Home लेख भारतीय हथकरघा उद्योग, अनूठे डिजाइन और कौशल का मिश्रण

भारतीय हथकरघा उद्योग, अनूठे डिजाइन और कौशल का मिश्रण

65
0
  • सुश्री रीना ढाका, डिजाइनर, दिल्ली


फैशन
की दुनिया में कोटा साडिय़ों का विशिष्ट योगदान है। वैश्विक स्तर पर ये साडिय़ां अपने उत्कृष्ट डिजाइन और पैटर्न के लिए पहचानी जाती हैं। मूल रूप से, उनकी जड़ें मैसूर में हैं। प्राचीन काल में, इस किस्म की साडिय़ां मैसूर के बुनकरों द्वारा राजस्थान में लाई जाती थीं। बाद में ये साडिय़ां मसूरिया मलमल, कोटा-मसूरिया, कोटा कॉटन और कोटा डोरिया के रूप में लोकप्रिय हो गईं। रेशम जहां कपड़े को चमक प्रदान करता है, वहीं कॉटन उसे मजबूती प्रदान करता है। चेक वाले पैटर्न को खत कहा जाता है और यह कोटा डोरिया कपड़े की खास विशेषताओं में से एक है। कोटा डोरिया बहुत ही महीन बुनाई से लैस और भारहीन होती है।

भारत का हथकरघा उद्योग बुनकरों की कलात्मकता के साथ-साथ भारतीय संस्कृति की समृद्धि और विविधता को भी प्रदर्शित करता है। उत्पादन में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से 4.3 मिलियन से अधिक लोगों के जुड़े होने के साथ, हथकरघा उद्योग भारत की ग्रामीण आबादी के लिए कृषि के बाद दूसरा सबसे बड़ा रोजगार प्रदान करने वाला क्षेत्र है। भारतीय हथकरघा उद्योग के उत्पाद अपने अनूठे डिजाइन और कौशल के लिए जाने जाते हैं। अभी चलन पुराने डिजाइनों को नई तकनीकों के साथ मिलाकर मौलिक उत्पाद तैयार करने का है।

वास्तव में, हथकरघा उद्योग हमारी रीढ़ है और यह परिधान उद्योग की श्रृंखला से जुड़ा है। मुझे फैशन के क्षेत्र में भी ढाई दशक का अनुभव है। मैं इस व्यापार की अगुआ हूं और एफडीसीआई की संस्थापक सदस्य भी हूं। मैंने हथकरघा उद्योग और बुनकरों से जुड़े निम्नलिखित सुझावों को विचार के लिए सामने रखा है:- क) क्षमता निर्माण की सुविधा प्रदान करना । ख) डिजिटलीकरण और तकनीक को अपनाने के लिए उन्हें सहायता देना। ग) उनके उत्पादों और सेवाओं की ब्रांडिंग और पोजिशनिंग करने में उनकी मदद करना घ) उन्हें वैश्विक बाजारों से जोडऩा।

सरकारी बाजार, भारत में मेले या अंतरराष्ट्रीय बाजार- अगर यह मॉडल मौजूद है, तो उसे पुनर्जीवित किया जा सकता है और आज के समय के अनुरूप बनाया जा सकता है। दिल्ली हाट, परंपरा पर आधारित पर पहले से मौजूद चलन को फिर से दोहराने या उसका आधुनिकीकरण करने का एक अच्छा उदाहरण है। इस शिल्प को सहारा देने के लिए फिल्में मूल्य आधारित पर्यटन की शुरुआत करने का जरिया बन सकती हैं। ऐसी फिल्में प्रमुख चैनलों पर सुरुचिपूर्ण तरीके से प्रसारित की जा सकती हैं।

थकरघा क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए सोशल मीडिया और अन्य सामाजिक गतिविधियों का उपयोग किया जा सकता है। अतीत में फॉक्स ट्रैवलर पर, मैंने लखनऊ और उसके शिल्प को शूट किया है जिसकी वजह से शैली और शहर से जुड़े टीवी कार्यक्रमों के लिए यह एक पसंदीदा गंतव्य बन गया है। हमें अपनी प्रगति से जुड़े कार्यों को जारी रखने की जरूरत है। बेहतर तरीके से तैयार संग्रह, आधुनिक संभावनाओं के अनुरूप सुनियोजित ढंग से निर्धारित मूल्य या बेहतर पुनरीक्षित मूल्य पर बढिय़ा परिधानों को युवा निश्चित रूप से खरीदना चाहेंगे। हमारी ओर से आपको हथकरघा दिवस की हार्दिक शुभकामनाए।

Previous articleपदमा सचदेव: डोगरी की हिंदी सेवी लेखिका
Next articleखेल और खिलाड़ी का सम्मान

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here