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आशंकाओं के बीच भूटान से बेहतर संबंधों की उम्मीद

  • प्रमोद भार्गव
    भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भूटान नरेश जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक के बीच नई दिल्ली में हुई बातचीत से हाल में उपजी कुछ आशंकाओं का समाधान होता दिखा है। दोनों देश डोकलाम मुद्दे समेत कई अन्य राष्ट्रीय हित से जुड़े मुद्दों पर पूर्व निर्धारित पृष्ठभूमि पर ही वचनवद्ध रहेंगे। इस दृष्टि से ‘पहले से ही घनिष्ट संबंधों’ को और मजबूती देने के लिए पांच सूत्री गतिविधियों पर आगे बढ़ते रहेंगे, जिससे परस्पर समन्वय और दृढ़ होंगे। इस सिलसिले में भारत के विदेश सचिव विनय क्वात्रा का कहना है कि भूटान नरेश की भारत यात्रा विविध क्षेत्रों में हमारे सहयोग का और व्यापक खाका रचती है।’ दोनों देशों के बीच आवागमन सरल हो और अंतरंगता बढ़े, इस नजरिये से असम के कोकराझार से लेकर भूटान के गेलफू के बीच रेल परियोजना पर काम चल रहा है। दोनों देशों के बीच यह पहला रेल संपर्क होगा। इसके अलावा जिन पांच सूत्रीय कार्यक्रमों के विकास की रूपरेखा को अंजाम तक पहुंचाया जाएगा, उनसे परस्पर तालमेल और पुख्ता होगा। भूटान के साथ 13वीं पंचवर्षीय योजना में सहयोग करते हुए भारत उसके विकास में सहयोग करता रहेगा। साथ ही वह व्यापार, सूचना तकनीक में निवेश के साथ रेल, हवाई सुविधा और अंतर्देशीय जलमार्ग भी विकसित करेगा।
    भूटान में भारत द्वारा दीर्घकालिक और सतत व्यापार सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी, ताकि दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं मजबूत हों। अक्षय ऊर्जा के संदर्भ में भी भारत भूटान को मदद उपलब्ध कराएगा। साथ ही अभिनव पहल करते हुए भारत भूटान को अंतरिक्ष क्षेत्र और स्टार्टअप में भी योगदान देगा। देखा जाए तो भूटान अब तक भारत की सलाह के बिना आगे नहीं बढ़ता था। धर्म और संस्कृति में समानता होने के कारण दोनों देशों के बीच शताब्दियों से मधुर संबंध बने रहे हैं। लेकिन भूटान के प्रधानमंत्री लोतेय शेरिंग ने हाल ही में एक साक्षात्कार में जैसा बयान दिया, उससे कुछ समय के लिए यह भ्रम पैदा हुआ था कि वह डोकलाम पर चीन की भाषा बोल रहे हैं। वस्तुत: डोकलाम विवाद का हल करने के लिए शेरिंग ने कहा था कि चीन को भी इस वार्ता में शामिल किया जाए और चीन ने भूटान की सीमा के भीतर कोई गांव नहीं बसाया है। जबकि इन्हीं दोनों मुद्दों पर वर्ष 2017 में चीन से भारत और भूटान का इतना विवाद गहराया था कि सैन्य हस्तक्षेप के हालात उत्पन्न हो गए थे और लगभग ढाई माह तक गतिरोध बना रहा था। जबकि भारत का आरंभ से ही यह मानना रहा है कि चीन ने अवैध तरीके से डोकलाम पर कब्जा किया हुआ है। उपग्रह से लिए गए चित्रों से पता चला था कि चीन ने भूटान की धरती पर गांव बसा लिया है।
    ऐसे में भूटान के बदलते रुख से यह संदेह पैदा होना स्वाभाविक है कि शायद भूटान ने चीन के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाने के लिए द्विपक्षीय बातचीत शुरू कर दी है। इसीलिए शेरिंग ने कहा था कि किसी भी पक्ष को तीनों देशों के वर्तमान त्रिकोणीय बिंदु पर एकतरफा कोई भी राय बनाने की जरूरत नहीं है। यह त्रिकोण दुनिया के मानचित्र पर बटांग-ला नाम से जाना जाता है। चीन की चुंबी घाटी बटांग-ला के उत्तर में है। भूटान की दक्षिणी, पूर्वी और पश्चिमी सीमा भारत से सटी हुई है। लिहाजा चीन जिस तरह से अपने पड़ोसी देशों पर अनैतिक दबाव बनाकर अपनी साम्राज्यवादी नीतियों को विस्तार देकर थोपने में लगा है, उसका दंश भूटान को भी झेलना पड़ रहा है। वैसे इन आशंकाओं पर भूटान नरेश जिग्मे खेसर नामग्याल की भारत यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से हुई द्विपक्षीय वार्ता में राहत दिखी। फिर भी चीन कतई विश्वसनीय पड़ोसी नहीं है। चीन का भूटान में दखल : चीन और भूटान के बीच लगभग 470 किमी लंबी सीमा जुड़ी हुई है। चीन भलीभांति जानता है कि तिब्बत को उसने जिस अनैतिक दखल के चलते हथिया लिया है, उसी तरह भूटान को भी आधिपत्य में ले लेगा। वर्ष 1980 में चीन ने जो मानचित्र सार्वजनिक किया था, उसमें ग्यालाफुग ग्राम को भूटान की सीमा में दिखाया था, परंतु अब उस मानचित्र में उसने छेड़छाड़ किया है। चीन अब भूटान की 12 प्रतिशत जमीन पर दावा जताता है। दरअसल चीन यह सब सोची-समझी रणनीति के तहत कर रहा है। चीन ने इससे पूर्व डोकलाम क्षेत्र को भी हथियाना चाहा था। चालाकी बरतते हुए चीन ने इसे नया नाम डोगलांग दे दिया था, ताकि यह क्षेत्र उसकी विरासत का हिस्सा लगे। इस क्षेत्र को लेकर चीन और भूटान के बीच कई दशकों से विवाद जारी है।
    चीन इस पर अपना मालिकाना हक जताता है, जबकि वास्तव में यह भूटान के स्वामित्व का क्षेत्र है। चीन सड़क के बहाने इस क्षेत्र में स्थायी घुसपैठ के प्रयास में है, जबकि भूटान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानता रहा है। दरअसल चीन लंबे समय से साजिश रचता रहा है कि चुंबा घाटी जो भूटान और सिक्किम के ठीक मध्य में सिलीगुड़ी की ओर 15 किलोमीटर की चौड़ाई के साथ बढ़ती है, उसका एक बड़ा हिस्सा सड़क निर्माण के बहाने हथिया ले। चीन ने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए भूटान को यह लालच भी दिया था कि वह डोकलाम का 270 वर्ग किमी भू-क्षेत्र चीन को दे दे और उसके बदले में भूटान के उत्तर पश्चिम इलाके में लगभग 500 वर्ग किमी भूमि ले ले। परंतु वर्ष 2001 में जब यह प्रस्ताव चीन ने भूटान को दिया था, तभी वहां के शासक जिग्मे सिंग्ये वांगचुक ने भूटान की राष्ट्रीय विधानसभा में यह स्पष्ट कर दिया था कि भूटान को इस तरह का कोई प्रस्ताव मंजूर नहीं है। छोटे से देश की इस दृढ़ता से चीन आहत हो गया था। इसलिए घायल सांप की तरह चीन अपनी फुंफकार से भारत और भूटान को डस लेने की हरकत में लगा है। इतना होने के बावजूद चीन अपनी चालाकियों से बाज नहीं आ रहा है। उसकी कुटिल चाल का आस्ट्रेलियाई मीडिया ने राजफाश किया था कि चीन ने भूटान की भूमि में आठ किमी अंदर घुसकर ग्यालाफुग नाम का गांव बसा लिया है। यही नहीं, यहां चीन ने भवन, सड़कें, पुलिस स्टेशन और सेना के शिविर भी बना लिए हैं। गांव में बिजली की आपूर्ति के लिए ऊर्जा संयंत्र, गोदाम और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का दफ्तर भी खुल गया है। गांव में 100 से ज्यादा लोग रह रहे हैं।

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