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संसद में गतिरोध लोकतंत्र के लिए कितना जायज़?

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सदन में जिन विषयों को लेकर हंगामा हो रहा है अगर वो मुद्दे जायज हैं तो फिर इसके कारण देश हित के दूसरे काम अगर रुक जाएं तो उसे क्या जायज ठहराया जा सकता है? एक रिपोर्ट के अनुसार संसद सत्र के दौरान प्रति मिनट ढाई लाख रुपए का खर्च आता है. आखिर हमारे देश के सांसदों का फोकस समस्या के समाधान से ज्यादा समस्या को लेकर शोर मचाने पर क्यों है?

अशोक भाटिया

संसद का मानसून सत्र का 19 जुलाई से शुरू हुआ हैं । विपक्ष सत्र के दौरान पेगासन, कोरना की दूसरी लहर से निपटने के तरीके, ईंधन की कीमतों में वृध्दि और किसान आन्दोलन के मुद्दे पर सरकार को घेरना चाहती और मूल एजेंडा के अनुसार नहीं चलना चाहती । इस कारण लगातार 9 वें दिन बिना कोई कामकाज किए दोनों सदन बार-बार स्थगित करने पड़े हैं । और आगे भी ऐसी ही उम्मीद है । वैसे तो भारतीय संसद के कामकाज में विपक्ष के हंगामे और शोर-शराबे के कारण बाधा पडऩा कोई नई बात नहीं है लेकिन जब लगातार 9 दिनों तक कोई कामकाज न हो तो चिंता होना स्वभाविक ही है।

लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष के बीच नोक-झोंक, बहसबाजी, दोषारोपण या फिर यदा-कदा सदन से बहिर्गमन तो क्षम्य है लेकिन कुछ सालों में भारत में यह परिपाटी बन गई है जिसे लोकतंत्र के लिए कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता । इस वक्त सदन में जिन विषयों को लेकर हंगामा हो रहा है अगर वो मुद्दे जायज हैं तो फिर इसके कारण देश हित के दूसरे काम अगर रुक जाएं तो उसे क्या जायज ठहराया जा सकता है? एक रिपोर्ट के अनुसार संसद सत्र के दौरान प्रति मिनट ढाई लाख रुपए का खर्च आता है. आखिर हमारे देश के सांसदों का फोकस समस्या के समाधान से ज्यादा समस्या को लेकर शोर मचाने पर क्यों है? और जब संसद की कार्यवाही न चलने से देश के राजकोष पर करोड़ों रुपए का भार पड़े तो क्या यह चिंता का विषय नहीं है? क्या संसद में हंगामे से किसी भी समस्या का हल हो सकता है? क्या केवल सांसदों को अपना वेतन बढ़वाने का ही हक है? आखिर हंगामे रोकने का रास्ता क्या है? आखिर जनता का पैसा इस तरह से बर्बाद करने के लिए जिम्मेद्दार कौन है?

लोकतन्त्र में संसद की महत्ता इस प्रकार विवेचित है कि इसके पास देश के किसी भी संवैधानिक पद पर प्रतिष्ठापित व्यक्ति के विरुद्ध अभियोग चलाने का अधिकार है। इसके साथ ही जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुनी गई लोकसभा के पास अधिकार है कि वह इस सदन में बहुमत के आधार पर किसी भी दल या दलों के गठबन्धन को सत्ता पर काबिज करे और उसके अल्पमत में आने पर उसे हटा दे। इसे देश का सर्वोच्च सदन कहने के पीछे मन्तव्य यही है कि इसकी समन्वित सत्ता के आगे देश का प्रत्येक संवैधानिक संस्थान नतमस्तक हो परन्तु संसद को यह सर्वोच्चता भारत का संविधान ही देता है और तय करता है कि इसमें जनता द्वारा परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से चुने गये प्रतिनिधि उसका सच्चा प्रतिनिधित्व करते हुए अपने दायित्व का शुद्ध अन्त:करण से निर्वहन करें।

इस संसद की संरचना सत्ता व विपक्ष में बैठे हुए राजनीतिक दलों के सदस्यों से बनती है। इनका कर्तव्य होता है कि वे सत्ता पर आसीन सरकार को संविधान के अनुसार काम करते हुए देखें। यह कार्य वे अपने-अपने सदनों के बनाये गये नियमों में बंधकर इस प्रकार करते हैं कि हर हालत में उनका लक्ष्य जनहित व राष्ट्रहित रहे। इसी जनहित व राष्ट्रहित को देखते हुए हमारे संविधान निर्माताओं ने संसद के माध्यम से सत्ता पर काबिज किसी भी सरकार की जवाबदेही संसद के प्रति नियत की और सुनिश्चित किया कि विपक्ष में बैठे सांसदों की यह जिम्मेदारी होगी कि वे सरकार के हर फैसले या कदम की संसद के भीतर तसदीक करें और इस कार्य के लिए संसद के सदनों द्वारा बनाये गये नियमों का पालन करते हुए किसी भी जनहित के मुद्दे पर सरकार से जवाबतलबी करें।

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