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विश्व व्यवस्था को प्रभावित करेगा भारत-अमेरिका संबंध

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  • भारत की पूरी कोशिश है कि अमेरिका अफगानिस्तान के संदर्भ में ठोस रणनीति बनाए और उसके तहत भारत की मदद करता रहे । इस पर व्यापक बातचीत हुई है और कुछ ठोस निर्णय भी करने का संकेत है। ब्लिंकन की राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ भी लंबी मुलाकात हुई।

अवधेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार
awadheshkum@gmail.com

अमेरिकी विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकन की भारत यात्रा पर केवल भारत के अंदर ही नहीं, बाहर भी कई देशों की गहरी दृष्टि रही होगी। वे ऐसे समय भारत आए जब अफगानिस्तान को लेकर अनिश्चय का माहौल है, पाकिस्तान चीन के साथ मिलकर वहां महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की ओर अग्रसर है, भारत को अफगानिस्तान से बाहर करने या वहां भूमिकाहीन करने की कोशिशें चल रही हैं एवं चीन की भारत विरोधी गतिविधियां जारी है।

निस्संदेह, कोविड महामारी से निपटने में आपसी सहयोग भी यात्रा का एक महत्वपूर्ण मुद्दा था, पर सामरिक चुनौतियां एजेंडा में सबसे ऊपर रहीं। जो बाइडेन प्रशासन भारत को कितना महत्व देता है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि इस वर्ष ब्लिंकन भारत आने वाले तीसरे अमेरिकी नेता थे। ब्लिंकन के पहले रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन तथा जलवायु परिवर्तन मामलों पर अमेरिकी राष्ट्रपति के विशेष दूत जॉन कैरी भारत आ चुके हैं। ब्लिंकन की यात्रा में हिंद प्रशांत क्षेत्र में शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने के अलावा अफगानिस्तान सहित क्षेत्रीय सुरक्षा के मामलों पर अधिक सशक्तता से मिलकर काम करने पर सहमति बनी है।


विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ संयुक्त प्रेसवार्ता में ब्लिंकन ने कहा कि भारत और अमेरिका की साझेदारी हिंद प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता और समृद्धि प्रदान करने तथा दुनिया को यह दिखाने के लिए महत्वपूर्ण होगी कि लोकतंत्र अपने लोगों के लिए कैसे काम कर सकता है। उन्होंने भारत के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि दुनिया में ऐसे बहुत कम रिश्ते हैं जो भारत और अमेरिका के बीच के संबंधों से ज्यादा महत्वपूर्ण है। उनके शब्द थे कि भारत और अमेरिका के लोग मानवीय गरिमा और अवसर की समानता, कानून के शासन, धर्म और विश्वास की स्वतंत्रता सहित मौलिक स्वतंत्रता में विश्वास करते हैं। ये बातें महत्वपूर्ण हैं और इनसे भारत अमेरिका संबंधों की ठोस व्यावहारिक और वैचारिक आधार भूमि का आभास होता है।

इस समय आम भारतीय की रुचि ज्यादा शुद्ध व्यावहारिक मुद्दों पर थी । इनमें अफगानिस्तान सबसे ऊपर है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अफगानिस्तान सहित क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर व्यापक चर्चा की बात कही। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण सुरक्षित और स्थिर अफगानिस्तान में भारत और अमेरिका की गहरी रुचि है। जयशंकर के अनुसार इस क्षेत्र में एक विश्वसनीय भागीदार के रूप में भारत ने अफगानिस्तान की स्थिरता और विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है तथा उसे जारी रखेगा। उन्होंने आश्वस्त करने के अंदाज में कहा कि अमेरिका और भारत अफगान लोगों के हितों के लिए मिलकर काम करना जारी रखेंगे तथा क्षेत्रीय स्थिरता का समर्थन करने के लिए भी काम करेंगे। अमेरिका जिस तरह वहां से निकल गया उससे उसकी अपनी साख तो कमजोर हुई ही है पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता पर खतरा पैदा हो चुका है । पाकिस्तान की कोशिश है कि तालिबान सत्ता पर कब्जा जमाये और उसके माध्यम से उसका प्रभाव कायम हो ।

चीन पाकिस्तान के माध्यम से वहां प्रभावी भूमिका निभाने की ओर अग्रसर है । पाकिस्तान के सहयोग से तालिबानी नेताओं के साथ चीन के विदेश मंत्री की बातचीत भी हो चुकी है। तालिबान ने घोषणा भी किया है कि वह चीन के हितों को कतई नुकसान नहीं पहुंचाएगा तथा शिनजियांग के विद्रोहियों को अपने यहां किसी सूरत में शरण नहीं देगा। भारत के संदर्भ में तालिबान का ऐसा कोई बयान नहीं आया है। हालांकि तालिबान का प्रभाव क्षेत्र बढऩे के बावजूद ऐसी स्थिति कायम नहीं हुई जिससे लगे कि अब्दुल गनी सरकार पराजय की ओर बढ़ रही है । हमारे लिए तालिबान की ताकत बढऩा निश्चित रूप से गहरी चिंता का कारण है।

भारत ने तीन अरब डॉलर से ज्यादा निवेश कर वहां सड़कें , बांध, अस्पताल ,पुस्तकालय आदि आधारभूत संरचनाओं का निर्माण किया है। यहां तक कि संसद भवन भी भारत ने ही बनाया है। भारत ने वहां के सभी 34 प्रांतों में 400 से अधिक परियोजनाएं आरंभ की है। तालिबान उन्हें ध्वस्त कर सकते हैं। हालांकि तालिबान ने कहा है कि ऐसा नहीं करेंगे लेकिन वे भरोसा के लायक नहीं है।

भारत में आतंकवाद का निर्यात भी बढ सकता है। चीन और पाकिस्तान का उन पर प्रभाव कायम रहा तो भारत विरोधी रवैया उनका निश्चित रूप से सामने आएगा। भारत की पूरी कोशिश है कि अमेरिका अफगानिस्तान के संदर्भ में ठोस रणनीति बनाए और उसके तहत भारत की मदद करता रहे । इस पर व्यापक बातचीत हुई है और कुछ ठोस निर्णय भी करने का संकेत है। ब्लिंकन की राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ भी लंबी मुलाकात हुई। इसमें द्विपक्षीय एवं क्षेत्रीय सामरिक मुद्दे शामिल थे। हालांकि इस संबंध में सार्वजनिक तौर पर बहुत कुछ नहीं कहा गया लेकिन हम मान सकते हैं कि अफगानिस्तान, पाकिस्तान, चीन और हिन्द प्रशांत क्षेत्र पर बातचीत केंद्रित रही होगी।

अफगानिस्तान को लेकर अमेरिका ने भारत को क्या आश्वासन दिया यह भले अस्पष्ट है, लेकिन वह तालिबान के खिलाफ बीच-बीच में हवाई हमले कर रहा है तथा अफगानिस्तान सरकार को भारी आर्थिक एवं सैन्य सहायता देने जा रहा है। इसका अर्थ हुआ कि अमेरिका जमीन से भले वापस चला जाए, अफगानिस्तान सरकार को वह उनके ही हाल पर नहीं छोड़ रहा।

भारत-अमेरिका के बीच प्रशांत क्षेत्र से जुड़ा क्वाड भी बहुआयामी सहयोग का मंच है। इस वर्ष के आरंभ में क्वाड का वर्चुअल शिखर सम्मेलन हुआ जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के अलावा जापान के प्रधानमंत्री योशिहिदे सुगा,भारत के नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलिया के स्कॉट मॉरिसन शामिल हुए थे। उस बैठक में कोविड-19 टीके को लेकर एक कार्य समूह गठित हुई थी तथा यह तय हुआ था कि जापान के आर्थिक व ऑस्ट्रेलिया के लॉजिस्टिक मदद से भारत हिन्द प्रशांत के देशों के लिए अमेरिकी टीका की एक अरब खुराक बनाएगा। आगे कैसे उस निर्णय को अमल में लाया जाएगा यह ब्लिंकन की यात्रा के दौरान चर्चा का विषय रहा होगा।

क्वाड से अमेरिका के हित भी गहरे जुड़े हुए हैं। दो महासागरों वाले हिंद प्रशांत क्षेत्र अमेरिका के समुद्री हितों की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार इस वर्ष दुनिया के कुल निर्यात के 42 प्रतिशत और आयात की 38 प्रतिशत सामग्रियां यहां से गुजर सकती हैं। 2019 का आंकड़ा बताता है कि इन महासागरों से 19 खरब डॉलर मूल्य की अमेरिकी व्यापार सामग्रियां गई थी। चीन जिस प्रकार अपने आर्थिक और सैन्य ताकत की बदौलत दुनिया में वर्चस्व कायम करने की ओर अग्रसर है उसमें क्वाड उसे रोकने का रणनीतिक मंच बने तभी इसकी उपयोगिता है। ब्लिंकन ने नई दिल्ली में निर्वासित तिब्बती सरकार तथा दलाई लामा के प्रतिनिधियों से सार्वजनिक मुलाकात कर फिर चीन को कुछ साफ संकेत दिया है। भारत यात्रा के दौरान कई अमेरिकी नेता तिब्बतियों से मुलाकात करते रहे हैं पर इस बार यह इस मायने में अलग हो जाता है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों दलाई लामा को जन्म दिवस पर बधाई देने का संदेश ट्वीट भी कर दिया।

किसी भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा ऐसा पहली बार किया गया । यह बिल्कुल संभव है कि अमेरिका और भारत के बीच तिब्बत को लेकर कुछ दीर्घकालीन नीतियों पर सहमति बनी हो। यदि भारत अमेरिका, यूरोप तथा एशिया में जापान जैसे देशों के साथ मिलकर सक्रिय होता है तो यह चीन की आक्रामकता का माकूल प्रत्युत्तर होगा। चीन का सामना करने के लिए क्वाड का विस्तार जरूरी है। इसमें यूरोपीय देशों को शामिल करें तो फिर ज्यादा सशक्त मंच बन सकता है।

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