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छात्र जीवन में कविता ने जीवन की राह तय की जिंदा शहीद बाबा पृथ्वी सिंह आजाद

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  • क्रांतिकारी बाबा पृथ्वीसिंह ने बाल्यकाल में ही अंग्रेजी साम्राज्य को उखाड़ फेंकने का संकल्प लेकर क्रांति की राह पकड़ ली थी।
  • रंजना चितल, कथाकार व रंगकर्मी

क्रांतिकारी बाबा पृथ्वीसिंह आज़ाद क्रांति पथ के ऐसे पथिक हैं जो भारत की आजादी के लिये अंग्रेजी राज से अनेक बार टकराये। इस क्रांति यात्रा में उनके पास दो ही विकल्प थे-कैदी के रूप में कारावास या शानदार मौत। लगभग 16 वर्षों तक अंग्रेजी हुकूमत की खोजी निगाहों से बचते-बचाते, भूमिगत जीवन जीते हुए बाबा पृथ्वीसिंह स्वातन्त्र्य समर की आंच में तपते रहे। बिना रुके, बिना थके गुलामी के जुएं को उतार फेंकने के लिए बढ़ते गये और अंग्रेजी साम्राज्य को चुनौती देकर जिंदा शहीद बन गये।

न साधन की परवाह न परिस्थितियों का भान, सिर्फ एक लक्ष्य-आजादी। क्रांतिकारी बाबा पृथ्वीसिंह ने बाल्यकाल में ही अंग्रेजी साम्राज्य को उखाड़ फेंकने का संकल्प लेकर क्रांति की राह पकड़ ली थी। पंजाब में पटियाला जिले के लालडू गांव में 15 सितंबर 1892 को जन्में पृथ्वीसिंह की आरंभिक शिक्षा पिता के पास बर्मा में हुई। एक दिन कक्षा में मातृभूमि के महत्व को लेकर कविता पढ़ाई गयी।

यह कविता बालक पृथ्वीसिंह के मन में गहराई तक बैठ गयी। उन्होंने अपनी मातृभूमि लौटने का निर्णय लिया और भारत आ गये। यहां उन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने का संकल्प लिया पिता को अपने मन की बात कही और अमेरिका रवाना हो गये। वे सिंगापुर फिलीपींस होते हुए अमेरिका पहुंचे। वहां गदर पार्टी के संस्थापक लाल हरदयाल और उनके साथियों के साथ जा मिले। वहां भारत में क्रांति करने की योजना बनाई गई, कार्य को अंजाम देने के लिये प्रिंसेस कोरिया जहाज में 29 अगस्त 1914 को रवाना हुए। पुलिस से बचते हुए किसी तरह पंजाब के क्रांतिकारियों तक पहुंचे लेकिन यहां अंबाला के छात्रावास में अंग्रेज जासूस द्वारा कैद कर लिये गये। उन्हें पहले अंबाला जेल में रखा और फिर लाहौर सेंट्रल जेल भेज दिया गया। उन पर मुकदमा चला और 1915 में फांसी की सजा सुनाई गई।

इसे उन्होंने चुनौती दी। फांसी की सजा तब्दील हुई और उन्हें कालापानी (अंडमान) भेज दिया गया। वहां कैदियों पर होने वाले अत्याचारों को लेकर पृथ्वीसिंह ने हड़ताल कर दी। अन्न के साथ वस्त्र भी त्याग दिये। पृथ्वीसिंह को मद्रास की राजमहेन्द्री जेल भेजा गया। राजमहेन्द्री जेल से कोलकत्ता ले जाते समय पृथ्वीसिंह ट्रेन से कूदे लेकिन दूसरे स्टेशन पर उन्हें पकड़ लिया गया। वे दोबारा ट्रेन से कूदे। मुंबई, बड़ौदा, अहमदाबाद होकर भावनगर पहुंचे। भावनगर के एक विद्यालय में स्वामीराम के नाम से व्यायाम शिक्षक बन गये। भगत सिंह ने जेल से क्रांतिकारी साथी धन्वंतरी को क्रांतिकारी पृथ्वीसिंह को खोज कर चंद्रशेखर आजाद से मिलवाने के लिये भेजा।

धन्वंतरी ने इलाहाबाद में पृथ्वीसिंह की चन्द्रशेखर आजाद से मुलाकात करवायी। आजाद ने उन्हें पिस्टल भेंट कर आग्रह किया कि वे रूस जाकर बोल्शेविक क्रांति की तकनीक का अध्ययन करें और उसे भारत में लागू करे ताकि भारत में क्रांतिकारी आंदोलन को परिष्कृत किया जा सके। उन्होंने मुंबई में क्रांतिकारी दुर्गाभाभी, सुखदेव राज और विश्वनाथ वैशम्पायन के साथ मिलकर मुंबई के लेमिंग्टन रोड स्थित थाने पर धुंआधार गोलियां चलायी। गोलियों की धमक ने अंग्रेजों को झकझोर दिया। फिर खान अब्दुल, गफ्फर खान की मदद से अफगानिस्तान होते हुए वे रूस पहुंचे। इस बीच रूस में भी गिरफ्तार होने व रिहाई का सिलसिला जारी रहा।

अंतत: समुद्री मार्ग से भारत लौटे। पृथ्वीसिंह बमुश्किल गांधीजी के पास वर्धा आश्रम पहुंचे। गांधीजी के परामर्श पर स्वयं को पुलिस के हवाले कर दिया। रावलपिंडी जेल से 23 सितंबर 1939 को रिहा हुए। चंद्रशेखर आजाद की स्मृति में उन्होंने अपने नाम के आगे आजाद जोड़ लिया और महात्मा गांधी के साथ आजादी के आंदोलन में जुड़ गये। 15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद हुआ। 1977 में उन्हें पदमभूषण से अलंकृत किया गया। अंत में अपनी जिजीविषा को विराम देते हुए 5 मार्च 1989 को संसार से विदा हो गये। अपनी पूरी जिंदगी क्रांति की राह पर चलने वाले बाबा पृथ्वीसिंह का जीवन त्याग व समर्पण की जीवंत मिसाल है।

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