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हे भारत, मैं सावरकर बोल रहा हूँ

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डॉ. पवन सिंह मलिक

आज विश्वभर में जिस प्रकार का एक बौद्धिक विमर्श दिखाई दे रहा है। जहां सभी अपने विचारों की श्रेष्ठता के आधार पर सब को जीत लेना चाहते हैं। जहां केवल मैं सबसे बेहतर हूँ, यह सिद्ध करने की होड़ लगी है। ऐसे में केवल भारत ही वह पुण्यभूमि है जो विश्व के लिए पथ प्रदर्शक के रूप में मार्ग प्रशस्त कर सकती है। क्योंकि हम ‘कृण्वन्तो विश्वर्मायम्Ó के विचार पर चलने वाले लोग है। और हमारे यहां तो कहा भी जाता है कि ‘यहां दीप नहीं, जीवन जलते हैंÓ। ऐसे जीवन जो स्वयं स्वाह हो गए, लेकिन देशभक्ति, विचारों व आदर्श व्यवहारों की इतनी लंबी श्रृंखला छोड़ गए हैं जो प्रत्येक भारतवासी के लिए नित नई प्रेरणा व ऊर्जा का कार्य करती हैं। ऐसा ही एक श्रेष्ठ व प्रेरक जीवन रहा है विनायक दामोदर वीर सावरकर का। अपने महापुरुषों का स्मरण व सदैव उनके गुणों को आत्मसात करते हुए आगे बढ़ते रहना, यही भारत की श्रेष्ठ परंपरा है। ऐसे ही अकल्पनीय व अनुकरणीय जीवन को याद करने का दिन है सावरकर जयंती।

क्या मैं अब अपनी प्यारी मातृभूमि के पुन: दर्शन कर सकूंगा ? 4 जुलाई 1911 में अंदमान के सेलुलर जेल में पहुँचने से पहले सावरकर के मन की व्यथा शायद कुछ ऐसी ही रही होगी। अंदमान की उस काल कोठरी में सावरकर को न जाने कितनी ही शारीरिक यातनाएं सहनी पड़ी होगी, इसको शब्दों में बता पाना असंभव है। अनेक वर्षो तक रस्सी कूटने, कोल्हू में बैल की तरह जुत कर तेल निकालना, हाथों में हथकडिय़ां पहने हुए घंटों टंगे रहना, महीनों एकांत काल-कोठरी में रहना और भी न जाने किसी -किस प्रकार के असहनीय कष्ट झेलने पड़े होंगे सावरकर को। लेकिन ये शारीरिक कष्ट भी कभी उस अदम्य साहस के प्रयाय बन चुके विनायक सावरकर को प्रभावित न कर सके। कारावास में रहते हुए भी सावरकर सदा सक्रिय बने रहे। कभी वो राजबंदियों के विषय में निरंतर आंदोलन करते , कभी पत्र द्वारा अपने भाई को आंदोलन की प्रेरणा देते, कभी अपनी सजाएँ समाप्त कर स्वदेश लौटने वाले क्रांतिवीरों को अपनी कविताएं व संदेश कंठस्थ करवाते। इस प्रकार सावरकर सदैव अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर दिखाई दिए। उनकी अनेक कविताएं व लेख अंदमान की उन दीवारों को लांघ कर 600 मील की दूरी पार करके भारत पहुँचते रहे और समाचार पत्रों द्वारा जनता में देशभक्ति की अलख जगाते रहे।

स्वातंत्र्य विनायक दामोदर सावरकर केवल नाम नहीं, एक प्रेरणा पुंज है। जो आज भी देशभक्ति के पथ पर चलने वाले मतवालों के लिए जितने प्रासंगिक हैं उतने ही प्रेरणादायी भी. वीर सावरकर अदम्य साहस, इस मातृभूमि के प्रति निश्छल प्रेम करने वाले व स्वाधीनता के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर करने वाला अविस्मरणीय नाम है। इंग्लैंड में भारतीय स्वाधीनता हेतु अथक प्रवास, बंदी होने पर भी अथाह समुद्र में छलांग लगाने का अनोखा साहस, कोल्हू में बैल की भांति जोते जाने पर भी प्रसन्ता, देश के लिए परिवार की भी बाजी लगा देना, पल -प्रतिपल देश की स्वाधीनता का चिंतन व मनन, अपनी लेखनी के माध्यम से आमजन में देशभक्ति के प्राण का संचार करना, ऐसा अद्भुत व्यक्तित्व था विनायक सावरकर का। सावरकर ने अपने नजरबंदी समय में अंग्रेजी व मराठी अनेक मौलिक ग्रंथों की रचना की, जिसमें मैजिनी, 1857 स्वातंत्र्य समर, मेरी कारावास कहानी, हिंदुत्व आदि प्रमुख है।

वास्तव में अगर भारत को समझना है तो सावरकर को समझना होगा। क्योंकि वीर सावरकर ने भारत बोध व भाव को अपने जीवन में न केवल आत्मसात किया बल्कि उसे प्रतिपल जिया भी। सावरकर का जीवन आज भी युवाओं में प्रेरणा भर देता है। जिसे सुनकर प्रत्येक देशभक्त युवा के रोंगटे खड़े हो जाते है। विनायक की वाणी में प्रेरक ऊर्जा थी। उसमें दूसरों का जीवन बदलने की शक्ति थी। सावरकर से शिक्षा- दीक्षा पाकर अनेकों युवा व्यायामशाला जाने लगे, पुस्तकें पढऩे लगे. विनायक के विचारों से प्रभावित असंख्य युवाओं के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आ गया। जो भोग – विलासी थे, वे त्यागी बन गए। जो उदास तथा आलसी थे, वे उद्यमी हो गए। जो संकुचित और स्वार्थी थे, वो परोपकारी हो गए। जो केवल अपने परिवार में डूबे हुए थे, वे देश-धर्म के संबंध में विचार करने लगे। इस प्रकार हम कह सकते है कि युवाओं के लिए सावरकर वो पारस पत्थर थे, की जो भी उनके संपर्क में आया वो ही इस मातृभूमि की सेवा में लग गया। सावरकर स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए व उसके बाद भी उसकी रक्षा हेतु प्रयास करते रहे। इसलिए उनका नाम ‘स्वातंत्र्य सावरकरÓ अमर हुआ।

आज जब पूरा विश्व आशा भरी दृष्टि से भारत की ओर देख रहा है, ऐसे में हमारा दायित्व व भूमिका अधिक होने वाली है। अब 138 करोड़ भारतवासीयों को विश्वगुरु के उस उत्तरदायित्व को निभाना होगा। अपना आचार, विचार व व्यवहार उसी के अनुरुप करना होगा। ऐसा करते हुए कुछ राष्ट्रविरोधी ताकतों का भी सामना करना पड़ेगा, ऐसी भी तैयारी रहे। तो आईये, आज वीर सावरकर जयंती प्रसंग पर उस हुतात्मा से अभिभूत होकर, उनके जीवन मूल्यों को अपने आचरण द्वारा सत्य प्रमाणित करने का संकल्प करें। क्योंकि जब हम सबल होंगे, आचरण शील होंगे, तभी हमारे शांति संदेशों को कोई सुनेगा।
(लेखक जे. सी. बोस विश्वविद्यालय, फरीदाबाद के मीडिया विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर है)

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