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नदी के अंग काटेंगे, तो नदी रोयेगी

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  • भारत में बाढ़ की विभीषिका

राकेश अचल, पत्रकार
achalrakesh1959 @ gmail.com


शीर्षक पढ़कर आप चौंकेंगे, क्योंकि ये शीर्षक एक गीत की पंक्ति का हिस्सा है जो दशकों पहले राष्ट्रीय गीतकार स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र ने लिखा था। ये पंक्तियाँ आज इसलिए दोहराई जा रही हैं क्योंकि नदियों के आसपास बसे देश के तमाम शहरों में बाढ़ का हाहाकार मचा हुआ है। नदियों में आई बाढ़ की वजह से सैकड़ों लोग काल कलवित हो गए हैं और एक बड़ी अधोसंरचना ध्वस्त हो गयी है। देश को न जाने कितने अरब रुपयों का नुकसान हुआ है सो अलग।
दर असल बाढ़ की विभीषका किसी एक राज्य की समस्या नहीं है, राष्ट्रीय समस्या है। हाल ही में बाढ़ ऐसे राज्यों में भी आयी जो अक्सर सूखे के लिए अभिशप्त माने जाते हैं। बाढ़ के लिए मैदानी राज्य उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान गुजरात समेत अनेक राज्यों में हर साल भारी तबाही हुयी है। इस तबाही से बचने का कोई फुलप्रूफ सिस्टम नहीं है।

बाढ़ से होने वाले नुकसान का शत-प्रतिशत सही पता लगाने का कोई सिस्टम हमारे पास नहीं है। मैदानी राजस्व अमले के पास भी सिर्फ हवा-हवाई जानकारी होती है। 2019 में मध्यप्रदेश में बाढ़ से कम से कम 12 हजार करोड़ का नुकसाान हुआ था।

बाढ़ आती है तो अपने साथ घर,मकान, सड़कें, नदी पर बने पुल-पुलियाँ, मकान, स्कूल, रेल पटरियां सब क्षतिगस्त होते हैं। सरकारों के लिए बाढ़ से निबटने का कोई अनुभव नहीं है और अगर है भी तो बहुत सीमित। बाढ़ से निबटने के लिए वैज्ञानिक सिस्टम हम तैयार नहीं कर पाए। जबकि इस विभीषिका से निबटने के लिए लगभग एक सदी से कोशिश कर रहे। नदियों की इंटरलिंकिंग का विचार 161 वर्ष पुराना है। 1858 में ब्रिटिश सैन्य इंजीनियर आर्थर थॉमस कॉटन ने बड़ी नदियों के बीच नहर जोडऩे का प्रस्ताव दिया था, जिससे ईस्ट इंडिया कंपनी को बंदरगाहों की सुविधा प्राप्त हो सके एवं दक्षिण-पूर्वी प्रांतों में पडऩे वाले सूखे से निपटा जा सके। प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने इस दिशा में गंभीर प्रयास किये थे,लेकिन कोई ख़ास कामयाबी नहीं मिली।

नदियाँ एक प्राकृतिक संरचना हैं जो जबरन अपना प्रवाह नहीं बदलतीं। नदियों के पारस्परिक रिश्ते भी कोई आज के नहीं हैं,लेकिन जब भी इनके साथ कोई छेड़छाड़ की जाती है तो नदियां बिदक जातीं हैं। गुजरे जमाने में नदियों के किनारे संस्कृतियां विकसित होतीं थी, आज के जमाने में नदियों के किनारे अपसंस्कृतियाँ विकसित हो रहीं हैं। अब तो इनसान मशीनों के जरिये नदियों की कोख खंगालने में जुटा हुआ है।

नदियों पर बाँध बनाये जाते हैं तो वे बिदकतीं हैं। बाढ़ आने के जितने भी कारण हो सकते हैं उन सबके बारे में इनसान जानता है, इसलिए मै उन्हें दोहराना नहीं चाहता। किसी भी सरकार का पूरा बजट बाढ़ से हुए नुकसान की न तो भरपाई कर सकेगी और न ही पुरानी स्थितियों को बहाल कर सकती है। जरूरत इस बात की है कि बाढ़ से बचने के लिए पहले हम अपनी नदियों को बचाएं, उनके रास्ते खाली करें। आपको जानकार हैरानी होगी कि बीते पचास साल में देश में अनेक नदियों का वजूद खत्म हो गया है और जो बच गयीं हैं उनमे से भी प्रदूषित नदियों की संख्या 302 से बढ़कर 351 हो गयी है ।याद रखिये कि -‘नदी के अंग कटेंगे,तो नदी रोयेगी।

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