गैस पीडि़तों के मददगार : अब्दुल जब्बार जिसने कभी ना मानी हार

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ब्रजेश राजपूत

राष्ट्रपति भवन में आठ नवंबर को वो लम्हा तमाम भोपाल वासियों के लिये बहुत गर्व का था जब महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविद के हाथों अब्दुल जब्बार की पत्नी सायरा जब्बार को पदमश्री की सनद दी गयी। मरणोपरांत दिया गया ये सम्मान भोपाल के उस नायक के लिये था जिसने ताउम्र अपनी जिंदगी भोपाल गैस पीडि़तों की भलाई में लगा दी, जिसने गैस कांड में गैस खाने वाले लाखों गैस पीडि़तों के लिये अच्छे सरकारी अस्पताल खुलवाने के लिये संघर्ष किया मगर जब वो बीमार पड़ा तो इस शहर का कोई अस्पताल कोई डॉक्टर कोई नेता उसे बचा ना सका और बासठ साल की उम्र में गैस पीडि़तों के जब्बार भाई विदा हो गये।

भोपाल में सैंतीस साल पहले जब गैस रिसी तो अब्दुल जब्बार देवास जिले में बोरिंग मशीन से लोगों के घर पानी पहुंचाने का काम करते थे। मगर गैस कांड के दूसरे ही दिन वो यहां आ गये और पीडि़त लोगों की मदद में जुट गये। उनकी मां पिताजी और भाई इस गैस कांड में अपनी जान गंवा चुके थे इसके बाद भी जब्बार अपना दर्द भुलाकर दूसरों की मदद करते रहे और व्यवस्था से लड़कर राह निकालते रहे।

गैस पीडि़तों के बीच में काम करते हुये उन्होंने देखा कि गैस कांड में सबसे ज्यादा पीडि़त यदि कोई पक्ष है तो वो महिलाएं हैं जिनके परिवार उजड़ गये। महिलाओं ने ना सिर्फ अपने पति बच्चों को खोया बल्कि वो जीने की आस भी खो बैठी थीं। जब एक दो साल बाद ही प्रदेश सरकार गैस पीडि़तों के लिये थोड़ा बहुत मुआवजा और फौरी तौर पर मदद बांट कर चुप हो गयी तो जब्बार ने 1987 में भोपाल गैस पीडि़त महिला उद्योग संगठन बनाया और गैस पीडि़त महिलाओं को हक दिलाने की लंबी लडाई लड़ी।

महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिये जब्बार ने उनसे ना सिर्फ छोटे छोटे काम करवाये बल्कि उनमें भरोसा जगाने के लिये हर शनिवार को भोपाल के यादगारे शाहजहांनी पार्क में साप्ताहिक बैठकें शुरू की। कई सालों तक बिना नागा चलने वाली इस मीटिंग में जब्बार भाई अपनी बहनों की सभी छोटी बड़ी समस्याएं सुनते थे और उनको आने वाले आंदोलन की बातें बताते और समझाते कि इससे उनको क्या हासिल होगा। गैस पीडि़तों की आवाज जब राज्य सरकार ने सुननी कम कर दी तो जब्बार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और लगातार याचिकायें लगाकर सरकार को मजबूर किया कि गैस पीडि़तों को जब पूरा मुआवजा मिले उससे पहले अंतरिम मुआवजा मिलना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट के कहने पर भोपाल के तकरीबन पांच लाख लोगों को हर महीने दो सौ रुपये की अंतरिम राहत अब्दुल जब्बार की याचिका पर मिली। इसके लिये जब्बार अपने संगठन की महिला साथियों के साथ ना सिर्फ दिल्ली गये बल्कि वहां पर भी कई दिनों तक आंदोलन कर दिल्ली के मीडिया से भोपाल के लोगों की दु:ख तकलीफ साझा की। फिर तो जब्बार ने जैसे रास्ता ही तय कर लिया। सुप्रीम कोर्ट में वो याचिकाएं लगाकर गैस पीडि़तों की मांगों का समाधान तलाशते रहे। लड़ाई लंबी रही मगर इसमें उनको सफलता मिली।

जब्बार ने न धीरज खोया और न ही हौसला। हां ये जरूर रहा कि इस सारे संघर्ष में वो अपनी सेहत गंवाते गये। डायबिटीज इतना बढ़ा कि धीरे-धीरे उनको आंखों से दिखना कम होने लगा। हृदय का रोग लगा बैठे। दो बार अटैक आया भी मगर बच गये। मगर इन हालात में भी उन्होंने अपने गैस पीडि़तों का साथ नहीं छोड़ा और न घर बैठे। अपनी छोटी सी पुरानी स्कूटर पर वो पूरे भोपाल में सफर करते रहे और गैस पीडि़तों के मसलों को मीडिया और सरकार की नजर में लाते रहे।
(लेखक- इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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