Home लेख कांफ्रेंस से हिन्दुत्व ‘डिस्मैंटल’ हुआ या होगा

कांफ्रेंस से हिन्दुत्व ‘डिस्मैंटल’ हुआ या होगा

21
0

इसी सप्ताह हुए ‘डिस्मेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’ सम्मेलन के आयोजक यहीं दिल्ली-कलकत्ता और श्रीनगर में बैठे थे। जब इसमें बोलने वालों की सूची और चेहरे देखे गए तो साफ हो गया कि भारत के कम्युनिस्ट और मुस्लिम इस सम्मेलन के असली आयोजक थे और उन्होंने आयोजक के तौर पर हमेशा से हिन्दू विरोधी रही एक अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रूश्के का इस्तेमाल किया। इसे जानना बेहद जरूरी है कि ऑड्रे ट्रश्के हिन्दू विरोधी क्या-क्या करतूतें करती रही हैं। यह वही ऑड्रे ट्रश्के हैं , जिसने 2018 में दावा किया था कि सीता ने राम को स्त्री विरोधी सुअर बताया था हालाँकि, इसका कहीं भी कोई प्रमाण नहीं था। उस की ज्यादातर हिन्दू विरोधी बातें अप्रमाणिक होती हैं, इसलिए उन की छवि पहले से ही हिन्दू विरोधी की है। ऑड्रे ट्रूश्के की वेबसाइट पर हिन्दुओं और हिंदुत्व के खिलाफ लिखने के अलावा कुछ नहीं है।

  • अजय सेतिया, इंडिया गेट टीवी यूट्यूब और इंडियागेटन्यूज डाट काम के सम्पादक हैं

पिछले एक महीने में ‘डिस्मैंटलिंग ग्लोबल हिन्दुत्व’ कांफ्रेंस की बहुत चर्चा रही, जो 10 से 12 सितंबर तक कथित तौर 50 अमेरिकी विश्वविद्यालयों के प्रयोजन से हुई थी। कांफ्रेंस की पहली विचित्र बात यह थी कि जाहिर तौर पर आयोजकों के नाम गायब थे। जब अमेरिका और कनाडा से लेकर यूरोपियन देशों तक के हिन्दू विरोध में सड़कों पर उतरे तो भारत में भी विरोध के स्वर उभरे। आम तौर पर भारतीय हिन्दू ऐसी घटनाओं को ज्यादा अहमियत नहीं देता। हिन्दुओं को पता है कि हिन्दू विरोधी ताकतें सनातन हिन्दू धर्म का कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं।

हिन्दुओं की इस मानसिकता की झलक जग्गी वासुदेव यानी सदगुुरु के कथन से भी मिलती है। उन्होंने कहा कि यह कोई नई बात नहीं है, हिन्दू को खत्म करने की हजारों साल से कोशिश की गई , लेकिन वे विफल हुए। हिन्दू आज भी है और रहेगा, इन कांफ्रेंसों से हिन्दू , हिन्दूईज्म या हिंदुत्व को कोई खतरा नहीं। लेकिन पिछले तीन दशक से हिन्दू अपनी पहचान के लिए ज्यादा संवेदनशील हुआ है, इस लिए पूरी दुनिया में कांफ्रेंस के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे। तब साऊथ एशिया स्कालर्स एक्टिविस्ट नाम से एक बयान जारी करके कांफ्रेंस के बारे में सफाई दी गई थी। इस संस्था में कौन है, कब बनी, कुछ पता नहीं। लेकिन जिस संस्था के साथ एक्टिविस्ट शब्द जुड़ जाए, उस के तार स्वाभाविक रूप से भारत के कम्युनिस्टों के साथ जुड़े होते हैं।

यहीं से पता चला कि यह अन्तराष्ट्रीय कांफ्रेंस नहीं है, बल्कि भारत के कम्युनिस्टों का ही नया मंच है। खैर स्पष्टीकरण में वही बातें कहीं गई, जो विदेशी मीडिया हिन्दुओं के बारे में हमेशा से बढ़ा-चढ़ाकर कहता आया है- जातिवाद, पिछड़ों खासकर दलितों का शोषण और महिलाओं पर अत्याचार जबकि हिन्दू समाज अपनी विकृतियों से काफी उबर चुका है और उबर रहा है। महिलाओं की हालत मुस्लिम महिलाओं से बेहतर है, जिन्हें आज भी तालिबानी भेड़ बकरियों की तरह बेच रहे हैं।

लेकिन बात कांफ्रेंस के आयोजकों की, इसे छिपाने की क्या जरूरत थी। कुछ लोगों को दस साल पहले अमेरिका में गिरफ्तार किए गए ‘गुलाम नबी फई का प्रकरण याद होगा। वह अपनी असली पहचान छिपाकर अमेरिका में ऐसे ही भारत विरोधी अनेक सम्मेलनों का आयोजक था। उन आयोजनों में राजेन्द्र सच्चर, कुलदीप नैयर, अरुंधती राय, गौतम नवलखा, प्रफुल्ल बिदवई, कमल मित्र चिनाय आदि वामपंथी बुद्धिजीवी गुलाम नबी फई के खर्चे पर अमेरिका जाया करते थे। उसने एक संस्था बना रखी थी ‘कश्मीरी अमेरिकी काउंसिल।

पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आई.एस.आई उसे भारत विरोधी कांफ्रेंस करने के लिए पैसा देती थी। लेकिन वह खुद को ‘स्वतंत्र बताकर काम करता था, अमेरिकी लोग आई.एस.आई प्रोपेगंडा को भारत के बुद्धिजीवियों और पीडि़तों का आवाज समझकर दशकों तक धोखा खाते रहे थे। बाद में इसी धोखे के लिए फई को अमेरिकी पुलिस ने गिरफ्तार किया था। बहरहाल, जिस तरह, और जिस समय यह ‘डिस्मैंटलिंग ग्लोबल हिन्दुत्व का आयोजन किया गया, उससे साफ है कि इस्लामी जिहाद, तालिबान, और शरीयत की क्रूरताओं से ध्यान हटाने के लिए कांफ्रेंस की गई। कुछ का यह भी मत है कि इस गठजोड़ में ईसाई मिशनरी भी शामिल थे।


इस संबध में अपनी खोजबीन से मालूम हुआ कि कार्यक्रम के आयोजक यहीं दिल्ली-कलकत्ते और श्रीनगर में बैठे थे। जब कांफ्रेंस में बोलने वालों की सूची और चेहरे देखे तो साफ हो गया कि भारत के कम्युनिस्ट और मुस्लिम कांफ्रेंस के असली आयोजक थे। लेकिन उन्होंने आयोजक के तौर पर हमेशा से हिन्दू विरोधी रही एक अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रूश्के का इस्तेमाल किया। ऑड्रे ट्रुश्के हिन्दू विरोधी क्या क्या करतूतें करती रही हैं। यह वही ऑड्रे ट्रुश्के हैं , जिसने 2018 में दावा किया था कि सीता ने राम को स्त्री विरोधी सुअर बताया था हालाँकि, इसका कहीं भी कोई प्रमाण नहीं था। उस की ज्यादातर हिन्दू विरोधी बातें अप्रमाणिक होती हैं, इसलिए उन की छवि पहले से ही हिन्दू विरोधी की है।


उसकी वेबसाइट पर जाकर देखा तो जिस तरह भारत में राम पुनियानी, रोमिला थापर, इरफान हबीब जैसे तथाकथित इतिहासकार मुगल शासकों का महिमा मंडन और हिन्दू शासकों और हिन्दुओं के खिलाफ बोलते रहते हैं, उसी तरह ऑड्रे ट्रूश्के की वेबसाइट पर हिन्दुओं और हिंदुत्व के खिलाफ लिखने के अलावा कुछ नहीं। वह उन इतिहासकारों में से एक हैं जिन्होंने अत्याचारी मुगल सम्राट औरंगजेब के अपराधों को ढंकने और उन्हें महान बताने के लिए सारा जीवन लगा दिया। अपनी पुस्तक ‘औरंगजेब : द मैन एंड मिथ में क्रूर मुगल औरंगजेब को शांतिप्रिय और मंदिरों का रक्षक बताया है, जबकि वह क्रूरतम हिन्दू विरोधी मुगल बादशाह था, जिसने लाखों हिन्दुओं का कत्ल करवाया और मंदिर तुड़वाए। वह अमेरिका में मुसलमानों की ओर से बनाए गए संगठन ‘स्टूडेंट्स अगेंस्ट हिंदुत्व के सलाहकार बोर्ड में हैं।

‘स्टूडेंट्स अगेंस्ट हिंदुत्व में सभी मुस्लिम हैं और ज्यादातर पाकिस्तानी हैं, इन्होंने एक और संगठन बनाया हुआ है जिसका नाम है ने ‘स्टैंड विद कश्मीर, ये दोनों संगठन मिल कर भारत विरोधी कार्यक्रम करते रहते हैं। ‘स्टूडेंट्स अगेंस्ट हिंदुत्व ने नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ भी अमेरिका और अन्य देशों में भारत और हिंदुत्व के खिलाफ प्रचार किया था। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अब जबकि पूरी दुनिया इस्लामिक आतंकवाद से आतंकित है, ऐसे में दुनिया भर के बुद्धिजीवी अचानक हिंदुत्व से भयभीत कैसे हो गए। अपना शक एकदम सही था कि भारत में हिंदुत्व के उभार को रोकने में पूरी तरह विफल रहने वाले नक्सली, कम्युनिस्ट और कट्टरवादी मुस्लिम ही इस ‘डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व कार्यक्रम के आयोजक थे, उन्होंने अमेरिकी विश्वविद्यालयों के सामाजिक अध्ययन विभागों को गुमराह कर के प्रायोजक बनाया था, जिनमें से कुछ ने बाद में आपत्ति भी जाहिर की।


भाजपा और संघ विरोधी इतिहासकार रामचन्द्र गुहा ने हाल ही में लिखा था कि भारत में कम्युनिस्ट इसलिए विफल हो गए, क्योंकि उन्होंने अपना फोकस हिन्दू विरोध पर रखा। कम्युनिस्टों के 70 साल के हिन्दू विरोध का नतीजा यह निकला कि हिंदुत्व उभार पर आ गया और कम्यनिस्ट खत्म हो गए। हिन्दुओं और हिंदुत्व की अनदेखी कर मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाली कांग्रेस को भी सत्ता से बाहर होना पड़ा। लेकिन ‘डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व जैसी कांफ्रेंस से जाहिर है कि कम्युनिस्टों ने हिन्दू विरोध की अपनी विचारधारा नहीं छोड़ी। भारत में लोगों को गुमराह करने में विफल रहने के बाद उन्होंने दुनिया भर में हिन्दुओं के खिलाफ मुहिम शुरू कर दी है।

नक्सल समर्थक आनंद पटवर्धन और नंदिनी सुंदर, वामपंथी पत्रकार नेहा दीक्षित, सी.पी.एम की होलटाईमर कविता कृष्णन, आयशा किदवई, बानू सुब्रहमन्यम, भंवर मेघवंशी प्रमुख वक्ताओं में शामिल थे। सब के सब भारतीय हिंदूफोबिक। भारत में कितना भ्रम फैलाया गया कि हिंदुत्व के खिलाफ ग्लोबल कांफ्रेंस हो रही है, जिस में दुनिया भर के इतिहासकार, इतिहास और सभ्यताओं, संस्कृतियों के जानकार विद्वान और 50 विश्वविद्यालय हिस्सा ले रहे हैं। क्या सिर्फ क्रिस्टोफे जेफिरेलेट के शामिल होने से कांफ्रेंस अन्तर्राष्ट्रीय हो गई। हम आप को बताते हैं कि क्रिस्टोफे जेफिरेलेट कौन है, वह मूल रूप से फेंच हैं, लेकिन उसने दक्षिण एशिया खासकर भारत और पाकिस्तान पर काफी रिसर्च की है।

भारत, हिन्दूइज्म, हिन्दू नेशनलिज्म , पाकिस्तान नेशनलिज्म, इस्लामिक कट्टरवाद, तालिबान पर कई किताबें लिखी हैं। उसकी रिसर्च और भविष्यवाणी थी कि हिंदुत्व पर चलने वाली भारतीय जनता पार्टी कभी भी भारत में सरकार नहीं बना पाएगी । अब वह परेशान है कि भारत में हिंदुत्व के उभार और लगातार दो बार अपने बूते पर भाजपा की सरकार बनने से उसकी पूरी रिसर्च गलत साबित हो गई।


दूसरे वक्ताओं में मोहम्मद जुनैद को लें, जो अमेरिका में रह रहा है, उसने अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से स्नातक और जेएनयू से एमए और एम फिल किया है। पढाई के दौरान वह सीपीएम का सक्रिय कार्यकर्ता था और कश्मीर पर भारत विरोधी लाइन लेता रहा था। उसने विदेशी मदद से ‘कश्मीर में सरकारी हिंसा नाम से भारत विरोधी पेपर भी लिखा था। आनन्द पटवर्धन ने राम जन्मभूमि आन्दोलन को बदनाम करने और युवा भारतीयों के मन में हिंदू विरोधी घृणा फैलाने के लिए कई प्रचार वीडियो बनाए थे। बाद में राम के नाम पर फिल्म भी बनाई, जिसमें हिंदू समुदाय के खिलाफ जहर उगलने के लिए बाबरी मस्जिद विध्वंस की कुछ चुनिंदा घटनाओं का इस्तेमाल किया गया।

अगली वक्ता थी कविता कृष्णन। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की पोलित ब्यूरो की सदस्य और महिला विंग की सचिव कविता कृष्णन के बारे में कौन नहीं जानता, वह नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ भी आंदोलनकारी मुस्लिमों के साथ थी और तीन तलाक के खिलाफ बने कानून के खिलाफ भी मुस्लिम कट्टरपंथी महिला विरोधी पुरुषों के साथ खड़ी थीं। वह टीवी चैनलों पर हिन्दू विरोधी स्टेंड लेती ही रहती हैं। इसके बाद नाम आता है आयशा किदवई का, वह न सिर्फ घोर वामपंथी हैं, बल्कि वामपंथियों की उम्मीन्द्वार के नाते जेएनयू की टीचर्स एसोसिएशन जुंटा की अध्यक्ष भी रही हैं। 2016 में जब वामपंथी कन्हैया को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया तो आयशा ने मोदी सरकार के खिलाफ प्रदर्शनों का आयोजन किया था।

भंवर मेघवंशी की कोई ज्यादा पहचान नहीं है। भंवर मेघवंशी राजस्थान का वह व्यक्ति है, जिसने 2019 के चुनाव से पहले दावा किया था कि वह कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक था और संघ में जातिवाद के कारण उसने संघ छोड़ दिया। अब वह वामपंथियों का प्रिय है और वामपंथी उसे हिन्दुओं और हिंदुत्व के खिलाफ इस्तेमाल कर रहे हैं। सदगुरु के शब्दों में उन्हें कुछ हासिल नहीं होगा ।

( इस लेख को इंडिया गेट टीवी यूट्यूब पर सुन भी सकते हैं। )

Previous articleबड़े अतिक्रमणों को संरक्षण, छोटे अतिक्रमणों पर कार्रवाई
Next articleसिर्फ की खरीददारी और सरिताजी की आवाज..

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here