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चीन के जश्न में मग्न भारतीय वामपंथी

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चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सौ साल होने के उत्सव में शामिल हुए भारत के कम्युनिस्ट व द्रमुक के नेता

चीन के मसले पर भी भारत कभी एक नहीं हो पाया। भारत की सेना आज भी बॉर्डर पर चीन की सेना के सामने तैनात है। भारत सरकार चीन के मोबाइल ऐप्स पर बैन लगा चुकी है, चीन की कई कंपनियों को भारत आने से मना कर चुकी है। भारत के प्रधानमंत्री ने चीन के राष्ट्रपति को जन्मदिन की बधाई नहीं दी। भारत सरकार ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को 100 वर्ष पूरे होने पर बधाई नहीं दी। लेकिन भारत के वामपंथी चीन के जश्न में मगन हैं यानी इन लोगों ने देश के दुश्मन को अपना दोस्त मान लिया है।

सुधीर चौधरी

ये बात हम सब जानते हैं कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है जबकि दुश्मन का दोस्त भी दुश्मन होता है और आप अपने दुश्मन को घर बुलाना तो दूर, उसे अपने घर के आसपास भटकने भी नहीं देना चाहेंगे। लेकिन भारत एक ऐसा देश है, जहां कुछ लोग राजनीति और विचारधारा की खातिर देश के शत्रुओं को अपना मित्र बना लेते हैं और उनके जश्न में शामिल हो जाते हैं। आप कह सकते हैं कि एक तरफ तो सरहद पर चीन से युद्ध की तैयारी हो रही है और दूसरी तरफ देश के ही कुछ लोगों की चीन के साथ पार्टी हो रही है।

मंगलवार को भारत में चीन के दूतावास ने कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के मौके पर एक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का आयोजन किया, जिसकी मेजबानी खुद भारत में चीन के राजदूत ने की। लेकिन इसकी अतिथि सूची को अगर आप देखेंगे तो हैरान रह जाएंगे। इस ऑनलाइन सेमिनार के भारतीय मेहमान थे।

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी सीपीआईएम के महासचिव सीताराम येचुरी, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के महासचिव डी राजा, द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) के सांसद एस सेंथिल कुमार और ऑल इंडिया फॉर्वर्ड ब्लॉक के सबसे बड़े नेता जी देवराजन। इस सेमिनार का केंद्रबिंदु था- पार्टी के संगठन के अनुभवों को साझा करना और परस्पर विनिमय व सहयोग को बढ़ावा देना। इससे आप अंदाजा लगाइए कि ये तमाम नेता इस सेमिनार में हिस्सा लेने क्यों गए थे। ये लोग चीन से उसके अनुभवों और विचारों को समझना चाहते थे।

चीन के राजदूत ने भी इस मौके का पूरा फायदा उठाया और अपने भाषण के दौरान लद्दाख और गलवान पर अपने देश का पक्ष रखा और कहा कि पूरी दुनिया को पता है कि वहां किसने सही किया और किसने गलत। अब आप सोचिए इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने वाले नेता हमारे ही देश के नागरिक हैं। इन नेताओं को इस समय भारत के साथ खड़े होना चाहिए, लेकिन ये लोग लद्दाख पर चुपचाप चीन के राजदूत का उपदेश सुन रहे थे। हैरानी की बात ये है कि बात-बात पर ट्वीट करने वाले इन नेताओं ने इस इस बैठक की जानकारी किसी तो नहीं दी लेकिन जब पोल खुल गई तो कहने लगे कि इसमें गलत क्या है।

ऐसे खुली वामपंथियों की पोल

चीन के दूतावास ने अपनी वेबसाइट पर इस कार्यक्रम की जानकारी देते हुए लिखा है कि इन नेताओं ने न सिर्फ 100 साल पूरे होने पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को बधाई दी। बल्कि चीन की सरकार की उपलब्धियों की तारीफ भी की और कहा कि चीन में नागरिकों के हितों का ध्यान रखने वाली सरकार है।

आखिर चीन की उपलब्धि क्या है?

लेकिन इन लोगों ने चीन के राजदूत से ये नहीं पूछा कि वो कौन सी उपलब्धियों की बात कर रहे हैं. क्या हांगकांग की आजादी छीनना उपलब्धि है, क्या तिब्बत का दमन चीन की उपलब्धि है, ताईवान को युद्ध की धमकियां देना उपलब्धि है, या फिर वीगर मुसलमानों का नरसंहार चीन की उपलब्धि है? ये सवाल पूछने की बजाय ये लोग चुपचाप चीन का सरकारी भाषण सुनते रहे।

ये लोग इसलिए कुछ नहीं बोल पाए क्योंकि हमारे यहां कभी इस पर एक राय नहीं बन पाती कि देश का दुश्मन कौन है और देश का दोस्त कौन है? भारत ने पाकिस्तान के साथ 1965, 1971 और 1999 में युद्ध लड़ा, लेकिन उस समय भी भारत एक नहीं हो पाया और भारत के ही बहुत सारे लोग पाकिस्तान के बचाव में लगे रहे. या उससे संबंध सुधारने की वकालत करते रहे। आज भी भारत के बहुत सारे बुद्धिजीवी, फिल्म स्टार्स और पत्रकार पाकिस्तान जाने के लिए बेताब रहते हैं और ये लोग पाकिस्तान से लौटकर कहते हैं कि इन्हें वहां बहुत प्यार मिला।

दुश्मनों को लेकर भारत एकमत नहीं

इसी तरह चीन के मसले पर भी भारत कभी एक नहीं हो पाया। भारत की सेना आज भी बॉर्डर पर चीन की सेना के सामने तैनात है। भारत सरकार चीन के मोबाइल ऐप्स पर बैन लगा चुकी है, चीन की कई कंपनियों को भारत आने से मना कर चुकी है। भारत के प्रधानमंत्री ने चीन के राष्ट्रपति को जन्मदिन की बधाई नहीं दी। भारत सरकार ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को 100 वर्ष पूरे होने पर बधाई नहीं दी। लेकिन भारत के वामपंथी चीन के जश्न में मगन हैं यानी इन लोगों ने देश के दुश्मन को अपना दोस्त मान लिया है। तो फिर आप सोचिए कि अब इन्हें क्या माना जाए क्योंकि दुश्मन का दोस्त तो दुश्मन ही होता है।

कुल मिलाकर बात साफ है कि भारत के दुश्मन सीमाओं के उस पार ही नहीं बल्कि भारत की सीमाओं के अंदर भी बैठे हैं।हालांकि इस सेमिनार के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता डी राजा ने कहा कि इसमें कुछ गलत नहीं था क्योंकि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के 100 वर्ष पूरे होना एक बड़ा अवसर है और वो अपनी शुभकामनाएं देने के लिए इस कार्यक्रम में शामिल हुए थे।

देश के खिलाफ वामपंथियों की विचारधारा

ये विडंबना है कि जो विचारधारा देश के साथ नहीं है उस विचारधारा को मानने वाले नेता चुनाव भी जीत जाते हैं। जनता इन्हें वोट भी दे देती है और ये लोग संसद और विधानसभाओं में भी पहुंच जाते हैं। केरल में आज भी वामपंथी सरकार है. पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज भी वामपंथियों का प्रभाव है। त्रिपुरा जैसे राज्यों में वर्षों तक वामपंथी सरकार रही और तमिलनाडु में इस समय जो सरकार है उसकी विचारधारा के केंद्र में भी वामपंथ है।

यही वजह है कि जब बॉर्डर पर भारत और चीन के सैनिक टकराते हैं तो ये लोग कभी भी खुलकर चीन का विरोध नहीं करते। बल्कि भारत की सेना और सरकार से ही सवाल पूछने लगते हैं। लेकिन देश के खिलाफ जाना और देश के दुश्मनों का साथ देना वामपंथियों की पुरानी आदत है।

देश विरोधी कम्युनिज्म की क्रोनोलॉजी

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना वर्ष 1920 में उज्बेकिस्तान के ताशकंद में हुई थी। तब उज्बेकिस्तान सोवियत संघ का हिस्सा था, जहां कम्युनिस्ट शासन था और इसीलिए इन लोगों ने भारत के बाहर जाकर सोविय संघ की सहायता से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की। इसके बाद इनका असली चेहरा वर्ष 1942 में दिखा जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भारत छोड़ो आंदोलन को समर्थन देने से मना कर दिया। तर्क ये था कि उस समय ब्रिटेन और सोवियत संघ मिलकर जर्मनी के तानाशाह हिटलर की सेनाओं से लड़ रहे थे।

इसलिए उस समय वामपंथियों का मानना था कि ब्रिटेन की ताकत को कमजोर नहीं करना चाहिए, फिर भले ही भारत वर्षों तक अंग्रेजों का गुलाम ही क्यों ना बना रहे। इसी दौरान जब नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज (इंडियन नेशनल आर्मी) की स्थापना की तो इसी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने मुख पत्र पीपल्स वॉर में नेताजी के लिए अपशब्द लिखे। उन्हें साम्राज्यवादी ताकतों का मोहरा बताया. खैर वामपंथियों की साजिशों के बावजूद भारत आजाद हो गया लेकिन आजादी के बाद भी इन लोगों ने अपने देश का साथ नहीं दिया।

वर्ष 1959 में जब भारत की तत्कालीन सरकार ने इस बात का खुलासा किया कि लद्दाख के आस पास चीन भारत की जमीन पर अतिक्रमण कर रहा है तो चीन का विरोध करने की बजाय वामपंथियों ने बिल्कुल चुप्पी साध ली थी और यहां तक कि उस दौरान वापमंथी पार्टियों ने कुछ ऐसे बयान भी जारी किए, जो चीन के तो हित में थे लेकिन भारत की संप्रभुता के लिए खतरा थे।

यहां तक कि 60 वर्ष पहले जब चीन की सेना ने तिब्बत पर जबरदस्ती कब्जा किया तब भी वामपंथियों ने चीन का साथ दिया और कहा कि चीन तिब्बत के लोगों को अंधकार से बाहर निकालने का काम कर रहा है। इतना ही नहीं भाकपा ने तो ये तक कह दिया था कि तिब्बत में जो लोग चीन का विरोध कर रहे हैं वो सामंती विचारधारा के हैं और इनमें दलाई लामा भी शामिल हैं।

यहां तक भी ठीक था लेकिन जब वर्ष 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया तब भी कई वामपंथी नेताओं ने भारत की जगह चीन का साथ दिया. यहां तक कि जो वामपंथी भारत के सैनिकों के लिए खून देना चाहते थे या पैसों से भारतीय सेना की मदद करना चाहते थे उन्हें ऐसा करने से रोक दिया गया।जब कुछ बड़े वामपंथी नेताओं ने इसका विरोध किया तो पार्टी में उनका पद घटाकर उन्हें सजा दी गई। इतना ही नहीं उस समय कई वामपंथी नेता चीन के समर्थन में रैलियां तक कर रहे थे।

1962 के युद्ध में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी भाकपा चीन का इस तरह से समर्थन कर रही थी कि तत्कालीन सरकार को इस पार्टी के कुछ नेताओं को जेल भेजना पड़ा था। इस युद्ध के बाद भाकपा टूट गई और माकपा का गठन हुआ।

(जी न्यूज से साभार)

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