बाघों के बाद मप्र को चीता राज्य बनाने का स्तुत्य प्रयास

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  • डॉ मयंक चतुर्वेदी
    सरकार ने मध्यप्रदेश को बड़े जंगली जानवर की विश्व की पहली अंतरमहाद्वीपीय स्थानांतरण परियोजना के लिए चुना और देश से विलुप्त हो चुके चीतों को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा भारत के हृदय प्रदेश में बसाहट कार्य को पूर्णता प्रदान की गई। निश्चित ही प्रदेशवासियों को इस बात के लिए गौरव होगा कि कूनो राष्ट्रीय उद्यान को इस कार्य के लिए चिह्नित किया गया। किंतु सच पूछिए तो इस पूरी योजना को अन्य राज्यों के बीच से मध्यप्रदेश लाने के लिए जितना प्रयास राज्य सरकार के अधिकारियों एवं स्वयं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा किया गया है, उसके लिए उनको धन्यवाद दिया जाना चाहिएा। वस्तुत: राजनीतिक जीवन में कार्य करते हुए कई बार कुछ काम ऐसे भी हो जाते हैं, जोकि न केवल वर्तमान समय में बल्कि भविष्य के लिए भी एक दिशा तय कर देते हैं। इस दृष्टिकोण से भी देखें तो चीतों की बसाहट वाला प्रदेश बनाने के लिए किए यह प्रयास आनेवाली पीढ़ियों के लिए निश्चित ही उदाहरण प्रस्तुत करेगा कि कैसे अपने राज्य को हर स्थिति में समृद्ध बनाए जाने और रखने के लिए योजनाओं को बनाने के साथ उसकी सफलता के लिए पूर्ण मनोयोग से लगा जाता है। अब मध्यप्रदेश का चीता स्टेट बनना कई मायनों में अहम है।
    कहना होगा कि देश के दिल मध्यप्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में चीतों को 70 वर्ष के लम्बे अंतराल के बाद पुन: बसाने का कार्य हुआ है। इससे पहले की स्थिति को देखें तो भारत में वर्ष 1952 में इस प्राणी को विलुप्त घोषित कर दिया गया था। तब से देश में कोई चीता दिखाई नहीं दिया, किंतु भारत सरकार के अथक प्रयासों से ‘चीता’ वर्ष 2022 में पुन: पुनर्स्थापित किया जा सका है। वस्तुत: इससे जुड़े तथ्यों को देखें तो भारत में चीतों के विलुप्त होने के बाद तत्कालीन केंद्र सरकार 1972 में वाइल्डलाइफ (प्रोटेक्शन) एक्ट लेकर आई थी, जिसमें कि किसी भी जंगली जानवर के शिकार को प्रतिबंधित कर दिया गया। साल 2009 में राजस्थान के गजनेर में वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूटीआई) की ओर से एक वर्कशॉप का आयोजन किया गया और इसी में सर्वप्रथम यह विषय आया कि कैसे पुन: भारत में चीतों की बसाहट संभव हो सकती है। बैठक में देश भर की कुछ जगहों को चिन्हित किया गया, राज्यों के स्तर पर पाया गया कि गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ का वातावरण चीतों के लिए सबसे अधिक उपयुक्त है । इसके पीछे वन्यजीव वैज्ञानिकों का चीतों को लेकर किया गया जेनेटिक अध्ययन भी था जिसमें बताया गया कि कहां पर रखने से वे तेजी के साथ अपने कुनबे को भारत में बढ़ाने में सफल रहेंगे। किंतु आगे 10 वर्षों तक इस कार्य में कोई सफलता नहीं मिल सकी थी, फिर जब 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी को इसकी मंजूरी दी, तब जाकर प्रयोग के लिए अफ्रीकन चीते को भारत के जंगलों में लाए जाने को लेकर सार्वजनिक सहमति बन सकी। प्राय: देखा यही गया है कि तेंदुए और चीते में भेद करना मुश्किल होता है। भारत में तेंदुए तो पर्याप्त हैं लेकिन एक बार चीते जंगलों से गायब हुए तो पुन: कहीं भी वन्य विभाग को दिखाई नहीं दिए थे। किंतु जब प्रधानमंत्री मोदी और प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के विचार इस संदर्भ में मिले तो चीते कई हजार किलोमीटर सुदूर अफ्रीका के नामीबिया से चलकर भारत में प्रकट हो गए हैं। बड़े मांसाहारी वन्यप्राणी की शिफ्टिंग की यह दुनिया की पहली परियोजना है। जिन चीतों को पार्क में छोड़ा गया है, उन्हें लाने के लिए भारत और नामीबिया सरकार के बीच 20 जुलाई 2022 को एग्रीमेंट हुआ था। वस्तुत: बात सिर्फ चीतों को मध्य प्रदेश में बसाने की नहीं है। यह इससे भी आगे उस विश्वास की है, जिस पर स्वयं प्रधानमंत्री मोदी भरोसा करते हैं। उन्हें विश्वास है कि कभी विलुप्त प्राय: हो चुके बाघों की तरह ही मध्य प्रदेश में चीतों का इतना ध्यान रखा जाएगा कि वह भी आनेवाले समय में बाघों की सघन संख्या के बराबर आ जाएंगे या उनसे कुछ अधिक हो जाएंगे।
    यह गर्व की बात है कि देश में सबसे ज्यादा बाघ मध्यप्रदेश में है और मध्य प्रदेश को बाघ प्रदेश का दर्जा मिला हुआ है। मध्य प्रदेश में देश में सबसे अधिक संख्या में 526 बाघ हैं। इसके बाद कर्नाटक में 524 बाघ और उत्तराखंड 442 बाघ के साथ तीसरे नंबर पर है। यहां याद आता है वह घोषणा पत्र, जो दुनिया के तमाम देशों के बीच न केवल पढ़ा गया था, बल्कि उसका पालन पूरी दुनिया के देशों को करना था, किंतु कभी ऐसा हुआ नहीं। प्रत्येक वर्ष विश्व बाघ दिवस 29 जुलाई को मनाए जाने का निर्णय वर्ष 2010 में सेंट पीटर्सबर्ग बाघ सम्मेलन में किया गया था। इस सम्मेलन में बाघ की आबादी वाले 13 देशों ने वादा किया था कि वर्ष 2022 तक वे बाघों की आबादी दोगुनी कर देंगे। किंतु भारत को छोड़कर कोई देश अपने लक्ष्य को हासिल करते हुए नहीं दिखा है। राज्य के स्तर पर बात की जाए तो मध्यप्रदेश बाघों के प्रबंधन में इस लक्ष्य को प्राप्त करने में उत्तरोत्तर हुए सुधारों के कारण से बहुत सफल रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की संवेदनशील पहल के परिणामस्वरूप बाघों की संख्या में वृद्धि के लिये निरंतर प्रयास किए गए हैं । यही कारण है कि आज विश्व वन्य-प्राणी निधि एवं ग्लोबल टाईगर फोरम द्वारा प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार विश्व में आधे से ज्यादा बाघ भारत में रहते हैं।

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