद्यार्थी में विकसित करने का काम मातृभाषाएं करेंगी।

मानव को मानवीय बनाने के यही मानविकी विषय हैं। व्यक्तित्व निर्माण की यही परिकल्पना व्यक्ति में राष्ट्रबोध का प्रादुर्भाव करती है। मूल्य-बोध के इन संस्कारों से संपूर्ण राष्ट्र में सांस्कृतिक चेतना का लोकव्यापीकरण होगा और सनातन मानवीय मूल्यों की सुरक्षा होगी। यही मूल्य न केवल व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाएंगे, बल्कि देश को भी आत्मनिर्भता के शिखर पर पहुंचाएंगे। देश की सांस्कृतिक संप्रभुता की पहचान को भी अक्षुण्ण बनाए रखने का काम करेंगे। कोरोना महामारी के दंश ने भी पुरातन मूल्यों को अपनाने का संदेश दिया है। एकल परिवारों की अवधारणा कौटुम्बिक महत्ता को जानने को उत्सुक हुई है। यही सब वे मूल्य थे, जिन्हें औपनिवेशिक अंग्रेजी शिक्षा ने सुनियोजित ढंग से पृथक किया और भारतीय नागरिक भारतीय सनातन मूल्यों को भूलता चला गया।

भारत में अंगे्रजों का शासन स्थापित होने के बाद एक समय तक अंग्रेजों की भाषा-नीति में बदलाव होता रहता था। सन् 1833 में मैकाले मिनिट्स के होते हुए ईस्ट इंडिया कंपनी ने अदालती तथा अन्य शासकीय कार्यों में अरबी-फरसी का मिश्रित रूप अपनाया था। सन् 1880 में कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना हुई। उस समय अंग्रेजी शासन की राजधानी कलकत्ता थी। जॉन ग्रिलक्राइस्ट उस कॉलेज के भाषा विभाग के अध्यक्ष बनाए गए। उन्होंने खड़ी बोली के प्रयोग को प्रोत्साहित किया और कंपनी सरकार की भाषा नीति तय करने में आवश्यक सुझाव दिए। वह हिंदी को हिंदुई तथा हिंदुस्तान कहते थे और उसके लिए रोमन लिपि को आवश्यक मानते थे, किंतु न तो हिंदी का नाम बदल सके और न ही लिपि। देवनागरी लिपि से संबंधित हिंदी का संघर्ष सफल रहा।

गिलक्राइस्ट के बाद मैकाले की भाषा-नीति मानी गई और उच्च शिक्षा से संस्कृत एवं हिंदी का माध्यम समाप्त कर दिया गया। उन्नीसवीं शताब्दी के चैथे दशक में सरकारी कामकाज में उर्दू को वरीयता दी गई और हिंदी को उपेक्षित कर दिया गया। उस युग में बनारस हिंदी का केंद्र था और बनारस की दो बड़ी हस्तियां हिंदी में लिख रहीं थीं। एक थे राजा शिवप्रसाद ‘सितारे हिंद और दूसरे भारतेंदु हरिशचंद्र। राजा शिवप्रसाद अंग्रेजी सरकार की सेवा में थे और अंग्रेजों की भाषा नीति का समर्थन करते हुए उन्होंने उर्दू का पक्ष लेते हुए हिंदी की निंदा की।

उनकी वफादारी देखकर सरकार ने उन्हें ‘सितारे हिंद की उपाधि दी। हरिशचंद्र ने सरकार की भाषा-नीति का विरोध किया और जगह-जगह जाकर हिंदी के समर्थन में सभाएं कीं। जनता ने हरिशचंद्र को ‘भारतेंदु की उपाधि से विभूषित किया। भारतेंदु की लोकप्रियता के सामने सितारे हिंद अस्त-पस्त हो गए। जॉन गिलक्राइस्ट जैसे अनेक अंग्रेज हिंदी के समर्थक थे। ऐसे अंग्रेजों में हेनरी पिनकोट ने भारतेंदु के समर्थन में हिंदी के पक्ष में बहुत काम किया। राजा शिवप्रसाद की तरह राजा लक्ष्मण सिंह (1826-96) भी सरकारी नौकर थे, किंतु उन्होंने हिंदी का समर्थन किया और उसी में लिखा भी।

इस दौरान देश में जो विवि और राज्यस्तरीय शिक्षा मंडल असितत्व में आए, उन्होंने अंग्रेजी विषयक पाठ्यक्रमों में आंग्ल साहित्य का अध्ययन, अध्यापन बीसवीं सदी की शुरूआत में ही कर दिया था। इस समय भारतीय लेखक जो भी कुछ अंग्रेजी में लिख रहे थे, उसे पाठ्यक्रम में शामिल कर दिया गया। इनमें ज्यादातर लेखक बंगाली थे और इन पाठ्यक्रमों की शुरूआत भी बंगाल में हुई। इन लेखकों की लिखने की पद्धति लगभग अंग्रेजियत में सराबोर थी। चारण-भाटों की शैली में इन्होंने अंग्रेजी का स्तुतिगान तो किया ही, तात्कालिक लाभ के लिए इनमें से कई क्रिश्चियन भी हो गए।

भारत की धरती पर अंग्रेजी का बीज बोने और इसे उर्वरा बनाने के पैरोकार मैकाले ने ऐसे लोगों का वजीफे दिलाए और लंदन की मुफ्त में सैर भी कराई। सही मायनों में ये तथाकथित अंग्रेजी के लेखक इंग्लैंड के बंधुआ साहित्यकार थे। इन्होंने अंग्रेजी के प्रभुत्व को स्थापित करने के उपायों के साथ विस्तार के मार्ग भी प्रशस्त किए। इनमें तोरूदत्त, माइकल मधुसूदन दत्त और मनमोहन घोष प्रमुख थे। गोया, ब्रिटिश हुक्मरानों के भय के चलते इन बंधुआओं से लेखन में भारतीयता का प्रभाव डालने की उम्म्ीद कतई नहीं की जा सकती थी।

जिस राष्ट्रीय चेतना को हम स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में लेते हैं, उस तरह के लेखन का भारतीय अंग्रेजी लेखकों में सर्वथा अभाव था। हालांकि ‘वंदे मातरम गीत के रूप में भारत को उसकी व्यापक राष्ट्रीयता की पहचान देने वाले महान बंगला उपन्यासकार बंकिमचंद्र चटर्जी न केवल बंगाल के चुनिंदा लेखकों में से एक थे, बल्कि उन्हें भारतीय अंग्रेजी साहित्य के शुरूआती लेखन का श्रेय भी जाता है। उन्होंने ‘राजमोहन वाइफ उपन्यास अंग्रेजी में लिखा था।

किंतु राष्ट्रीय स्वाभिमान के चलते कालांतर में उन्होंने केवल बंगला और संस्कृत में लिखने का संकल्प लिया और फिर अंग्रेजी में रचना-सृजन पर विराम लगा दिया। भाषाई अस्मिता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रकल्प का ऐसा अनूठा संकल्प था, जिसने वंदे मातरम के माध्यम से फिरंगी सत्ता को चुनौती देते हुए जनमानस में सर्वाधिक राष्ट्रबोध जगाने का काम किया।


साहित्य, मानविकी और मानवाधिकार विषयों का अध्ययन-अध्यापन व्यक्ति में वैचारिक उर्जा पैदा करने का काम करते हैं। इनके पढऩे से इच्छाशक्ति प्रबल होती है। लेकिन 1991 में लाए गए भूमण्डलीय आर्थिक उदारवाद के बाद जिस बेतुके ढंग से शिक्षा संस्थानों का व्यवसायीकरण हुआ और साहित्य व मानविकी विषयों को भी जिस बेढंगेपन से रोजगारोन्मुखी बनाने की कोशिशें हुईं, इससे शिक्षा के मूल पर आघात हुआ। विश्वविद्यालय अप्रजातांत्रिक हो गए।

शिक्षा परिसरों में व्यावसायिक स्थापना के लिए थाने तक खोलने पड़े। जाहिर है, ये उपाय शिक्षा के लोकव्यापीकरण, शिक्षा में गुणवत्ता लाने अथवा छात्र के चरित्र निर्माण की दृष्टिगत नहीं किए गए, बल्कि शिक्षा को औद्योगिक उत्पाद बना देने के लिए हुए। मनुष्य का सशक्तिकरण, जीवनस्तर में सुधार और निर्णय लेने की प्रक्रिया में शिक्षा की सबसे अह्म भूमिका है।

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