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‘पुष्प की अभिलाषा’ के सौ साल

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कविता मिश्रा/अंकिता पांडेय
पुष्प की अभिलाषा के सौ साल हो गए। यंह कालजयी कविता है, जैसे ए मेरे वतन के लोगों कालजयी गीत और लहना सिंह की कहानी। कालजयी से अभिप्राय ऐसी रचना से है जो हर कालखंड में उतनी ही प्रेरक, ताजगीभरी और प्रासंगिक हो जैसी लिखते समय थी। ‘मुझे तोड़ लेना वनमाली और इस पथ पर देना फेंक, मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जाएँ वीर अनेक’ आज भी देशभक्ति की अप्रतिम भावना पैदा करती है। मध्यप्रदेश के बाबई (होशंगाबाद) में जन्मे कवि माखनलाल चतुर्वेदी ने यह कविता वर्ष 1922 में बिलासपुर जेल में लिखी थी। माखनलाल चतुर्वेदी के काव्य में हिमालय सी गरिमा हरितांबर धरती से बोलती है’ – ऐसा मानना था सुप्रसिद्ध साहित्यकार महादेवी वर्मा का। सिर्फ महदेवी वर्मा ही नहीं अपितु कई महान साहित्यकार व पत्रकार दादा के कलम से निकले शब्दों के कायल थे।
देश को आज़ादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले दादा माखनलाल का जन्म 4 अप्रैल 1889 को हुआ। दादा जितने बड़े स्वतंत्रता सेनानी थे, उतने ही बड़े कवि और साहित्यकार भी। एक कवि के रूप में उन्होंने अनेक कविताएं लिखीं पर उनकी कविता पुष्प की अभिलाषा आज 100 वर्ष बाद भी लोगों के हृदय में विराजमान है। यह कविता हिमतरंगिनी से ली गई है, जिसके लिए दादा को पहला साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। राष्ट्रकवि को 5 जुलाई, 1921 से लेकर 1 मार्च,1922 तक बिलासपुर की सेंट्रल जेल में बैरक नंबर 9 में कैद कर रखा गया। यहीं पर 28 फरवरी 1922 को उन्होंने पुष्प की अभिलाषा कविता लिखी। इसके बारे में बताते हुए दादा ने स्वयं कहा है कि – ‘1921 के पूरे वर्ष और 1922 के कुछ महीने मैं बिलासपुर जेल से जबलपुर जेल लाया गया और वहां से छोड़ दिया गया। जब मैं जेल से छूटकर आया तो मुझपर अधिकार के नाते गणेश शंकर विद्यार्थी का एक पत्र मिला कि मुझे अपने जेल से छूटते ही प्रताप के लिए कुछ लिखकर भेजना चाहिए। 1922 के मार्च महीने में प्रताप में यह लिखकर उस समय भेजा गया। जिसका शीर्षक है – पुष्प की अभिलाषा।’

पुष्प की अभिलाषा
चाह नहीं, मैं सुरबाला के
गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध
प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर
हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर
चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ,
मुझे तोड़ लेना बनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक!
मातृ-भूमि पर शीश- चढ़ाने,
जिस पथ पर जावें वीर अनेक!

उनकी यह कविता तमाम क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणास्त्रोत थी। एक वरिष्ठ साहित्यकार जो दादा के करीबी भी रहे हैं, बताते हैं कि जब कलकत्ता हूगली नदी के किनारे क्रांतिकारियों कि लाशें पाई गई थी तो उनके जेब में दादा की कविता पुष्प की अभिलाषा मिली थी। दादा एक भारतीय आत्मा के नाम से भी प्रख्यात हैं। यह नाम इन्हे किसी के द्वारा नहीं दिया गया था। जब 1912 में उनके एक लेख पर राजद्रोह का मुकदमा दर्ज हुआ था उसके बाद उन्होंने अनेक छद्म नामों से लिखना शुरू कर दिया जैसे – भारत संतान, पशुपति, वनवासी, कुछ नहीं, तरुण भारत आदि शामिल है। इसमें ही एक नाम था ‘एक भारतीय आत्माÓ हालांकि बाद में इस नाम पर महात्मा गांधी ने अपनी मुहर लगा दी और दादा का यह नाम अमर हो गया। बाद में महात्मा गांधी ने दादा के बारे में यह भी कहा था कि ‘हम सब लोग बात करते हैं, बोलना तो माखनलाल जी ही जानते हैं। मैं बाबई जैसे छोटे स्थान पर इसीलिए जा रहा हूं, क्योंकि वह माखनलाल जी का जन्म स्थान है। जिस भूमि ने माखनलाल जी को जन्म दिया, उस भूमि को मैं सम्मान देना चाहता हूं।’
कई नामचीन साहित्यकार व क्रांतिकारी दादा से प्रभावित थे और उनकी बातों का अनुसरण किया करते थे। एक समय था जब माखनलाल चतुर्वेदी प्रताप का संपादन संभाल रहे थे उसी बीच सरदार भगत सिंह भी प्रताप के पत्रकार थे। सरदार भगत सिंह के अनेक लेखों का संपादन चतुर्वेदीजी ने किया और भगत सिंह की पत्रकारिता को तराशा। यहां तक कि प्रसिद्ध उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद अक्सर मुंबई से खंडवा आ जाया करते थे जहां वे दादा के साथ साहित्य और पत्रकारिता पर घंटों चर्चा करते थे। इसके अलावा सुभद्रा कुमारी चौहान भी इनसे प्रेरणा लेती थी।

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