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प्रवाह : अंतरात्मा और अध्यात्म

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प्रो. हिमाँशु राय, निदेशक, आईआईएम, इंदौर

आइए, आज हम आध्यात्मिकता पर अंतर्दृष्टि के लिए वेदों पर एक नजर डालते हैंक्योंकि वे दुनिया के सबसे पुराने लिखित ग्रंथ हैं;और इसलिए भी,क्योंकि अधिकांश विद्वान इस बात से सहमत हैं कि वेदों का पाठ प्रकृति में सार्वभौमिक है और किसी विशिष्ट पंथ या समूह से सम्बंधित नहीं है । वेद मूल शब्द ‘विद्’ से बना है जिसका अर्थ है ज्ञान; और भारतीय विद्या के अनुसार, यह आदिकाल से एक अलिखित, शाश्वत और परिपूर्ण रूप में अस्तित्व में रहा है। इस ज्ञान ने भारतीय दर्शन की नींव बनाई है और यह चार अलग-अलग वेदों में संगठित है: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।इन चारों वेदों में विभिन्न प्रकार के साहित्य शामिल हैं।

विशेष रूप से, यजुर्वेद का अध्याय 40 अपने 17 मंत्रों (स्त्रोत्र) के माध्यम से आध्यात्मिकता की समझ में समृद्ध अंतर्दृष्टि प्रदान करता है, जो दर्शन पर एक भारतीय पाठ – ईशोपनिषद का एक हिस्सा भी है। इन 17 मंत्रों की एक विस्तृत श्रृंखला गीता में एक पाठ के रूप में भी शामिल है, जो भारतीय दर्शन का मूल ग्रन्थ है।

अध्यात्म के लिए संस्कृत शब्द ‘अध्यात्म’ या ‘आध्यात्मिकता’ है। अध्यात्म शब्द दो शब्दों के मेल से बना है: अधि और आत्मा। अधि का अर्थ है सशक्तिकरण और आत्मा का अर्थ प्राण, उच्चतर जीव या अंतरात्मा हो सकता है। अध्यात्म का निहित अर्थ वह सब है जो आत्मा के सशक्तिकरण द्वारा किया जाता है,यानि वे सभी कार्य या विचार, जिनके लिए आत्मा या अंतर्मन अनुमति देता है।

अत: इस सन्दर्भ में आत्मा शब्द का अर्थ अंतरात्मा से ज्यादा मेल खाता है । इसी प्रकार, अध्यात्म का अर्थ इसी अंतरात्मा का विकास होगा। शास्त्र के अनुसार यह अंतरात्मा लोगों में स्वयं को और जीवन में उनके उद्देश्य को समझने से विकसित होती है। लोगों को अपने आस-पास के इस वातावरण, इस विश्व के साथ अपने संबंधों के साथ-साथ इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड और स्वयं के प्रति अपने दायित्वों को समझने की भी आवश्यकता है। अत: लोगों को इस विकसित अंतर्मन, इसी अंतरात्मा के मार्गदर्शन में कार्य करना चाहिए।

और इसलिए,मेरा मानना है कि यहीं, इसी स्तर पर, पंथ और आध्यात्मिकता के बीच अंतर पाया जाता है। पंथ व्यक्तियों में तनाव को कम करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है; लेकिन आध्यात्मिकता ‘उस अंतरात्मा की आवाज’ है जो हमें उस दिशा में ले जाती है जो हमारे साथियों, हमारे आसपास के सभी लोगों के लिए अच्छी है- यानि सामान्य भाषा में, वह सब कुछ जो हमें बेहतर इंसान बनाता है ।

आध्यात्मिकता को उच्च शक्तियों/उच्च जीव से संबंधित रूप में पेश करना इसे नास्तिकों और अन्य लोगों की समझ से परे कर देता है जो स्वयं के अलावा किसी उच्च शक्ति के अस्तित्व में विश्वास नहीं कर पाते हैं। यहां नैतिकता का परिचय इसे अन्य सामाजिक और सांस्कृतिक चरों पर भी निर्भर बना देगा जो आध्यात्मिकता में ‘आत्मा’ को बढ़ावा देते हैं । इसलिए यह आवश्यक है कि या तो इन वैचारिक दूषितताओं का समाधान ढूँढा जाए या उन्हें पूरी तरह हटा दिया जाए।

इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, मैं आध्यात्मिकता की निम्नलिखित परिभाषा का प्रस्ताव करता हूं : ‘स्वयं की अंतरात्मा का विकास करना, जीवन में अपने उद्देश्य को समझना, और अपने आसपास के इस ब्रह्मांड (और दायित्वों के विस्तार) के साथ अपने संबंध के माध्यम से स्वयं को समझना ।’ इस परिभाषा को विकसित अंत:करण में एक व्यक्ति द्वारा उसकी अंतरात्मा, उसके अंतर्मन के अनुसार कार्य करने को भी शामिल कर विस्तारित किया जा सकता है ।

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