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जीवन में सफल होना है, तो खुद की सुनो

  • सुंदरचंद ठाकुर
    आप जीवन के किसी भी क्षेत्र में काम कर रहे हों, आपके आसपास ऐसे लोग मिल जाएंगे, जो आपको हर नया और जोखिम भरा काम करने को हतोत्साहित करेंगे। आसपास क्या, अपने घर में, अपने परिवार के सदस्य ही हमें जोखिम की सुगबुगाहट आते ही बोल पड़ते हैं – ‘देख ले छोटू, काम बहुत टेढ़ा है। सक्सेस मिली तो ठीक, पर फेल हो गया, तो कहीं के नहीं रहेंगे। कोई मदद को नहीं आएगा। तेरा अपना कमाया हुआ तो जाएगा ही, परिवार की पुश्तैनी प्रॉपर्टी भी डूबेगी।’ परिवार के किसी सदस्य द्वारा इस तरह आगाह किए जाने के बाद छोटू की क्या हिमाकत जो अपने सपने को सच करने के लिए जरूरी जोखिम उठा ले। परिवार के सदस्य तो फिर भी हमारे आइडिया को निरस्त नहीं करते, पर कुछ ऐसे नामाकूल दोस्त होते हैं, जो आइडिया सुनते ही बोल पड़ते हैं – अरे रहने दे यार, तेरे से नहीं होगा ये काम। तुझे स्कूल के दिनों से जानता हूं। गलती से भी इस धंधे में हाथ न डाल देना।
    आपको अपना आइडिया कितना ही शानदार क्यों न लगता हो, घरवाले और दोस्त उस पर सवाल उठाते ही हैं। लेकिन उनके सवाल सुन आप कब तक अपने आइडियाज की तिलांजलि देते रहोगे। आपको कभी अपने मन की भी तो सुननी चाहिए। चलिए एक कहानी से इसे समझते हैं। एक बार कुछ मेंढक एक जंगल से गुजर रहे होते हैं। जंगल में एक जगह बहुत गहरा गड्ढा है। मेंढकों के दल में से दो इस गड्ढे में गिर जाते हैं। वे गड्ढे से बाहर निकलने के लिए नीचे से ऊपर की ओर छलांगें मारना शुरू करते हैं, लेकिन चूंकि गड्ढा बहुत गहरा है, वे हर बार वापस गिर जाते हैं। ऊपर से उनके साथी मेढक इन दोनों को देख रहे होते हैं। जब वे देखते हैं कि दोनों बार-बार वापस गिर रहे हैं, तो अपना धैर्य खो देते हैं और चिल्लाकर उन दोनों मेंढकों को बोलते हैं- अरे भाइयो, यह गड्ढा बहुत गहरा है। तुम ख्वाहमखाह बाहर निकलने की कोशिश कर खुद को तकलीफ दे रहे हो। बेहतर है कि नीचे जाकर पड़े रहो और अपने आप प्राण निकलने दो। तुम बाहर तो कुछ करके नहीं आ सकते। वे बार-बार चिल्लाते हैं। कुछ देर में दोनों मेंढक थककर निहाल हो जाते हैं। एक मेंढक दोस्तों की बात पर यकीन कर ज्यादा हतोत्साहित हो जाता है और गड्ढे में और नीचे पहुंचकर मर जाता है।
    लेकिन दूसरा मेंढक थकने के बावजूद गड्ढे से बाहर निकलने को ऊंची छलांग लगाता रहता है। आखिरकार उसकी एक छलांग मौत से जिंदगी की ओर लगाई गई छलांग साबित होती है और वह गड्ढे के किनारे जाकर गिरता है। वह दम भरने लगता है तो उसके साथी उसे घेर लेते हैं। वे उससे पूछते हैं – तू पहले मेंढक की तरह नीचे गिरकर क्यों नहीं मरा।
    हम इतना चिल्ला-चिल्लाकर तुझे मरने को कह रहे थे। वह मेंढक दोस्तों की बात सुन थोड़ा हैरान होते हुए बोला- भाइयो, मैं थोड़ा बहरा हूं। दूर का मुझे सुनाई नहीं देता। तुम मुझे चिल्लाते तो दिख रहे थे, पर मुझे लगा कि तुम मुझे और ऊंचा कूदने को कह रहे हो। तुम्हारे चिल्लाने से ही मुझे जोश आया और मैं हर बार और ऊंचा कूदने की कोशिश करता रहा क्योंकि मुझे भरोसा था कि मैं वाकई बाहर कूद सकता हूं। गड्ढे में गिरे इन दो मेंढकों की कहानी हमें सिखाती है कि दुनिया हमें कुछ भी बोले हमें अपनी काबिलियत पर भरोसा बनाए रखना चाहिए। क्योंकि जो ऐसा करता है वह न सिर्फ मुसीबतों से बचता है बल्कि अपने लिए नए अवसर भी क्रिएट करता है। जिसे खुद पर भरोसा होता है, वह सुनता तो सबकी है, पर करता हमेशा अपने दिल की है।

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