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अफगानिस्तान में भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षा

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सैन्य शक्ति के बल पर स्थिर, एकजुट और सुरक्षित अफगानिस्तान करना संभव नहीं

पुरुषों के लिए दाढ़ी और महिलाओं के लिए बुर्के की मजबूरी से लेकर टेलीविजन, संगीत व सिनेमा पर ताला और 10 साल से अधिक उम्र की लड़कियों के स्कूल जाने पाबंदी लगा दी। परन्तु 11 सितंबर, 2001 को न्यूयार्क वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद अमेरिका के नेतृत्व में सैन्य गठबंधन ने दिसम्बर 2001 में अफगानिस्तान को तालिबान से मुक्त कर दिया।

डॉ. नवीन कुमार मिश्र, लेखक : भू-राजनीति के जानकार
naveenmishra07@gmail.com


नब्बे के दशक में अफगानिस्तान से सोवियत संघ की सेना के वापस होने के समय धार्मिक मदरसों से सुन्नी इस्लाम की कट्टरता को मनाने वालों को सऊदी अरब की फंडिंग से तालिबान का उभार हुआ जिसका पश्तो भाषा में अर्थ छात्र है। जिसने सन 1996 से 2001 तक अफगानिस्तान की जनता के साथ अमानवीय कृत्य किये। पुरुषों के लिए दाढ़ी और महिलाओं के लिए बुर्के की मजबूरी से लेकर टेलीविजन, संगीत व सिनेमा पर ताला और 10 साल से अधिक उम्र की लड़कियों के स्कूल जाने पाबंदी लगा दी। परन्तु 11 सितंबर, 2001 को न्यूयार्क वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद अमेरिका के नेतृत्व में सैन्य गठबंधन ने दिसम्बर 2001 में अफगानिस्तान को तालिबान से मुक्त कर दिया। इतिहास साक्षी है कि सैन्य शक्ति के बल पर स्थिर, एकजुट और सुरक्षित अफगानिस्तान करना संभव नहीं हुआ है, इसलिए इसे साम्राज्यों की कब्रगाह भी कहा गया। 19वीं सदी में शक्तिशाली रहे ब्रिटेन ने इसे जीतने की कोशिश की लेकिन अफगानिस्तान छोड़कर जाना पड़ा। इसके बाद सोवियत संघ ने वर्ष 1979 में अफगानिस्तान पर आक्रमण किया और समझने में दस साल लगे कि वे ये युद्ध जीत नहीं पायेंगे। आज वर्ष 2021 में वही दृश्य दिख रहा है। अमेरिकी नेतृत्व में वर्षों तक चले युद्ध के बीस वर्ष बाद अमेरिका को अफगानिस्तान से अपनी सेना बुलाना पड़ा।


दोहा में 29 फरवरी 2020 में तालिबान के साथ समझौते के बाद 11 सितंबर, 2021 तक अपने सभी सैनिकों को हटाने के निर्णय के बाद अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान से विदा होने की तैयारी कर ही रहे थे कि तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा करना शुरू कर दिया। कब्जे के बाद बहुत ही सुनियोजित तरीके से गुड तालिबान के रूप में छवि भी प्रस्तुत की गयी जिसमें माफी, शान्ति व महिलाओं के समान अधिकार के साथ सभी मत, पंथों को आजादी रहेगी। परन्तु सक्त शरीयत कानून लागू कर तालिबान ने सभी को पालन करने का फरमान जारी किया और महिलाओं के पोस्टर पर कालिख पोतकर अपनी क्रूरता का अहसास कराया। मोबाइल सेवाओं को बंद कर दिया गया है जिससे उनकी करतूत सामने न आए। काबुल पर तालिबान का कब्जा होने के बाद भारत समेत अधिकांश देशों ने वहां अपने दूतावास बंद कर दिये थे परन्तु तालिबानियों ने कंधार व हेरात में भारतीय वाणिज्य दूतावास पर धावा बोलकर दस्तावेज और कई वाहन उठा ले गए।भारत के साथ उसने अपने सारे व्यापर बंद कर दिये है जो करीब बीस हजार करोड़ का द्विपक्षीय था।


वर्ष 2003 में तालिबान को आंतकवादी संगठनघोषित करने वाले रूस के साथ चीन और पाकिस्तान के दूतावास अब भी खुले हैं जिसकी सुरक्षा तालिबानी कर रहे है। अमेरिकी को प्रभावहीन करने के लिए रूस तालिबान की मदद कूटनीतिक ही नहीं बल्कि आर्थिक और इंटेलीजेंस से भी कर रहा है। दक्षिण एशिया,मध्य पूर्व और पूर्वी यूरोप में उसके अपने हित है। रूस तालिबान को अपने यहां और मध्य एशिया में पृथकतावादियों और आतंकवादियों को समर्थन न देने व इस्लामिक स्टेट को उत्तर अफगानिस्तान तक पहुंचे से रोकना चाहता है। वर्ष 1998 में उत्तरी शहर मज़ार-ए-शरीफ में तालिबान ने एक ईरानी पत्रकार समेत आठ ईरानी राजनयिकों की हत्या की थी, बावजूद इसके ईरान ने तालिबान से संबंध बेहतर करने की कोशिश की है। साथ ही वर्ष 2018 में पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उसने तालिबान के प्रतिनिधिमंडल की मेजबानी भी की है। ईरान का तालिबान सहयोग ब्रिटेन और अमेरिका से प्रभावित होता आया है।

अफगान शरणार्थी की संख्या को अपनी सीमा पर पहुँचते ही उज्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान शरणार्थियों के प्रति सख्त हुए हैं जबकि तुर्कमेनिस्तान तालिबान से संबंध मजबूत करने में लगा है। तुर्की नेटो का सदस्य होने के कारण नेटो सेना के अभियानों का समर्थन किया है जबकि तुर्की के सैनिक अफगानिस्तान में मौजूद नहीं रहे। तुर्की के पाकिस्तान के साथ और पाकिस्तान के तालिबान के साथ करीबी संबंध हैं। ऐसे में तुर्की की भूमिका अफगानिस्तान में अहम हो सकती है। 1980-90 के दशक में सऊदी अरब ने रूस के खिलाफ अफगान मुजाहिदीन का समर्थन किया था लेकिन मौजूदा संकट में अपने आप को अलग कराते हुए तालिबान से भी संबंध बनाए रखा हैं। संयुक्त अरब अमीरात ने भी अपने आप को मौजूदा अफगानिस्तान संकट से दूर ही रखा था परन्तु राष्ट्रपति अशरफ गनी को शरण देने में कोई झिझक नहीं किया। कतर मुस्लिमों का एक छोटा सा देश है, जहां तालिबान का राजनीतिक ठिकाना है। वर्ष 2020 में कतर में तालिबान के साथ हुए समझौते के तहत ही अमेरिका अफगानिस्तान से बाहर निकल रहा है।


पाकिस्तानी मदरसों से निकले तालिबानियों के साथ पाकिस्तान की आईएसआई भी लड़ रही थी। साथ ही पाकिस्तान ने एक तरफ अफगानिस्तान से सैनिकों की वापसी में अमेरिका का साथ दिया और अब वो चीन का साथ देते हुए तालिबान को मान्यता देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। चीन का तालिबान को समर्थन देने के पीछे उसके आर्थिक-रणनीतिक हित छिपे हैं क्योकिं चीन की रोड एंड बेल्ट परियोजना के लिए तालिबान से अनुकूल माहौल और एनक कॉपर माइन और अमू दरिया एनर्जी जैसे निवेश अफगानिस्तान में किये हैं। चीन ने तालिबान के प्रतिनिधिमंडल के साथ चीन विरोधी आतंकवादी संगठनईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट से संबंध तोडऩे की बात कहीं।

चीन अफगानिस्तान में आर्थिक रूप से सीमित है परन्तु अफगानिस्तान में प्राकृतिक संसाधनों में मेस अयनक का तांबा,कोबाल्ट,कोयला और लौह अयस्क के साथ तेल,गैस और कीमती पत्थर तथा लिथियम की मौजूदगी (जो अफगानिस्तान को लिथियम का सऊदी अरब बना सकता है) के साथ अफगानिस्तान की सीमाएं पाकिस्तान, ईरान, ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान से लगती हैं। इन सबको देखते हुए भविष्य में चीन की सामरिक व भू-राजनीतिक सक्रियता बढ़ सकती है।


तालिबान के साथ युद्ध में अफगान के राष्ट्रपति अशरफ गनी के देश छोडऩे के बाद उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह ने तालिबान के खिलाफ पंचशीर की घाटी से लड़ाई जारी रखा है। फिलहाल तालिबान का देश के सभी महत्वपूर्ण सीमा मार्गों पर कब्जा है। अमेरिका अफगानिस्तान से हट गया है परन्तु पाकिस्तान, रूस और ईरान चीन के साथ हैं। इन सारी परिस्थितियों के बीच किसी भी अन्य देश से बेहतर भारत के संबंध अफगानिस्तान से रहे है। विकास कार्यों से अफगानिस्तान के आम जन मानस में भारत के प्रति प्रेम व आदर का भाव है। ऐसे में वेट एंड वॉच की नीति के तहत भारत को अफगानिस्तान मामले में अपनी सॉफ्ट पावर के तहत स्वतंत्र रूप से अफगान नीति को मूर्त रूप देना होगा।

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