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अध्यात्म से चैतन्य की ओर

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  • जो लोग अपनी धार्मिकता की भावना में इतने लीन हो जाते हैं कि वे सत्य और यथार्थ से अनभिज्ञ हो जाते हैं, वे भी अज्ञानता में लुप्त हो जाते हैं।
  • प्रो. हिमांशु राय, निदेशक, आईआईएम इंदौर

हमारे आसपास मौजूद सब कुछ – हर वस्तु, हर प्राणी, यह वातावरण, यह सब जिसे हम ‘प्रकृति’ कहते हैं, यह परम चेतना (सर्वशक्तिमान) के दृढ़ संकल्प से ही अस्तित्व में है और सदैव रहेगी। हम चाहें तो इसका उपयोग वैराग्य और निष्पक्षता की भावना के साथ कर सकते हैं, क्योंकि इस पर किसी का स्वमित्व नहीं है। शुक्ल यजुर्वेद के अंतिम पाठ, सबसे छोटे लेकिन मुख्य उपनिषद ईश उपनिषद, जिसे इशोपनिषद्भी कहा जाता है,में स्पष्ट किया गया है, कि जो हमारा नहीं है, उसकी आकांक्षा या लालसा होनी ही नहीं चाहिए।

हम मात्र कर्म करें – फल की इच्छा किए बगैर, और इस तथ्य को भी आत्मसात करें कि हमारे कर्मों के फलों पर भी मात्र हमारा अधिकार नहीं है। यह भी सत्य है, कि हमारे कार्यों से भिन्न प्रभावों वाले कई प्रतिफल भी सामने आएंगे, जिनके लिए हम ही जिम्मेदार होंगे। मात्र चिंतन और निष्क्रियता से फल प्राप्त नहीं होंगे। ये सिर्फ कार्य में बाधा बनते हैं, क्योंकि ये हमें उन जिम्मेदारियों से दूर करते हैं जिन्हें पूरा करना हमारा कर्तव्य है वे उत्तरदायित्व जो हमें हमारे सर्वशक्तिमान ने सौंपे हैं।

हमारा मुख्य लक्ष्य वैराग्य और निष्पक्षता की भावना के साथ, चिंतन करने के बाद कार्य करना होना चाहिए। इशोपनिषद् में यह भी उल्लेखित है कि अभिलाषाएं, इच्छाएं एवं लालसा आपको विषयासक्त सुखों की प्राप्ति के लिए उत्तेजित करके आपकी अंतरात्मा को भ्रष्ट और धूमिल कर देती हैं। आपका विवेक आपकी अंतरआत्मा का प्रतिबिंब है। जब आप अपने विवेक द्वारा निर्देशित मार्ग से भिन्न दिशा की ओर आकर्षित होने लगते हैं तो आप निश्चित ही विनाश और विघात की ओर बढऩे लगते हैं। इसी प्रकार,मोह के विषय में वर्णित है कि मोह वह है जो आपको चेतना के मार्ग से दूर ले जाता है, और अंतरात्मा वह आंतरिक आवाज, वह ध्वनि है जो आपको उस स्थिति से दूर ले जाती है जो आपको भयभीत करती है, और जो संदिग्ध और लज्जाजनक हो सकती है।

संहिता से सम्बंधित इस एकमात्र उपनिषद ने यह भी स्पष्ट किया है कि अतिचेतना सर्वभूत है, सर्वव्यापी है, और इसलिए यह एक क्षण अगर गतिहीन है, तो अगले ही पल गतिमान भी हो जाती है। इसे इंद्रियों द्वारा नियंत्रित नहीं किया जा सकता है और यह सर्वज्ञ है। यह वह है जो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के पांच तत्वों में व्याप्त है। अत: गहरी अंतर्दृष्टि और अतिचेतना के माध्यम से, प्रकृति में इस विविधता की अभिव्यक्ति को देखा जा सकता है। चेतना का शुद्धतम स्वरुप है परम चैतन्य। इसका कोई भौतिक रूप नहीं है और न ही यह दूषित है यह पूर्णत: पवित्र है।

ब्रह्मांड का अस्तित्व इसी से है,किन्तु इसका अस्तित्व किसी पर भी निर्भर नहीं है। यह अमर है, चिरस्थायी है, और इस ब्रह्मांड को वैसा ही बनाता है जैसा इसे होना चाहिए। जो इस सत्य से परिचित नहीं हैं और भौतिक सुखों की तलाश करते हैं, या इसे भौतिक रूप में देखते हैं, वे अन्धकारमय जीवन व्यतीत करते हैं। हालांकि, जो लोग अपनी धार्मिकता की भावना में इतने लीन हो जाते हैं कि वे सत्य और यथार्थ से अनभिज्ञ हो जाते हैं, वे भी अज्ञानता में लुप्त हो जाते हैं। बौद्धिक दंभ का अन्धकार तो भौतिकवादी अज्ञानता से भी हानिकारक होता है।

जो व्यक्ति कर्म से रहित केवल चिंतन के मार्ग पर चलते हैं, उन्हें कभी सफलता प्राप्त नहीं हो पाती क्योंकि वे अपने धर्म की प्रकृति को देखने और उसका महत्व समझने में सदा विफल रहते हैं,और इसलिए आध्यात्मिकता से भी अनभिज्ञ होते हैं। जो व्यक्ति सही और गलत, सत्य और मिथ्या, और ज्ञान और अज्ञान के बीच अंतर करना जानते हैं, वही मोक्ष प्राप्त करते हैं। जो व्यक्ति प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष (एकता) के बीच के अंतर को समझते हैं, वे मोक्ष प्राप्त करते हैं और साथ ही,सर्वोच्च चेतना भी प्राप्त कर पाते हैं। जो मात्र स्वयं के बारे में और अपनी इच्छाओं के बारे में विचार करते हैं, उन्हीं पर केन्द्रित होते हैं,वे अज्ञानता के जाल में में बंधे रहते हैं। साथ ही,जो बिना विवेक के सामूहिक विचार धारा का पालन करते हैं वे अधिक अज्ञानी हैं।

सत्य को समझने के लिए आपको प्रकृति से परे देखना होगा। आत्मा की अमरता का एहसास करने के लिए आपको भौतिक शरीर से भी आगे का विचार करना होगा। सत्य को समझने के लिए आपको परम चेतना को प्राप्त करना होगा।

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