आधी दुनिया का पूरा हिस्सा..!

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  • महिलाएं अपने दम पर बराबर की हिस्सेदारी की ओर बढ़ रही हैं
  • जयराम शुक्ल, वरिष्ठ पत्रकार
    jairamshuklarewa@gmail.com

हम अतीतजीवी हैं। वर्तमान के हर बदलाव को विद्यरूप बताते हुए उस पर नाहक ही ल_ लेकर पिल पड़ते हैं। अक्सर सुनते हैं कि हमारा जमाना कितना अच्छा था। यहां तक कि लोग अंगे्रजों और राजशाही के जमाने के गुन गाने लगते हैं। आज जो भोग रहे हैं जब यह इतिहास हो जाएगा तो यही प्रिय लगने लगेगा। परंपरा और प्रगतिशीलता के बीच यही द्वंद्व चलता रहता है। जबकि ठहरा हुआ कदम परंपरा और आगे बढऩे के लिया उठा हुआ कदम ही प्रगतिशीलता है। उठा हुआ कदम ही आगे बढ़ाता है लेकिन उसे आगे बढऩे का बल उसी ठहरे हुए कदम से मिलता है। इसलिए समाज में प्रगतिशीलता और परंपरा दोनों जरूरी है।

इन दिनों देश में महिला विमर्श चल पड़ा है। गोंड़ रानी कमलापति के नाम से देश का पहला रेल्वे स्टेशन लोकार्पित हो चुका है जो कल तक हबीबगंज के नाम से जाना जाता था। प्राय: प्रत्येक दिन कोई न कोई पत्रकार मित्र कमलापति की वीरता के आद्योपांत किस्सा जानने के लिए संपर्क करता है। रानी दुर्गावती और लक्ष्मीबाई महिलाओं की आयकन हैं।

चुनावी लोकतंत्र की बात होती है तो मैं अपने सिंगरौली की सुमित्री देवी खैरवारिन और जमुना देवी के दृष्टान्त सामने रख देता हूं। सुमित्री जी ने 1952 में पहला विधानसभा चुनाव जीता तो डॉ. लोहिया इतने उत्साहित हुए कि उन्हें सोशलिस्ट पार्टी की ओर से राष्ट्रपति का उम्मीदवार घोषित कर दिया। जमुना देवी मामा बालेश्वर दयाल की खोज थीं। उनका सुदीर्घ संसदीय जीवन रहा। हर योग्यता के बाद भी वे मुख्यमंत्री नहीं बनने दी गईं।

मातृपूजक देश में महिलाओं की स्थिति मंत्रोच्चार की भांति है। न मंत्र बोलने वाला और न सुनने वाला कोई भी नहीं समझता पर हर पवित्र कर्मकांड में मंत्रोच्चार होता है। राजनीति और अन्य क्षेत्र में 33 प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित करने की पहल आजादी के बाद से ही हो रही है। संसद में इससे संबंधित बिल उस दिन रखा जाता जिस दिन सत्र का आखिरी दिन होता है।

सुषमा स्वराज इसकी बड़ी पैरोकार रही हैं। पैरोकार तो सोनिया गांधी भी रहीं जिनके नेतृत्व वाले यूपीए एक-दो में यह बिल रखा गया। पर इसका सबसे ज्यादा विरोध लालू-मुलायम-शरद जैसे लोहिया के वैचारिक वंशधरों ने ही किया। हाल ही प्रियंका गांधी ने घोषणा की कि कांग्रेस उत्तरप्रदेश के चुनाव में 40 प्रतिशत भागीदारी महिलाओं को देगी। विमर्श फिर चर्चा के केंद्र में है।

संसदीय संस्थाओं में महिला जनप्रतिनिधियों की भागीदारी लंका और बांग्लादेश से भी कम कोई 12-13 प्रतिशत है। लेकिन एक पक्ष यह भी है कि महिलाएं अपने दमपर बराबर की हिस्सेदारी की ओर बढ़ रही हैं। यह प्रक्रिया समाज के भीतर शुरू हुई है। वर्जनाएं और मान्यताएं टूट रही हैं। अभी यह शुरुआत है आगे-आगे देखिए कि कल यही समाज उन्हें पचास फीसदी की हिस्सेदारी देने को मजबूर होगा भले ही उसके पीछे चुनावी स्वार्थ हो।

रसातल में जा चुकी कांग्रेस का उत्तरप्रदेश में यह महिला कार्ड चला और पूर्व की स्थिति से दस प्रतिशत भी वह आगे बढ़ी तो अगले लोकसभा-विधानसभा में यही दांव चलने की मजबूरी भाजपा समेत अन्य दलों में होगी। फिलहाल हम समझने की कोशिश करते हैं कि पिछले पांच दशक में महिलाओं की समाजिक स्थिति ने किस कदर करवट लिया है। इसके आधार पर आप भविष्य का आंकलन करें तो आधी दुनिया की सशक्तिकरण की दिशा में सुखद संकेत देखने को मिलेंगे।

अब जैसे आज के जमाने के शादी ब्याह को ही लें। 360 डिग्री का बदलाव आ गया। बीस पचीस साल में सारा समाज रूपांतरित हो गया। हमारे जमाने में ग्रामीण मध्यवर्ग में बालविवाह का चलन था। जिसकी ग्यारवीं पास शादी हुई वह सयानी शादी मानी जाती थी। मैं जिस स्कूल में पढ़ता था, आठवीं तक में सभी लड़कियों की शादी हो चुकी होती थी लड़कों का प्रतिशत पचास फीसद रहता था।

मां-बाप को इसकी फिकर नहीं रहती थी कि आगे इनका क्या होगा.? और वह इसलिए भी कि आमतौर पर शादी ब्याह के फैसले मां-बाप नहीं, परिवार के सयाने और नात रिश्तेदार तय करते थे। संयुक्त परिवारों में तो मां-बाप की स्थिति मूक दर्शक से ज्यादा कुछ नहीं रहती थी। शादी ब्याह संयुक्त परिवार के सहकार हुआ करते थे। और यह सब पुरखों की परंपरा की दुहाई के नाम होता था। बाल विवाह के सीधे परिणाम भी हमने देखें हैं। कई मेधावी बच्चे जिन्हें कलेक्टर होना चाहिए था, मास्टर बनकर ही रह गए।

संयुक्त परिवार जब टूटने लगे तो बड़ी बहस हुई कि अब समाज का क्या होगा। लेकिन समाज तो अपने हिसाब से आगे बढ़ता है। परिवार छोटी छोटी इकाईयों में विघटित हो गए। एक ओर संयुक्त परिवार का सहकार घटा तो दूसरी ओर छोटे परिवारों की आर्थिक तरक्की ने रफ्तार पकड़ी। परिवार के भीतर ही आगे बढऩे की स्पर्धा बढ़ी। अस्सी से नब्बे का दशक इसी संक्रमण काल से गुजरा। यह लड़कियों, महिलाओं के पुनर्जागरण काल था। एक वो दौर था जब घर की महिलाओं का दायरा चूल्हाचक्की तक सीमित था और लड़कियां के पास कंडा थापने और ससुराल जाने के पूर्व का प्रशिक्षण लेने के अलावा कोई दूसरा काम नहीं।

वक्त ने अंगड़ाई ली आज के शादी ब्याह के बरक्स हम देख सकते हैं कि आधी दुनिया तीस साल के भीतर कहां से चलकर कहां पहुंच गई। तीस- चालीस साल पहले आज के बारातों के दृश्य की कल्पना तक नहीं की जा सकती। सामान्य से सामान्य परिवार की बारातों में आधे से ज्यादा महिलाएं होती हैं, साफा बांधे डीजे की धुन पर नाचते हुए। इनमें दूल्हे की दादी भी नर्तक मंडली को लीड करते हुए मिले तो ताज्जुब मत मानिए। रूढिय़ों, वर्जनाओं को तोड़कर आया ये बदलाव आधी दुनिया को बराबरी के पटल पर लाकर खड़ा कर दिया। इस प्रगतिशीलता का ताली बजाकर स्वागत होना चाहिए। जो लोग इस बदलाव को लेकर नाक भौं सिकोड़ते हैं उन्हें मैं वैसे ही मानता हूं जैसे तांगे का रिटायर्ड घोड़ा अस्तबल के खूंटे में बधा अपने जमाने की जुगाली कर रहा हो।

कल तक जो लोग बेटी के ब्याह को लेकर परेशान रहा करते थे वे अब बेटे की शादी को लेकर चिंतातुर हैं। बेटा परिवार की नाक का सवाल व श्रेष्ठता की गारंटी नहीं रहा। एक मित्र पिछले दो साल से बेटे की शादी को लेकर परेशान हैं। वे अधिकारी हैं,शहर में पक्का मकान है,चढऩे के लिए गाड़ी है फिर भी सीजन पर सीजन बीतते जा रहे हैं शादी वाले आ ही नहीं रहे। बेटा पैतीस साल का हो चला। पहले कभी बाप के रसूख के आधार पर निकम्मे बेटों की भी शादी हो जाया करती थी। गांवों में कहा मवेशी बांधने के खूंटे की गिनती से ही अंदाज लगा लेते थे कि यह कितना बड़ा काश्तकार है। अब स्थिति पलट गई।

बाप बलट्टर हो या इलाकेदार, पहला और आखिरी सवाल होता है कि और तो सब ठीक है बताएं बेटा क्या करता है। बेटी का बाप घर की शान शौकत से प्रभावित होकर मन भी बनाया तो कोई गारंटी नहीं कि बेटी मान ही जाएगी। यह एक बड़ा बदलाव आया है। मध्यवर्ग की लड़कियों ने अब आंखें खोलकर अपना भविष्य चुनना शुरू किया हैं। शादी व ब्याह के सीजन में प्राय: हर कोनों से ये खबरें अक्सर आने लगी हैं कि वधु ने एनवक्त पर वर को रिजेक्ट कर दिया। बेटियों की जासूस नजरें अब भविष्य में होने वाले पति के क्रियाकलापों, करतूतों पर होती है। यह जेंडर रेशियों के घट बढ़ का भी परिणाम है।

जिन क्षेत्रों में ये फासला बढ़ा है वहां लड़कों की शादी में मुश्किलें आने लगी हैं। देश के कई हिस्से तो ऐसे भी हैं कि लड़के वालों को रिश्ता लेकर जाना पड़ रहा है। देखते जाइए अब ये दायरा और बढ़ेगा। दहेज धीरे-धीरे अप्रसांगिक होता जाएगा। पिता के मन में ये भाव जाग्रत होने लगे कि आखिर घर में बेटी का भी हिस्सा है। यह मानकर अब लेनदेन होने लगा है। भविष्य में ये समझ और बढ़ेगी। जैसे पहले दूल्हों की घोड़ामंड़ी सजती थी,फिर बोली लगती थी वे दिन अब लद गए। मूंछों का ताव अब पगड़ी के सामने नहीं चलेगा। समाज रूढिय़ों की बेड़ी तोड़कर परंपराओं की जमीन पर सिर्फ आकर खड़ा ही नहीं हुआ है, उसकी प्रगतिशीलता के कदम तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। इस बदलाव के स्वागत में सबको शामिल होना चाहिए।

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