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कोरोना काल में भारतीय योग का वैश्विक उत्सव

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  • डॉ. विशेष गुप्ता

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा 2015 में शुरु किये गये 21 जून के योग दिवस को संपूर्ण विश्व इस कोरोना काल में भी सातवे बड़े उत्सव के रुप में मना रहा है। जैसी खबरें आ रहीं हैं उससे पता लगता है कि पूरी दुनिया इस बार कोरोना संक्रमण को पूरी तरह मात देने के लिए भी इस दिवस को जाति,रंग, धर्म,वर्ग व सम्प्रदाय का भेद किये बिना पूरी जीवंतता,सक्रियता और समर्पण के साथ अपनी सहभागिता प्रगट करने को आतुर है। भारत में भी यह दिवस सियाचिन से समुद्र तक तथा कश्मीर से कन्याकुमारी तक बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि 21 जून को अतंरराष्ट्रीय योग दिवस की वैश्विक अभिव्यक्ति अनायास ही नहीं है।

दरअसल यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 177 देशों की स्वीकृति के बाद ही इसे अतंरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया गया था। निश्चित तौर पर हमारे लिए यह आत्म गौरव और सम्मान का विषय है कि आज हमारे पूर्वजों के योग दर्शन और इसकी चितंन परम्परा को पूरी दुनिया स्वीकार कर रही है। इस अवसर पर हमारा भी यह पावन कर्तव्य बनता है कि हम भी अपनी बसुधैब कुटुंभक्म की अवधारणा को पुन: जीवंत करते हुए तथा इस योग दिवस पर प्रचारित होने वाले सूक्ति वाक्य ‘सर्वे भवन्तु सुखि:न,सर्वे सन्तु निरामया’ के प्रकाश पुंज को लेकर स्वंय के साथ देश और विश्व को भी आलोकित करें।

गौरतलब है कि साधारण अर्थो में योग का अर्थ जुडऩे और जोडऩे से लिया जाता है। दरअसल यह वह क्रिया है जो स्वंय के क्रिया करने से स्वंय को ही परिणाम भी देती हैे। कहना न होगा कि योगाभ्यास दरअसल वह क्रिया है जो शरीर को गति व शक्ति प्रदान करती हेै। यौगिक क्रियाओं से हमें खुद को लयात्मक बनाने और स्वंय से आत्म साक्षात्कार करने का अवसर मिलता है। इसके साथ ही इसके माध्यम से हम अपनी चेतना का विस्तार करते हुए अपनी सॉसों से अपने खुद के प्राणों को आयाम प्रदान करते हैं।

सच यह है कि दुनिया की इस भीड़ और खासतौर पर कोरोना के इस कालखण्ड़ ने हमे खुद कों बहुत अकेला कर दिया है। देखने में आ रहा है कि जीवन का यह अकेलापन हमें हमसे ही बहुत दूर ले जा रहा है। यही बजह है कि हम बाहरी लौकिक दुनिया के साथ अपने आप से भी कटे-कटे से रहने लगे हैं। शायद इन्हीं बजहो से हम लगातार रक्तचाप, निराशा, चिन्ता, अवसाद और मधुमेह जैसे रोगों से घिरते जा रहे हैं। कहना न होगा कि इस कोरोना काल ने हमें योग के जरिये अपने होने के अहसास और खुद से साक्षात्कार करने के लिए एक स्पेस प्रदान किया है। आज का सच यह है कि भारत की श्वांस पद्धति और शारीरिक व्यायाम तकनीक की उपयोगिता दुनियाभर में स्वीकार की जा रही है। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र के साथ ही साथ पूरी दुनिया इस समय भारतीय योग की मुक्त कंठ से प्रशंसा कर रही है।

हम सभी इस सच से अच्छी तरह परिचित हैं कि भारत का योग दर्शन तकरीबन ढ़ाई हजार साल पुराना है। योग का इतिहास बताता है कि इसकी उत्पत्ति सांख्य परम्परा से हुई तथा ऋषि पतंजलि ने इसे सूत्रबद्ध किया। तत्पश्चात यह अनेक आस्तिक,नास्तिक व तांत्रिक परम्पराओं का हिस्सा बना रहा। अद्वैत दर्शन ने तो इसे आध्यात्मिक प्रगति के मार्ग के रुप में इसका अनुकरण किया। आज सामान्यजन जिसे योग कहते हैं वह योग दर्शन के आठ पायदानों (यम, नियम, आसन, प्राणयाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारण व समाधि) में एक योगासन है। यहॉ योग दर्शन साफ करता है कि चित्त पर अधिकार पाने के लिए तथा शरीर और उसको संचालित करने वाली इंद्रियों को वश में करने का जो प्रयत्न है वही आसन और प्राणायाम है। पतंजलि ने आसन को ‘स्थिर सुमासनम’ की संज्ञा दी है।

उनका कहना है कि जिस मुद्रा में बिना कष्ट के देर तक बैठा जा सके वही आसन श्रेष्ठ है। पतंजलि ने अपने अष्टांग योग की व्याख्या को दो रुपों में बॉटा है। पहला व्यक्ति के स्तर पर और दूसरा राष्ट्र के स्तर पर। उनका साफ कहना है कि आसन व प्राणयाम व्यक्ति के शरीर व मन को स्वस्थ बनाते हैं। दूसरी ओर यम व नियम नैतिक चरित्र को ऊॅचा उठाते हैेें । पतंजलि योग सूत्र में यम के जिन पॉच नैतिक आदर्शों को स्वीकारोक्ति मिली है वे अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह हैं। यहॉ आपको यह याद दिलाना भी जरुरी है कि महात्मा गॉधी ने योगदर्शन के इन्हीं पॉच आदर्शों का अनुकरण करते हुए स्वतत्रंता की लड़ाई लड़ीं। साथ ही उन्होंने योग दर्शन के इसी मॉडल को फिरंगियों के सामने रखकर उसकी प्रासंगिकता भी सिद्ध की।

(लेखक : अध्यक्ष, उ.प्र. राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग)

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