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भारत में मंडराता ग्लेशियरों की बाढ़ का खतरा

  • ऋषभ मिश्रा
    इस धरती पर पानी की कोई कमी नहीं है। पृथ्वी को अगर तीन हिस्सों में बांट दिया जाए तो एक हिस्से पर जमीन है और दो हिस्से पर पानी। लेकिन इस पानी में से 97.5 प्रतिशत पानी पीने लायक नहीं है। ये समुंदर में मौजूद खारा पानी है। पृथ्वी पर जितना भी पानी है उसमें से सिर्फ 2.5 प्रतिशत पानी ही पीने लायक है जिसे हम ‘फ्रेश वाटर’ या ‘मीठा पानी’ कहते हैं। इस मीठे पानी का भी सिर्फ एक तिहाई हिस्सा हमारे पास है। इसका 70 फ़ीसदी हिस्सा धरती पर ‘ग्लेशियर’ (हिमनद) के रूप में और बर्फ की चोटियों में मौजूद है।
    ग्लेशियर करोड़ों साल से इस पृथ्वी पर मौजूद हैं और हमारी इस दुनिया को आकार देते आए हैं। ऑस्ट्रेलिया को छोड़कर बाकी सभी महाद्वीपों में ग्लेशियर मौजूद हैं। जब बर्फ की चादर फैलती है तो वो सब कुछ अपने आगोश में ले लेती है, घाटी को, मैदानों को, और पूरे-पूरे पर्वतों को भी। ग्लेशियर लाखों साल की अवधि में तैयार होते हैं। जब बर्फ गिरती है और उसके पिघलने से पहले उस पर और बर्फ गिर जाती है तो एक के ऊपर एक बर्फ की परतें जमा हो जाती हैं और वो एक ठोस रूप ले लेती है। लेकिन इंसानों की वजह से हो रहे जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया भर में ग्लेशियर पिघल रहे हैं। दुनिया के कई इलाक़ों में जहां दस साल पहले बर्फ की मोटी चादर थी अब वहां सिर्फ चंद निशानियां बची हैं। ‘परावर्तन’ करने वाली बहुत सी जगहें खत्म हो गई हैं। आमतौर पर बर्फ की चमकदार सतह सूरज की किरणों को वापस वायुमंडल में परावर्तित कर देती है। लेकिन अब पृथ्वी सूरज की ज्यादा ऊर्जा को सोख रही है जिससे धरती गर्म हो रही है। जब ये ऊर्जा बाहर आती है तब वायुमंडल का तापमान बढ़ता है और इससे ही ‘ग्रीन हाउस इफ़ेक्ट’ भी बढ़ता है। हाल ही में ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ नाम के जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया है कि ग्लेशियर झीलों से आने वाली बाढ़ की वजह से भारत समेत दुनिया के डेढ़ करोड़ लोगों के जीवन पर खतरा मंडरा रहा है। ब्रिटेन के ‘न्यू कैसल विश्वविद्यालय’ में किए गए शोध के अनुसार इनमें सबसे ज्यादा संख्या भारत के लोगों की है। जहां तीस लाख लोगों का जीवन ग्लेशियर से आने वाली बाढ़ के कारण खतरे में है जिससे वैज्ञानिकों में भी ‘ग्लोबल वार्मिंग’ को लेकर चिंता एक बार फिर से बढ़ गई है। ‘न्यू कैसल विश्वविद्यालय’ में किए गए इस शोध के अनुसार ग्लेशियर झीलों की बाढ़ से सबसे ज्यादा खतरे में आने वाले दुनिया के चार देशों को चिन्हित किया गया है। जिसमें भारत, पाकिस्तान, पेरू और चीन जैसे देश शामिल हैं। शोधकर्ताओं की मानें तो भारत में 30 लाख जबकि पाकिस्तान में 20 लाख लोगों पर सबसे ज्यादा खतरा है हांलाकि आइसलैंड में सबसे कम 260 लोगों पर खतरा है।
    ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ की इस रिपोर्ट के अनुसार उपग्रह द्वारा साल 2020 में किए गए अध्ययन में बताया गया है कि 30 वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग 50 प्रतिशत तक बढ़ गई है। जिसके कारण दुनिया भर में फैले ग्लेशियर के रूप में जमी झीलें टुकड़ों में बंट गई हैं। पूर्व औद्योगिक काल से अब तक धरती का तापमान 1.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है लेकिन आश्चर्यजनकजनक रूप से दुनिया में पहाड़ी इलाक़ों में गर्मी दोगुनी बढ़ गई है। अध्ययन में यह भी सामने आया है कि भले ही ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रोक दिया जाए इसके बावजूद धरती के दो लाख 15 हजार ग्लेशियर में से आधे और उनके द्रव्यमान का एक-चौथाई हिस्सा इस सदी के अंत तक पिघल जाएंगे।

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