Home लेख संसार के सातों सुख कैसे उपलब्ध हों ?

संसार के सातों सुख कैसे उपलब्ध हों ?

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  • नागेश्वर सोनकेशरी


इस संसार में कई तरह के सुख हैं, परन्तु भौतिक रूप से सात सुख माने गए हैं। पहला सुख- निरोगी काया, जो कि हम सभी ने इस कोरोना के दौर में अच्छे से महसूस कर लिया है ।इसलिए नियम पूर्वक अपना व्यायाम या मनपसंद एक्सरसाइज़ करना बहुत जरूरी है। आप समझ सकतें हैं कि तंदुरुस्त रहने को पहले सुख की संज्ञा क्यों दी गयी है। दूसरा सुख – पर्याप्त आय का होना मतलब करोड़ों का बैंक बैलेंस व जायदाद नहीं परन्तु इतना कि आप अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें व मनोरंजन के लिए भी कुछ बचा रहे- जैसे बाहर खाना पीना, सिनेमा देख सकना या घूमने- फिरने के लिए अपनी मनपसंद जगहों या समुद्रों व पहाड़ों की सैर पर जा पाना। तीसरा सुख- मधुर भाषिणी व समझदार जीवन साथी का होना ।क्योंकि घर की कलह आपके सम्पूर्ण जीवन की शान्ति को भंग कर देती है ।

कहतें हैं न कि इससे सुख-चैन दोनों चला जाता है। इसलिए जब दोनों में से एक बोल रहा हो तो एक चुपचाप दूसरे की बात सुन ले, तो आधी समस्या वही मौके पर ही ख़त्म समझो। चौथा सुख- आज्ञाकारी व बुद्धिमान पुत्र या पुत्री का होना ।यह हमारे बुढ़ापे की लाठी जो है। और यह काफ़ी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आपने अपने माता-पिता से कैसे व्यवहार किया है? पाँचवाँ सुख- आपके स्वयं के पास ज्ञान अथवा बुद्धि का होना। क्योंकि जीवन में रोटी, कपड़ा और मकान के बाद सबसे अधिक ज़रूरत ज्ञान की है।

आपको अपना साधारण जीवन जीने के लिए भी सामान्य ज्ञान की जरूरत जो पड़ती है। और इसे हरदम हासिल करते रहना पड़ता है, अर्थात् रोज़ आपको सीखते रहना पड़ता है व कई बार तो आपकी जिन्दगी आपको सिखा रही होती है। छठा सुख – अच्छा आवास होना, जहॉं आप सुकून भरी नींद लें सकें। और आप तो जानते ही हैं कि बिना नींद लिए अगला दिन कितना बेकार सा बीतता है। सातवां सुख- सत्संगति अर्थात् अच्छे लोगों के साथ से राज्य में अपना हक़ मिलना या अच्छी जान पहचान होना।

और ये सातों सुख शुभ कार्य करने वाले भाग्यशाली मनुष्य को मिलतें हैं। इसलिए परोपकार व निज धर्म करते रहना चाहिए। जीवन को सुखी व प्रसन्न बनाने के लिए यह आवश्यक है कि हम प्रश्नों व समस्याओं पर अपने ही द्रष्टिकोण से नहीं बल्कि सामने वाले के द्रष्टिकोण से भी विचार करें ।जो व्यक्ति हमसे सहमत नहीं हो पा रहा है, उसके स्थान पर अपने को रखें व देखें कि वह क्यों हमारी बात नहीं मान पा रहा है। जहॉं हमने उस प्रश्न व उस समस्या को उसके द्रष्टिकोण से देखने का प्रयत्न किया तो उत्तर पाने में व हल निकालने में देर नहीं लगती।
लेखक ‘अद्भुत श्रीमद्भागवत'(मौत से मोक्ष की कथा) के रचनाकार हैं।

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