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कर्ज देकर फांसने की चीनी नीति का वैश्विक विरोध

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दुनिया के कई देशों को कर्ज देकर उनके उपक्रमों पर कब्जा कर रहा है चीन

चीन के कर्ज देने और गुलाम बनाने की नीति अर्थव्यवस्था में काफी जानी-पहचानी है। पाकिस्तान, श्रीलंका और मालदीव चीन के बड़े कर्जदार हैं। लाओस में 6 बिलियन डॉलर की लागत से रेल कॉरिडोर पर काम हो रहा है जिसका 70 प्रतिशत हिस्सा चीन का है। लाओस का विदेशी मुद्रा भंडार एक बिलियन डॉलर से भी नीचे पहुंच जाने से मूडीज को उसे एक जंक स्टेट घोषित करना पड़ा। इसी प्रकार चीन बलूचिस्तान के ग्वादर पोर्ट पर 62 अरब डॉलर ख़र्च कर पाकिस्तान को कर्ज के जाल में फंसा चुका है। वर्ष 2022 तक 6.7 अरब डॉलर का कर्ज पाकिस्तान को चुकाने है। परन्तु पाकिस्तान में कर्ज चुकाने के लिये कर्ज लेने की स्थिति बनी हुई है।

  • डॉ. नवीन कुमार मिश्र

अपनी बढ़ती आर्थिक व सैन्य शक्ति का निरन्तर दुरुपयोग करते हुये बदलती वैश्विक व्यवस्था में उत्तरोत्तर मुखर व आक्रामक होता चीन अपना प्रभुत्व बनाना चाहता है। विश्व में ‘डेट-ट्रैप’ (ऋण देकर जाल में फांसना) की साजिश के तहत आधारभूत ढांचा के विकास के नाम पर दूसरे देशों को कर्ज देना और कर्ज न चुका पाने की स्थिति में उनके संसाधनों पर कब्जा करना शुरू कर देता है। चीन के कर्ज देने और गुलाम बनाने की नीति अर्थव्यवस्था में काफी जानी-पहचानी है। पाकिस्तान, श्रीलंका और मालदीव चीन के बड़े कर्जदार हैं।

लाओस में 6 बिलियन डॉलर की लागत से रेल कॉरिडोर पर काम हो रहा है जिसका 70 प्रतिशत हिस्सा चीन का है। लाओस का विदेशी मुद्रा भंडार एक बिलियन डॉलर से भी नीचे पहुंच जाने से मूडीज को उसे एक जंक स्टेट घोषित करना पड़ा। इसी प्रकार चीन बलूचिस्तान के ग्वादर पोर्ट पर 62 अरब डॉलर खर्च कर पाकिस्तान को कर्ज के जाल में फंसा चुका है। वर्ष 2022 तक 6.7 अरब डॉलर का कर्ज पाकिस्तान को चुकाने है। परन्तु पाकिस्तान में कर्ज चुकाने के लिये कर्ज लेने की स्थिति बनी हुई है। चीन के डेढ़ बिलियन डॉलर कर्ज के बदले श्रीलंका को हंबनटोटा बंदरगाह सौपना पड़ा और हाल में ही कोलम्बो बन्दरगाह भी चीन को दे चुका है। नेपाल की आर्थिक और कूटनीतिक समस्याओं में भी चीन घुसने लगा है।

चीन ने 2017 में एक अरब डॉलर का फंड तथा बेल्ट एण्ड रोड के तहत 30 अरब डॉलर का निवेश करने से मंगोलिया के लिये इस कजऱ् से बाहर निकलना आसान नहीं होगा। विश्व बैंक के अनुसार वर्ष 2018 में ही यहां के लोगों पर कर्ज उसकी जीडीपी का 83 प्रतिशत पहुंच गया है। बन्दरगाह विकसित करने और ट्रांसपोर्ट नेटवर्क को बढ़ाने के लिये मोन्टेनेग्रो भी चीनी कर्ज के जाल में फंस गया है। वर्ष 2018 में ही कर्ज जीडीपी का 83 प्रतिशत था। तजाकिस्तान कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है जिसमें कुल विदेशी कर्ज में चीन का हिस्सा 80 प्रतिशत है। किर्गिस्तान में वर्ष 2016 में चीन ने 1.5 अरब डॉलर निवेश किया था। कुल विदेशी कजऱ् में चीन का 40 प्रतिशत हिस्सा है।

इसी प्रकार आधारभूत ढांचा विकसित करने के नाम पर टोंगा, कॉन्गो, कम्बोडिया, बांग्लादेश, नाइजर और जांबिया जैसे देशों को चीन ने उनकी जीडीपी से 20 प्रतिशत से अधिक कर्ज दिया है। जिबूती में चीन का 10 बिलियन डॉलर का निवेश है और कर्ज के जाल में फंसाकर डोरलेह पोर्ट को हंबनटोटा की तरह अपने कब्जे में ले चुका है। जिबूती का कर्ज उसकी जीडीपी का 85 प्रतिशत है। अफ्रीका में अपनी पैठ व ऊर्जा संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिये चीन ने कोयला व जिम्बाबे के प्राकृतिक संसाधनों का जमकर दोहन करने से जंगल, जानवर और जमीन को भारी नुकसान पहुंचा है।

अफगानिस्तान में कुछ वर्षों से चीन की दिलचस्पी अपने बेल्ट एंड रोड को लेकर बढ़ी है। भारत की तरह चीन ने भी सड़क, रेल, और बुनियानी सुविधाओं के विकास में बड़ा निवेश किया है। अमेरिका के हटने के बाद चीन अफगानिस्तान में अपने प्रभाव बढ़ाने का प्रयास में है और पाकिस्तान के जरिये तालिबान से जुडऩे की कोशिश कर रहा है। चीन के न्यू सिल्क रोड परियोजना में यूरोप के 20 से अधिक देश शामिल हैं। इसमें रूस भी शामिल है।

ग्रीस में चीन ने पिराएस बंदरगाह को बढ़ाने का खर्च उठाया है। वहीं चीन सर्बिया, बोस्निया-हर्जेगोविना और नॉर्थ मैसेडोनिया में सड़क और रेल निर्माण पर निवेश कर रहा है, जो डेट-ट्रैप का ही हिस्सा है। बेहिसाब कर्ज से आत्मनिर्भरता तो खत्म होती ही है, साथ में संप्रभुता पर भी खतरे में पड़ जाती है।

चीन की डेट-ट्रैप साजिश को दुनिया समझने लगी है कि चीन कोई भलाई का काम नहीं कर रहा है बल्कि उसके विस्तारवादी नीति का हिस्सा है। इसलिये अब उसका विरोध भी शुरू हो चुका है। मध्य और पूर्वी यूरोपीय देशों के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने के लिये वर्ष 2012 में बनाया गया सीईईसी फोरम, जिसमें यूरोप के 17 देश शामिल हैं और 18वां देश खुद चीन है, से 28 लाख की जनसंख्या वाला देश लिथुआनिया ने इसे विभाजनकारी बताकर छोड़ दिया है तथा यूरोप के बाकी देशों को भी छोडऩे के लिये भी कहा।

इसी प्रकार बुडापेस्ट में 1.8 अरब डॉलर की निवेश वाली शंघाई की फुडान यूनिवर्सिटी का ब्रांच, जो 27 देशों के यूरोपीय संघ में ये पहला चाइनीज़ यूनिवर्सिटी कैंपस होना है, के खोलने व वामपंथी विचारधारा के प्रसार के विरोध में हजारों लोगों ने विरोध प्रदर्शन करते हुए संसद का घेराव किया और जिनपिंग मुर्दाबाद के नारे लगाये। उनका मनाना है कि हंगरी कर्जदार बना चुका है जिसे चीन धीरे धीरे कंगाली की राह पर ले जायेगा और फिर हड़पनीति में कामयाब हो जायेगा। बुडापेस्ट के मेयर ने वामपंथी चीन के अमानवीय तथ्यों को उजागर करते हुये सड़कों का नामकरण फ्री हाँगकाँग, हंगरी किया है।

सभी अफ्रीकी देश चीन के पैसे और उसके निवेशों के फायदे और नुकसान का बारीकी से आंकलन कर रहे हैं तथा चीन के साथ सभी आर्थिक संबंधों को पूरी तरह से खत्म करने के पक्ष में है। तंजानिया ने चीनी निवेश की पड़ताल कर 10 बिलियन डॉलर के चीनी कर्ज के समझौते को रद्द कर दिया। इसी प्रकार मलेशिया ने चीनी कर्ज के मकडज़ाल से बचाव में 23 अरब डॉलर की परियोजना को रद्द कर दिया। म्यांमार भी श्रीलंका की स्थिति को देखते हुये चीनी परियोजना को छोटा करने की योजना में है। चीन अपने सैन्य शक्ति के बल पर ताइवान को अपने कब्जे में करने को बेचैन दिखाई देता है, परन्तु चीन की वन चाइना पॉलिसी को विस्तारवादी नीति का हिस्सा मानते हुये जापान ने ताइवान को चीनी नक्शे से अलग कर दिखाया है, जिसे लेकर चीन जापान पर परमाणु हमले की धमकी तक भी दी है।

ताइवान द्वारा यूरोप के देश लिथुआनिया में दूतावास खोलने की अनुमति मिलने पर चीन परेशान है। चीन के विस्तारवादी नीति व कर्ज के जाल से मुक्ति खिलाफ विश्व के देश मुखर हो रहे हंै। यही चीनी साम्राज्यवाद के मुकाबले का सही वक्त है। इसमें भारत की भूमिका महत्वपूर्ण है, जो कभी विस्तारवादी नहीं रहा न ही किसी देश की संप्रभुता को चोट पहुंचाया है। राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच द्वारा बनाया गया 54 देशों का संगठन हर्ष (हिमालय-हिन्द महासागर राष्ट्र समूह) जो सांस्कृतिक रूप से एक व व्यापारिक दृष्टि से प्राकृतिक है, को मजबूत करने से चीनी साम्राज्यवाद पर प्रहार होगा। अपनी सैन्य शक्ति से धौंस जमाकर सागरीय क्षेत्रों के अतिक्रमण को रोकने व नियम आधारित व्यवस्था के लिये क्वाड की सक्रियता से चीनी विस्तारवाद पर अंकुश भी लगेगा।
(लेखक भू-राजनीति के जानकार हैं)

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