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प्रवाह: अस्तित्व और आत्मविश्लेषण

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प्रो. हिमाँशु राय, निदेशक, आईआईएम इंदौर

हमारे आसपास सभी लोगों के साथ हमारे सम्बन्ध, हमारी संपत्ति, हमारी चीज़ों से हमारा लगाव, इस समय, इस पल से हमारा जुड़ाव – ये सभी बातें ज़ाहिर करती हैं कि हमारी सम्पूर्ण दुनिया रिश्तों पर निर्भर है – यह एक रिश्तों का मिश्रण है, एक जाल समान है और यही हमारी पहचान हैं। लेकिन हम में से शायद ही कोई यह जानने और समझने की आवश्यकता महसूस करता है कि आखिर यह वास्तविक दुनिया हमारे लिए क्या मायने रखती है। हम इस गहराई तक पहुँचने का प्रयास नहीं कर पाते। अंतत:यह हमारे स्वयं के साथ संबंध को समझने के लिए भी बेहद आवश्यक है
स्वयं को खोजने की यह यात्रा शनै:-शनै:, एक-एक क्षण आगे बढती है। इसमें संघर्ष के पल तो हैं ही, लेकिन अप्रतिम शांति भी है।

अंतर्मन को प्रतिबिंबित करती इस खोज को हम स्वयं के विकास या संवृद्धि के रूप में भी परिभाषित कर सकते हैं – यह हमारे विकास औरहमारी आत्मा को समझने, और अंतर्मन की खोज की यात्रा का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है।यह हमें जागृत करता है स्वयं के अस्तित्व पर प्रश्न उठाने के लिए; जिज्ञासु बनाता है हमें अपनी प्रकृति के संपर्क में आने के लिए,और फिर इससे हम हमारी भावनाओं और स्थितियों के प्रति प्रतिक्रियाओं के संबंध में हमारे कार्यों को समझते हैं, उनका आंकलन कर सकते हैं।समझ पाते हैं कि मैं कौन हूँ? मेरा अस्तित्व क्या है? मेरे इस जीवन का उद्देश्य क्या है?

ये सर्वोत्कृष्ट प्रश्न हैं जो हमारे जीवन के प्रत्येक चरण में हमारे सामने खड़े होते हैं। सामान्यत:हम इन्हें अपनी दार्शनिक मनोदशा का परिणाम समझ कर नजरंदाज करने का निर्णय लेते हैं। लेकिन कभी-कभी, हम अपनी वास्तविकता की सीमाओं से परे, असीम अनुभवों की तलाश करके इनका उत्तर खोजने का प्रयास करते हैं। लेकिन फिर एक बार जब उत्साह शांत हो जाता है, तो यह प्रश्न हमें फिर से चिंतित करता है, कि ‘मैं कौन हूँ’। कभी-कभी इसमें प्रसन्नता या संघर्ष भी क्षणिक होती है। लेकिन हमारी जिज्ञासा, हमारे विचार, हमारी इच्छा यही है कि हम इस जीवन में जो भी भूमिका निभाते हैं, उससे परे हम स्वयं को समझ सकें । समझ सकें कि इस दुनिया के समक्ष हमने जो विभिन्न रूप धारण किए हैं, जो मुखौटे पहन कर हम जी रहे हैं, उन्हें हटाकर अन्तर्मन में झाँक सकें।और इस जिज्ञासा को कोई भी औचित्य रोक नहीं पाता, शांत नहीं कर पाता, संतुष्ट और तृप्त नहीं कर पाता।

अत: जो भी हम देखते हैं याअनुभव करते हैं; जो भी हमारा है और जो भी कार्य हम करते हैं; अलग-अलग परिस्थिति में हम कौन हैं; हम उन लोगों के साथ कैसे हैं जो हमसे प्रेम करते हैं या जिन्हें हम चाहते हैं; जो हमारी देखभाल करते हैं या हम पर निर्भर हैं;या हम इस समाज में अपनी भूमिकाओं को कैसे निभाते हैं – ये सभी प्रश्न हमारे उसी दार्शनिक चिंतन का हिस्सा हैं। कई सिद्धांतों और मतों ने इस प्रश्न का उत्तर देने का भी प्रयास किया है कि ‘मेरे जीवन का उद्देश्य और अर्थ क्या है?’ ख़ास बात यह है, कि प्रत्येक मत एक ‘सम्मोहक’ परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है।

कम से कम यह उस स्थान और समय के लिए तो सम्मोहक है ही, जिसमें हम आगे बढ़ते हैं, विकास करते हैं। जीवन में अर्थ या उद्देश्य का अभाव हमारे सभी प्रयासों को दिशाहीन कर देता है। भारतीय शास्त्र में ‘स्वधर्म’ का उल्लेख है, जो एक जिम्मेदारी है, एक कर्तव्य है और एक अच्छा कर्म है- और चूँकि एक व्यक्ति एक कार्य में अच्छा है, वह कर्म करना, उसका पालन करना उस व्यक्ति कि ही जिम्मेदारी बन जाती है! यह एक व्यक्ति की क्षमता का बोध है (आत्म-साक्षात्कार) और फिर उसी क्षमता के आधार पर कोई भी कार्य करना है।

कुछ विद्वानों ने इसे ‘प्रकृति’ और ‘वर्ण’ (प्रकृति के विस्तार/प्रतिनिधि के रूप में) से जोडऩे का प्रयास किया है।हालाँकि, वर्ण की बारीकियों को समझने के लिए उसके आकृति विज्ञान को समझना होगा। मूल रूप से, वर्ण व्यवस्था व्यक्ति की शक्ति और क्षमता को समझने और उन्हीं शक्तियों को अपना व्यवसाय बनाने में मदद करने और प्रोत्साहित करने के बारे में थी-और जैसा कि हम आम तौर पर जानते हैं, यह जन्म के आधार पर तय होता था । इन सवालों के जवाब खोजने के लिए एकमात्र आधार है ‘चाह’ । अगर आपके मन में इच्छा है, जिज्ञासा है, उत्सुकता है तो आप निश्चित ही आत्मनिरीक्षण कर सकेंगे और अपने उत्तर प्राप्त कर सकेंगे ।

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