Home लेख आध्यात्मिकता का व्यापार पर प्रभाव

आध्यात्मिकता का व्यापार पर प्रभाव

49
0

प्रो. हिमांशु राय, निदेशक, आईआईएम इंदौरआइए

इस सप्ताह आध्यात्मिकता के दर्शन से तनिक विराम लें और जानें कि यह हमारे आसपास के व्यक्तियों और समूहों के व्यवहार और मूल्य प्रणाली को किस प्रकार प्रभावित करता है। इस लेख मेंमैं भारतीय शास्त्रों में परिभाषित आध्यात्मिकता काव्यापारिक संगठनों पर क्या प्रभाव है,इसके बारे में विचार व्यक्त करना चाहूँगा।

मैं एक ऐसे भारतीय व्यापार समूह के बारे में चर्चा करूंगा जिसके अंतर्गत कई कम्पनियाँ सेवाओं, सामग्री, इंजीनियरिंग, ऊर्जा, उपभोक्ता उत्पाद, रसायन, संचार और सूचना प्रणाली के क्षेत्रों में काम कर रही हैं। सबसे पहले बताना चाहूँगा किमूल संस्थान की पूंजी का एक बड़ा हिस्सा परोपकारी ट्रस्टों के नियंत्रण में है, जिन्होंने अस्पतालों, शिक्षा और अनुसंधान केंद्रों, और वैज्ञानिक और सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों सहित उत्कृष्टता के विभिन्न सार्वजनिक संस्थानों को प्रायोजित और प्रोत्साहित किया है। अपनी व्यावसायिक प्रक्रियाओं का वर्णन करने के लिए अपनाए गए तरीकों में शामिल पाँच मुख्य मूल्यों को वे इस प्रकार पेश करते हैं:

सत्यनिष्ठा :

व्यवसाय को निष्पक्षता,ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ इस तरह संचालित करना कि जो कुछ भी किया जाए वह सार्वजनिक जांच या संवीक्षा पर खरा उतरे। यह भारतीय शास्त्रों की शिक्षाओं के अनुरूप है -उदाहरण के लिए अर्थशास्त्र और ऋग्वेद, जिसमें कहा गया है कि नेतृत्व की सभी शैलियों को ईमानदारी, सच्चाई और स्पष्ट व्यवहार के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए और संगठनों की सार्वजनिक रूप से जांच की जानी चाहिए।

समझ :

दुनिया भर में सहकर्मियों और ग्राहकों के लिए देखभाल, सम्मान, करुणा और मानवता का भाव और हमेशा राष्ट्र हित, यानि अपने भारत के लाभ के लिए कार्य करना। यह भारतीय शास्त्रों की शिक्षाओं के पूर्ण सामंजस्य में है, जो बताता है कि सब कुछ देश के हित के लिए, कल्याण के लिए ही है और उसी के लिए समर्पित है। करुणा और मानवता के तत्व धर्म के पहले दो तत्वों– धृति एवं क्षमा के ज़रिए ही व्यक्त होते हैं,जैसा कि पहले भी हम चर्चा कर चुके हैं।

उत्कृष्टता :

अपने दिन-प्रतिदिन के कार्य में और संस्थान द्वारा उत्पादित और प्रदान की जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की गुणवत्ता में उच्चतम संभव मानकों को प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास करना। यह कर्म के मौलिक दर्शन का एक रूपांतर है जो हर व्यक्ति को अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने पर प्रेरित करने पर आधारित है।

एकता :

समूह में सहयोगियों के साथ और दुनिया भर के ग्राहकों और भागीदारों के साथ मिलकर काम करना, और सहिष्णुता, आपसी समझ और सहयोग के आधार पर मजबूत संबंध बनाना। इस मूल्य को वेदों में संगठन सूत्र (एकता के सूत्र) के रूप में काफी प्रोत्साहित किया जाता है, जो विचार और क्रिया, दोनों में एकता के मूल्य और आवश्यकता को प्रदर्शित करता है।

उत्तरदायित्व :

जिन देशों, समुदायों और परिवेश में ये संस्थान काम करते हैं, उनके प्रति जिम्मेदार, संवेदनशील बने रहना, हमेशा यह सुनिश्चित करना कि जो भी हमारे पास आता है, वह लौट कर कई गुना वापस भी जाता है। यह भगवद गीता की मौलिक शिक्षा को प्रदर्शित करता है, जो कि व्यक्तिगत लालच या लाभ के लिए वैराग्य की भावना के साथ निष्काम कर्म करने की प्रेरणा देती है।
इस प्रकार, हमारे शास्त्र एक ऐसा समृद्ध ढांचा तंत्र पेश करते हैं जो व्यापार और व्यावसायिक नैतिकता के आयामों का आधारभूत हैं। इसके अतिरिक्त, वैश्वीकरण की प्रक्रिया में भी उनकी एक विशेष भूमिका है। सुधारों और निरंतर बदलावों के बाद की इस दुनिया में कर्मचारी-संबंधों को नियंत्रित करने वाले प्रतिमान बदल गए हैं। इससे पहले, कर्मचारियों को आजीवन रोजगार, संस्था द्वारा प्रायोजित स्वास्थ्य योजनाओं और सेवानिवृत्ति पेंशन की सुविधा का लाभ मिलता था, लेकिन नवीन बदलावों के पश्चात, इन संबंधों में एक बड़ा बदलाव आ गया है। कर्मचारियों से अब बहुआयामी टीमों में काम करने और अपने कौशल को लगातार अद्यतन करने की अपेक्षा की जाती है। वैश्वीकरण ने पुनर्गठन को जन्म दिया है, जिसके परिणामस्वरूप नौकरी की असुरक्षा महसूस हो सकती है और संगठन में प्रत्याशित संगठनात्मक परिवर्तनों की संख्या में वृद्धि हो सकती है। यह आमतौर पर अधिक संख्या में कर्मचारियों द्वारा संस्थान कोछोडऩे के इरादे, कम संगठनात्मक प्रतिबद्धता, न्यूनतम विश्वास, नौकरी की संतुष्टि में कमी, प्रदर्शन में गिरावट और काम में कमी के प्रयास को बढ़ावा देता है। यहीं आध्यात्मिकता न केवल संगठनात्मक व्यवहार के लिए दिशानिर्देश प्रदान करती है बल्कि तनाव और वैश्वीकरण प्रक्रियाओं के अन्य नकारात्मक प्रभावों को अवशोषित करने के लिए एक प्रतिरोधक के रूप में भी कार्य करती है। कार्य साझा करने के प्रमुख नैतिक आयाम, हर उम्र के लिए सम्मान, सामाजिकता, निस्वार्थ कार्य, ईमानदारी और सच्चाई, बेहतर प्रदर्शन, ईमानदार व्यापार व्यवहार, समानता, अनुशासन और दंडात्मक प्रावधान, पदानुक्रमित स्तरों की आवश्यकता, प्रमुख और अग्रणी की भूमिका और उत्तरदायित्व, वित्तीय प्रबंधन और पारस्परिक संबंधों का इसके घटकों के व्यक्तित्व पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है और इनका कार्यस्थल पर रवैये और व्यवहार के रूप में प्रकट होने की संभावना है। भारतीय शास्त्रों पर चिंतन के माध्यम से सुझाए गए इन नैतिक आयामों को भारतीय संगठनों को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए औद्योगिक लोकतंत्र के मूल्यों के साथ आत्मसात करने की आवश्यकता है।

Previous articleआधुनिक काल में जियो और जीने दो की प्रासंगिकता
Next articleआइपीएल 2021 : राजस्थान जीत के करीब, शिवम दूबे ने लगाया अर्धशतक

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here