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समलैंगिक विवाह एक मानसिक बुराई

  • प्रमोद भार्गव
    इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि अदालतों में जब लाखों प्रकरण लंबित बने रहने का रोना रोया जा रहा हो, तब देश की शीर्ष न्यायालय के न्यायमूर्तियों की पीठ एक ऐसे मुद्दे की माथापच्ची में लगी हो, जिसका वैवाहिक समानता के अधिकार से कोई सीधा वास्ता ही नहीं है। वास्तव में भारत में प्राचीन काल से चली आ रही, विवाह की जो अवधारणा है, उसके अंतर्गत एक जैविक पुरुष और जैविक स्त्री अर्थात विपरीत लिंगियों के बीच विवाह संपन्न होता है। यह मान्यता वयस्क स्त्री-पुरुष के बीच शारीरिक संबंध को सामाजिक मान्यता देती है। इस सर्वमान्य परंपरा में धर्म कर्तव्य के रूप में रति-सुख नैसार्गिक काम-भावना की तृप्ति के रूप में और इसी के प्रतिफल के रूप में जैविक संतान की प्राप्ती है। हिंदू विवाह संस्था की यह सामाजिक संरचना को बनाए रखने का व्यावहारिक और विधि-सम्मत संहिता है। अतएव कहना पड़ेगा कि भारतीय समाज और कानून लैंगिक मुद्दों पर स्पष्ट रुख रखता है। धर्म इसे केवल सामाजिक स्वीकार्यता देता है, जबकि वास्तव में यह संस्कार प्रकृति की ही एक शारीरिक अवस्था है। नृतत्वशास्त्रियों और प्राणीविदों के अनुसार विपरीत लिंगी मानव समुदाय में यौन संबंधों की शुरुआत बिना किसी सामाजिक संस्कार अथवा बिना विवाह के हुई थी। वैदिक युग में नारियों को अनेक पुरुषों से यौन संबंध बनाने की स्वतंत्रता थी। किंतु विकसित हो रही सभ्यता को एक संहिता से बांधने और संतान के जैविक पिता की निश्िचतता को बनाए रखने की दृष्िट से उद्दालक ऋषि के पुत्र श्वेतकेतु ने चली आ रही सामाजिक स्वीकार्यता को अस्वीकार कर स्त्री-पुरुष को सात वचनों के साथ लिए सात फेरों के माध्यम से परिणय बंधन में बांधा। ये सात वचन परस्पर एक-दूसरे के प्रति समर्पित रहते हुए कर्तव्य पालन से जुड़े है। अब इस सांस्कृतिक व्यवस्था को कथित बौद्धिक ध्वस्त करने के उपक्रम में लगे हैं। विवाह टूटा तो परिवार की इकाई भी टूट जाएगी। परिवार नियंत्रण की अवधारणा को अपनाकर कौटुंबिक सामुदायिकता को तो हम पहले ही बीती सदी में समाप्त कर चुके हैं। समलैंगिक विवाह को मान्यता देने के नजरिए से हिंदू विवाह अधिनियम 1955 और विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत सर्वोच्च न्यायालय में 2020 में दायर याचिकाओं पर नियमित सुनवाई प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की पांच सदस्यीय पीठ में चल रही है। जबकि यह समझ से परे है कि आखिर इस गैर जरूरी और अप्राकृतिक संबंधों को वैधता देने की जल्दी में अदालत क्यों है ? जिस देश में उच्च आदर्श नैतिक मूल्यों को दुनिया अपनाने को आतुर रहते हुए अपनी सामाजिक व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने में लगी है, तब चंद कुलीन तबके के ‘गे‘ और ‘लैस्बियन‘ की अप्राकृतिक स्थिति को वैवाहिक मान्यता की तत्परता क्यों? इस कड़ी की पहली बाधा न्यायालय भारतीय दंड संहिता की धारा-377 को अपराध के दायरे से 2018 में ही बाहर कर चुका है। हालांकि इस फैसले के समय यह दलील दी गई थी कि एक विशेष मानवीय व्यवहार को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया है। इस आदेश में न तो समलैंगिक विवाह का उद्देष्य अंतर्निहित है और न ही इस आचरण को वैध बनाने की मंशा है।

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