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‘हिन्दी दिवस’ हमारा ‘संकल्प दिवस’ : हिन्दी का ‘स्वरूप’ और ‘सम्मान’ दोनों बचायें

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हिंदी का उद्भव और विकास-भारत की अन्य भाषाओं की तरह संस्कृत से ही है और हिंदी प्रदेशों की बोलियां जैसे ब्रज, अवधि बुंदेलखंडी, भोजपुरी, मैथिली, मगही के साथ, देश की अन्य भाषाएं बंगाली, गुजराती, उडिय़ा, पंजाबी, मराठी आदि इसकी बहनें हैं, जिनके शब्दों से इसका भंडार समृद्ध हुआ है।

  • चिन्मयी, पत्रकार
    swadeshbhopal@gmail.com

हिंदी अत्यंत सहज, सरल, प्यारी, मूल्यवान और समृद्ध भाषा है, हिंदी वह भाषा है जिसके कानों में पड़ते ही मिश्री सी घुल जाती है, उसका नाद ललित प्रवाह की ध्वनि का उतार-चढ़ाव, शब्दों के उच्चारण से मन के भावों को एक अर्थ सा मिलता है। जिससे संवाद में एक मधुरता आती है, एक निजता आती है, चाहे वह ग्रामीण व्यक्ति की अपनी ठसकेदार बोली में बोल रहा हो या शहर का व्यक्ति संपूर्ण सहजता और विनम्रता के साथ बोल रहा हो, हिंदी हमें आनंद ही प्रदान करती है और यही इस भाषा की शक्ति का चमत्कार है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। यह जैसी बोली जाती है, वैसी ही लिखी जाती है, इसका शुद्ध उच्चारण ही इसके शुद्ध लेखन की कुंजी है।

हिंदी का उद्भव और विकास-भारत की अन्य भाषाओं की तरह संस्कृत से ही है और हिंदी प्रदेशों की बोलियां जैसे ब्रज, अवधि बुंदेलखंडी, भोजपुरी, मैथिली, मगही के साथ, देश की अन्य भाषाएं बंगाली, गुजराती, उडिय़ा, पंजाबी, मराठी आदि इसकी बहनें हैं, जिनके शब्दों से इसका भंडार समृद्ध हुआ है। कई विदेशी भाषाओं के शब्द को भी हिंदी में सम्मिलित होकर रच बस गए हैं, जैसे पुर्तगाली का अलमारी, अचार, कमरा, संतरा। फ्रांसीसी का कूपन, डच भाषा का तुरुप, बम, स्पेनी भाषा में सिगरेट, सिगार और दो भाषाओं के मेल से बने शब्द जैसे राजमहल, राज संस्कृत और महल अरबी का शब्द है। हिंदी में संस्कृत ही नहीं अपितु अन्य भाषाओं के शब्दों का भी समावेश है, कौन कहेगा कि हलवा हलवाई, कढ़ाई जैसे शब्द अरबी हैं ? हिंदी का यह स्वभाव ही है कि इसने उसे उदारता पूर्वक दूसरी भाषाओं के शब्दों को भी अपने में ढाल लिया है और सदैव परिवर्तनशील और गतिशील भाषा बनी रही है, यही हिंदी की विशेषता है।

हिंदी का मान-हमको अब एक ही चिंता करनी है भारत की महान संस्कृति के आधार पर, इसे भारत की शक्ति से संपन्न पूर्ण भारतीय भाषा बनाना है, हिंदी हमारी अपनी भाषा है, उसका सम्मान और संरक्षण हमारा संकल्प होना चाहिए। हिंदी दुर्बलता का प्रतीक नहीं अपितु, हमारी शक्ति है और उसको और अधिक शक्तिशाली बनाना, हम हिंदीभाषियों का दायित्व है। माना दूसरी भाषाओं का ज्ञान होना आवश्यक है, परंतु उस ज्ञान को अर्जित करने में हम हमारी स्वभाषा के आत्मसम्मान को नहीं भूल सकते।

हमारी मातृभाषा का तिरस्कार नहीं कर सकते, मातृभाषा यानी मां की भाषा। मां जिसने हमें जन्म दिया है, इस संसार में हमारा अस्तित्व रचा है, उस मां की भाषा का त्याग या उसका उपहास सिर्फ हमें ही नहीं, अपितु अपने संस्कारों का भी खोखलापन प्रकट कर देता है। जैसे हम अपनी मां का सम्मान करते हैं, उतना ही सम्मान मातृभाषा को भी देना चाहिए, क्योंकि दोनों के स्थान में कोई अंतर नहीं है। जैसे मां हमें जीवन देती है वैसे ही भाषा हमें इस जीवन को सही ढंग से चलाने का माध्यम बनती है और आपकी भाषा ही आपकी वाणी है। यह हमारा कर्तव्य है हमें निसंकोच होकर, अपने राष्ट्र और अपनी भाषा पर गर्व करना चाहिए और अगर हम जागरूक नहीं हुए, तो दुनिया इसे हमारी दुर्बलता समझेगी और हमारी अति सुंदर भाषा को भ्रष्ट और बर्बाद कर देगी।

हिन्दी पर वार अंग्रेजों ने सबसे पहले हमारी स्वतंत्रता, फिर धर्म, फिर शिक्षा और आदर्शों की नीव हिलाई थी, तभी वर्षों तक हिंदुस्तान पर अपना कब्जा जमाये रखा था। जब हमें हमारे देश का गौरव था, धर्म का अभिमान था, उस समय हम सर्वश्रेष्ठ थे, परंतु हमारी परतंत्रता ने हमारे स्वाभिमान व राष्ट्रीय अभिमान को भी प्रभावित किया । स्वतंत्रता के बाद अंग्रेज चले गए, किंतु अंग्रेजी हम पर लाद गए, जिसने हमारे देश में हर स्तर पर पराधीनता के प्रभाव को अभी तक मजबूत कर रखा है। आज देश में अंग्रेजी को पहली और हिंदी को दूसरी भाषा का दर्जा प्राप्त है।

देश की अन्य क्षेत्रीय भाषाओं से भी झगड़े पैदा करा दिये, ताकि अंगे्रजी का दबदबा बना रहे। लोगों के मन में यह बात पैदा की गई है कि हिंदी का उपयोग करने से देश का सामाजिक और आर्थिक विकास नहीं होगा, पर अंग्रेजी आपको मान सम्मान दिलाएगी। सोचिए क्या अपने देश की भाषा बोलने से किसी का मान कम हो जाएगा? नहीं यह सिर्फ एक विकृत मानसिकता है। दुनिया के हर देश की अपनी भाषा है और वह लोग उसे सम्मान देते हैं, फिर हम हिंदी बोलने में उसका उपयोग करने में क्यों हिचकते हैं? आज कल हमने अंग्रेजी शब्दों को ऐसे हिंदी बोलचाल और लेखन में घोल दिया है कि, हम अब चाहते हुए भी उनको अलग नहीं कर सकते, इसका जिम्मा बाजारवाद, मेकाले के मानस पुत्रों एवं हिंदी समाचार पत्रों और समाचार चैनलों के ऊपर भी कम नहीं है। वे आज के युवा को आकर्षित करने की भ्रामक होड़ में, हिंदी की हत्या कर रहे हैं और हिंगलिश का उपयोग कर रहे हैं। ऐसा करके हम एक श्रेष्ठ भाषा का विनाश कर रहे हैं।

अपनी मातृभाषा और भारत की भाषायी भावनाओं का गला घोट रहे हों। आने वाली पीढ़ी को हिंदी से दूर कर उसे हिंगलिश परोस रहे हैं, यह उस आने वाले पीढ़ी को उसे सौभाग्य से प्राप्त एक सर्वश्रेष्ठ भाषा से वंचित करने का पाप है। हमारी संस्कृति हमारी धरोहर होती है, अपनी सबसे बड़ी कमाई आपनी भाषा होती है और उसे शुद्ध रखना और सम्मान देना हमारा कर्तव्य है। हिंदी मन की भाषा -जब हम हिंदी बोलते हैं तो बहुत सहजता और आत्मीयता के साथ बोलते हैं, ना संकोच, ना झिझक, मगर दूसरी भाषा में वह अपनापन वह लगाव प्रतीत नहीं होता। यहाँ मैं सरसंघचालक श्री मोहन जी भागवत के भाषण का उदाहरण दूंगी उन्होंने ‘धर्म का व्यापक अर्थ बताया है। अंग्रेजी भाषा में धर्म का अर्थ होता है ‘रिलीजन तो क्या धर्मशाला को रिलीजिस स्कूल कहेंगे। ‘राजधर्म क्या है, यह राजा का रिलीजन है, जो प्रजा का नहीं है ? ‘पुत्र धर्मÓ क्या है यह बेटे का रिलीजन है, जो उसके माता-पिता का नहीं है? उन्होंने कहा हम कितना भी बड़ा भवन बनाएं वह ‘धर्मशालाÓ नहीं होता और जब हम औरों के लिए भवन बनवाते हैं, तब ही वह ‘धर्मशाला कहलाती है।

‘राजधर्म यानी राजा का कर्तव्य है, जो उसे प्रजा के साथ जोड़ता है। पुत्रधर्म यानी पुत्र का कर्तव्य है जो उसे माता-पिता के साथ जोड़ता है। वह धर्म जो व्यक्ति को अपने व्यापक अस्तित्व के साथ जोडऩे का साधन है, इन शब्दों से ही आपको अनुवाद की त्रुटियों का आभास हो गया होगा। अंग्रेजी में जो मतलब धर्म का है, उससे कहीं ज्यादा व्यापकता हिंदी के धर्म में है और दोनों के स्वभाव और व्यवहार भी भिन्न है। अपनी भाषा के उत्तम शब्दार्थ को बिसरा कर, ऐसी भाषा को गले का हार बनाते हैं, जो हमारे देश की जनता की भावना को भी प्रकट नहीं कर सकती।

संस्कृति और समाज में बदलाव, यह विकास की एक निरंतर प्रक्रिया है और यह देखा गया है कि समाज की भाषा बदलती है तो बहुत कुछ बदलना है। और जब यह बदलाव देश की प्रकृति और स्वभाव के अनुरूप होता है, तभी वह स्वाभाविक होता है, अन्यथा अनेक विकृतियों को जन्म देता है। वैसे ही हिंदी हमारे मन और हृदय के अनुरूप भाषा है, इसमें नैसर्गिक परिवर्तन हो सकता है, लेकिन उसको किसी बाजार की योजना के अनुसार षडय़ंत्र पूर्वक समाप्त करने की कोशिश हिंदी प्रेमी सहन नहीं कर सकता। हमारी भाषा का मूल रूप बना रहे, इसका प्रयास पूरे समाज का दायित्व है, तभी हिंदी को बचाया जा सकेगा। इस हिंदी दिवस पर हम सभी यह संकल्प लें कि हम हिन्दी को उसका वह स्थान प्रदान करें, जिसकी वह अधिकारिणी है। और उसके मूल स्वरूप को बचाये रखने के लिये वह प्रत्येक प्रयत्न करें जो आवश्यक हैं।

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