Home लेख गुरु मंत्र: ‘— Ó(डैश), कभी सोचा है इसके बारे में?

गुरु मंत्र: ‘— Ó(डैश), कभी सोचा है इसके बारे में?

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  • नागेश्वर सोनकेशरी

यह — (डैश) जो है , जिसे हम सिर्फ एक लकीर मात्र समझ रहे हैं, दरअसल इसी में हमारी पूरी जिन्दगी की गाथा लिखी होती है। यह हर किसी की फोटो में मरणोपरांत जन्मतिथि व मरणतिथि के बीच में लगता है। यह छोटा सा डैश आपकी पूरी जीवन यात्रा को इंगित करता है। लोग फिर वही फोटो देखकर बातें करते हैं कि भाईसाहब के जन्म के समय कुछ भी नहीं था। इन्होंने बड़ी मेहनत की, बड़ी गरीबी में पढ़ाई-लिखाई करके अपने छोटे भाई बहनों को बड़े जतन से पाल पोसकर बड़ा किया।

सबकी शादी-विवाह धूमधाम से किया व हमारे सामने ही हमने इन्हें बड़ा होते और यह सब करते देखा है व देखो भाईसाहब अब इस दुनिया में नहीं हैं। जीते जी इन्होंने सभी जरूरतमंदों की जो भी बन सके वह सेवा की। कोई भी इनके दरवाजे से ख़ाली हाथ नहीं जाता था। यही शिक्षा इन्होंने अपने दोनों बच्चों में भी दी है। ख़ैर यह तो एक ऐसी बात है जो अक्सर मरने के बाद लोग करते हैं । हमारे भारतवर्ष में वैसे भी मरे हुए आदमी की निंदा नहीं की जाती, जब तक कि वह हद दर्जे का घटिया ना हो। और बातें तो बातें हैं,और वो तो होनी ही है इसमें बहुत ध्यान देने वाली बात नहीं है । ध्यान देने वाली बात यह है कि जीते जी हम क्या कर रहें हैं ?

क्या हम समझदारी भरा जीवन जी रहें हैं? क्या उसमें थोड़ा बहुत ही सही परमार्थ का पुट है या नहीं ? या बस धन, संपत्ति इक_ा करने में ही पूरी साँसें खत्म कर रहें हैं, यह जरूर विचारणीय बात है ।और हमें अपनी जीवन यात्रा में इस बारें में सोचना चाहिए ।मैंने पहले भी कहा है खुशहाल जीवन के लिए अधिक धन व अधिक सुख की कदापि आवश्यकता नहीं है। वैसे भी आप जब अधिक धन या अधिक सुख के पीछे भागते हैं तो फिर अपने सार्थक जीवन से दूर होते चले जातें हैं व एक दिन आपकी जिन्दगी उसी डैश के बीच समा जाती है व कोई और ही उस अधिक भाग-दौड़ का मजा उठाता है। और तो और मजा उठाने वाले तेरहवीं के बाद उसी डैश लगी तस्वीर पर माला पहनाने की जेहमत भी नहीं उठाते । इसलिए मैं हमेशा आप सभी को अर्थपूर्ण जीवन जीने के बारे में चेताता रहता हूँ ।

अर्थहीन जीवन व्यर्थ है, और अर्थपूर्ण जीवन परमार्थ है । अर्थपूर्ण जीवन के लिए अपने कैरियर में सैट होने के बाद अपनी अंदर की आवाज को सुनना, जिससे आप पायी हुई उपलब्धियों का पूरा आनंद ऊठा सकें व वैसा ही काम करना ,थोड़ा लिखना-पढना, फिर चिन्तन कर उसे अमल में लाना ,थोड़ा घूमना-फिरना, हल्की-फुल्की मौज-मस्ती नहीं तो जीवन नीरस ना हो जाए यह ख़तरा बना रहता है ।

अपने पारिवारिक दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन, अपने आसपास के जरूरतमंद लोगों की मदद, अच्छे दोस्तों का साथ, नियमित व्यायाम अर्थात् अपनी सेहत का ध्यान रखना , आदि बहुत कुछ शामिल है। आपके जीवन में जीने का एक पवित्र उद्देश्य होना भी जरूरी है। ऐसा न हो कि पैदा हुए और वैसे ही मर गए तो दुनिया में आने का औचित्य ही क्या रहा ? हमें जीवन हमेशा ऐसा जीना चाहिए कि हमारी जीवन यात्रा उस तस्वीर के डैश में समा न पाए । हमारे बारे में जीते जी बहुत शानदार कहानियाँ हों और मरने के बाद हमारी जीवनियाँ प्रकाशित हों , व लोग उन जीवनियों से प्रेरणा ले सकें।

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