गौरव दिवस से असल नायकों के सम्मान की शुरुआत

Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on linkedin
LinkedIn
Share on pinterest
Pinterest
Share on pocket
Pocket
Share on whatsapp
WhatsApp

वनवासी, आदिवासी अथवा जनजातीय क्षेत्रों से अनेक जननेता उभरे और अंग्रेजों से जूझते हुए एक के बाद एक शहीद होते रहे। लेकिन इनमें से बिरसा मुंडा, टांट्या भील, तिलका मांझी, तानाजी भगत, रानी गाइदिनल्यू, अल्लूरी सीतारामा राजू, फूलो और झानो मुर्मू तो ऐसे जांबाज नेता रहे हैं, जिन्होंने अंग्रेजों की नाक में कौड़ी डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

  • डॉ. राघवेंद्र शर्मा, मप्र बाल सरंक्षण आयोग के पूर्व अध्यक्ष

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से लेकर अब तक राजनैतिक गलियारों में केवल उन नेताओं की जयंतियां और पुण्यतिथियां मनाने का रिवाज कायम रहा, जो या तो सत्ता पर आसीन दलों के रहनुमा रहे या फिर समयानुकूल आचरण अपनाने में सिद्धहस्त स्वयंभू इतिहासकारों ने जिन्हें इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण अक्षरों में अंकित कर दिया। फल स्वरूप दलित शोषित और वंचित वर्गों से उपजे वे जननेता इतिहास के पन्नों में दर्ज होने से वंचित ही रह गए, जिन्होंने अंग्रेजों से असल मायने में लोहा लिया और आजादी की लड़ाई को तेज धार प्रदान की।

हम जिन्हें वननवासी, आदिवासी अथवा जनजातीय वर्ग के रूप में देखते हैं, उन समुदायों के नेताओं के साथ भी अंग्रेज़ों व तत्कालीन सरकारों से प्रभावित इतिहासकारों ने न्याय नहीं किया। इनके द्वारा भारत को आजादी दिलाने का श्रेय लूटने वाले एक संगठन विशेष और एक परिवार विशेष के लोग ही दस्तावेजों में महिमामंडित किए जाते रहे। लेकिन अब नया भारत तेजी से बदल रहा है। लगातार उच्च शिक्षित और परिपक्व हो रहे युवा यह जानना चाह रहे हैं कि देश को आजादी क्या किसी एक संगठन अथवा एक परिवार के द्वारा ही दिला दी गई?

यह भी शोध का विषय बन रहा है कि वह कौन लोग थे जिन्हें अंग्रेजों द्वारा लगातार गोलियों से भूना जाता रहा, फांसियों पर लटकाया जाता रहा, काला पानी दिया जाता रहा और हर पल- हर क्षण अत्याचार किए जाते रहे। यूं तो वनवासी, आदिवासी अथवा जनजातीय क्षेत्रों से अनेक जननेता उभरे और अंग्रेजों से जूझते हुए एक के बाद एक शहीद होते रहे। लेकिन इनमें से बिरसा मुंडा, टांट्या भील, तिलका मांझी, तानाजी भगत, रानी गाइदिनल्यू, अल्लूरी सीतारामा राजू, फूलो और झानो मुर्मू तो ऐसे जांबाज नेता रहे हैं, जिन्होंने अंग्रेजों की नाक में कौड़ी डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह सभी आदिवासी नेता छोटे-मोटे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नहीं थे। सिदो, कान्हू चांद, भैरव, फूलो और झानो मुर्मू संथाल विद्रोह के नायक नायिका हैं।

वही नागालैंड की रानी गाईदिन्ल्यू ने 1932 के विद्रोह का नेतृत्व किया है। तानाजी भगत अंग्रेजों और सूदखोरों के संयुक्त उत्पीडऩ की खिलाफत करते रहे। अल्लूरी सीतारामा राजू ने 1882 में रंपा आंदोलन की कमान संभाली और जंगलों पर आदिवासियों के जन्मजात अधिकारों की अंग्रेजों से रक्षा की। जबकि बिरसा मुंडा तो धर्मांतरण, आर्थिक शोषण, आदिवासियों की जमीनों पर कब्जे के खिलाफ लगातार अंग्रेजों से लोहा लेते रहे। वे आदिवासियों के सबसे बड़े संगठक के रूप में याद किए जाते हैं। वही टांट्या भील को आदिवासियों का रोबिन हुड कहा जाता है।

टांट्या भील लगातार अंग्रेजी सेना को छकाते रहे और वंचित शोषित वर्ग के शोषण व अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद किए रहे। पूरा देश जानता है कि आजादी के इन मतवालों को आजाद भारत में वह सम्मान मिल ही नहीं पाया, जिसके वह हकदार हैं। जब कभी भी स्वतंत्रता प्राप्ति की खुशी में उत्सव मनाने की बात आई, तब केवल दल विशेष और परिवार विशेष के लोगों को ही अनुग्रहित किया जाता रहा। बड़े हर्ष का विषय है कि इस बार जनजातीय गौरव दिवस को जनजातीय गौरव सप्ताह के रूप में मनाया जा रहा है।

यही नहीं, इसकी शुरुआत देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया जाना और भी ज्यादा उत्साह का विषय है। कितनी अच्छी बात है कि एक ओर नूतनता का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण बनाने जा रहे एक अत्याधुनिक रेलवे स्टेशन का लोकार्पण मध्य प्रदेश की पुण्य धरा पर होने जा रहा है तो उसका दिन भी जनजातीय गौरव दिवस नियत किया गया। इसे नूतन और पुरातन युग का मेल मिलाप कहा जाए तो अनुचित नहीं होगा। जनजातीय गौरव दिवस के रोज प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी एक ओर नूतनतम रेलवे स्टेशन को लोकार्पित कर रहे हैं, तो उसी क्षण वे पुरातनता की अलख जगाए रखने वाले जनजातीय लोगों की एक विराट सम्मेलन का आगाज करने भी जा रहे हैं। प्रदेश के ऊर्जावान मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा प्रमुख श्री विष्णु दत्त शर्मा के नेतृत्व में इस बाबत युद्ध स्तर पर तैयारियां किया जाना भी दर्शनीय हैं।

लिखने का आशय यह कि अब वे दिन लद गए जब भारत की आजादी के नाम पर सुनियोजित कार्यपद्धती के तहत कुछ सीमित नेताओं और उनके सिपहसालारों को ही महामंडित किया जाया करता था। अब देश का जन और तंत्र, दोनों ही आजादी के असल नायकों को पहचान रहे हैं तथा उनका सम्मान करने के लिए बढ़-चढ़कर आगे आ रहे हैं। केंद्र की भाजपानीत मोदी सरकार ने इसकी शुरुआत जोर शोर से कर दी है और मध्य प्रदेश के सत्ता- संगठन ने इस पावन संकल्प को क्रियान्वित रूप देने का बीड़ा उठा लिया है। अब हमारा दायित्व है कि हम दलगत राजनीति और छुद्र स्वार्थों से ऊपर उठकर, नई पावन परंपराओं का स्वागत करें। सही मायने में ऐसा करके ही हम आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का उचित आदर सम्मान कर पाएंगे।

Never miss any important news. Subscribe to our newsletter.

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Recent News

Related News