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मंत्रिमण्डल का भयमुक्त विस्तार

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  • फेरबदल में संदेश दिया है कि आज के बाद से सरकार का स्वरूप तो बदल ही गया है, कार्यशैली भी बदलेगी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बड़े फेरबदल में यह संदेश भी दिया है कि आज के बाद से सरकार का स्वरूप तो बदल ही गया है, कार्यशैली भी बदलेगी। इसीलिए सभी मंत्रियों को संदेश दे दिया कि 15 अगस्त तक उन्हें दिल्ली में ही रहकर सरकार अनुशासन के साथ विकास की अवधारणा को फोकस करते हुए अपनी क्षमता की परीक्षा देनी होगी। जिससे अवाम में यह संदेश पहुंचे कि यह सरकार अवाम के लिए है। इस मंशा की प्रतिपूर्ति के लिए मोदी ने दिग्गज केंद्रीय मंत्रियों से इस्तीफा लेने में कोई संकोच नहीं किया।

  • प्रमोद भार्गव

जब कोई नई सरकार बनती है, तो जनता के प्रति यह भरोसा जताती है कि भयमुक्त शासन-प्रशासन देने के लिए वह प्रतिबद्ध है। चूंकि नरेंन्द्र मोदी सरकार ने अब तक सात साल दो माह का कार्यकाल पूरा कर लिया है, इसलिए उसे इस तरह का थोथा आश्वासन जताने की जरूरत नहीं रह गई थी। मोदी की कार्यप्रणाली एवं कार्य संस्कृति से जनता बखूबी रूबरू हो चुकी है। अलबत्ता, मोदी ने उन दल और नेताओं को जरूर आईना दिखाया है, जो दंभ और धमकी का पर्याय बन सरकार को चुनौती पेश करते रहे हैं। छत्तीस नए चेहरों के साथ कुल तैंतालीस मंत्रियों की शतरंजी यह बिसात इस बात का संकेत है कि हर चुनौती व चेतावनी का सामना करते हुए सरकार महामारी, अर्थव्यवस्था और बेरोजगारी के हर मोर्चे से मुकाबला करने में सक्षम है।

अक्सर अपने फैसलों से सबको चौंंकाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बड़े फेरबदल में यह संदेश भी दिया है कि आज के बाद से सरकार का स्वरूप तो बदल ही गया है, कार्यशैली भी बदलेगी। इसीलिए सभी मंत्रियों को संदेश दे दिया कि 15 अगस्त तक उन्हें दिल्ली में ही रहकर सरकार अनुशासन के साथ विकास की अवधारणा को फोकस करते हुए अपनी क्षमता की परीक्षा देनी होगी। जिससे जनता में यह संदेश पहुंचे कि यह सरकार अवाम के लिए है। इस मंशा की प्रतिपूर्ति के लिए मोदी ने दिग्गज केंद्रीय मंत्रियों से इस्तीफा लेने में कोई संकोच नहीं किया।

फेरबदल के इस चक्र में कानून एवं आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद, सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन, शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक, रसायन एवं उर्वरक मंत्री सदानंद गौड़ा, श्रममंत्री संतोष गंगवार आकर बाहर हो गए। वहीं राज्यमंत्रियों में रतनलाल कटारिया, संजय धोत्रे, देबोश्री चैधरी, बाबुल सुप्रियो, और प्रताप सारंगी को इस्तीफा देना पड़ा। फेरबदल का यह मंथन मई में संघ के नए सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले की प्रधानमंत्री के साथ हुई बैठक में शुरू हो गया था। केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत को कर्नाटक का राज्यपाल बनाए जाने के साथ ही यह उम्मीद बढ़ गई थी कि होसबाले और मोदी के बीच जो मंथन हुआ है, उसके परिणाम आने लगे हैं।

रविशंकर मंत्री होने के साथ सरकार के प्रवक्ता भी थे, लेकिन सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर कोरोना की दूसरी लहर और पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम के बाद सरकार की जो फजीहत हुई, इसे रविशंकर संभाल नहीं पाए। सोशल मीडिया के परिप्रेक्ष्य में दिशा निर्देश पर विवाद से देश की वैश्विक स्तर पर भी छवि धूमिल हुई। नतीजतन विदेश निवेश पर रुकावट आने लगी थी। कुल मिलाकर यह स्थिति पीएमओ को रास नहीं आई, इसलिए रविशंकर को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा।

हर्षवर्धन की बेदखली आयुर्वेद और ऐलोपैथी के बीच बाबा रामदेव के कारण छिड़ा द्वंद्व माना जा रहा है। हर्षवर्धन कोरोना से उपजी नकारात्मकता का भी कोई कारगर प्रति उत्तर नहीं दे पाए। गोया, इलाज में आई गफलत और कोरोना से हुई मौतों से सरकार की छवि खराब हुई। नतीजतन हर्षवर्धन बाहर कर दिए गए। देबाश्री व सुप्रिया बाबुल बड़बोलेपन और बंगाल में पार्टी के इच्छानुसार परिणाम नहीं दे पाने के कारण बाहर किए गए। जिस सादगी के बूते ओडिशा से सांसद प्रतापचंद्र सारंगी मंत्री बनाए गए थे, वह सादगी मंत्रालय के वैभव को रास नहीं आई, अतएव सारंगी ने दफ्तर जाने की जिम्मेवारी को नहीं समझा। नतीजतन कार्य बाधित होते रहे, जिसका परिणाम विस्थापन के रूप में पेश आया। साफ है, दिग्गज माने जाने वाले कद्दावर नेताओं को बाहर करने में मोदी के चेहरे पर कोई शिकन नहीं आई है।

नए मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने वाले मंत्रियों में पुकारा जाने वाला पहला नाम महाराष्ट्र के मराठा नेता नारायण राणे का था। इस तेजतर्रार नेता को मंत्री बनाने के साथ भाजपा ने शिवसेना को संदेश दिया है कि शिवसेना का गढ़ माने जाने वाले कोंकण क्षेत्र में भाजपा ने जवाब तलाश लिया है। राणे शिवसेना की ही पाठशाला से एक शिवसैनिक के रूप में निकले हैं। शिवसेना के संस्थापक बालासाहब ठाकरे के वे अत्यंत नजदीक रहे हैं। इसलिए जब महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन की पहली सरकार बनी थी, तब मनोहर जोशी के बाद राणे छह माह के लिए मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन दोबारा उन्हें एक तो मुख्यमंत्री बनने का अवसर नहीं मिला, दूसरे उद्धव ठाकरे से छत्तीस का आंकड़ा बन गया। आखिरकार अपने उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ वे कांग्रेस में जा मिले। वहां भी उन्हें अपेक्षित सम्मान नहीं मिला। अंतत: राणे भाजपा की शरण में आ गए और मंत्री भी बन गए।

2019 में लोकसभा का चुनाव हारने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया अस्तित्व के संकट से जूझ रहे थे। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह से भी उनकी पटरी मेल नहीं खा रही थी। सो, सिंधिया ने बड़ा राजनीतिक दांव भाजपा के साथ सांठगांठ कर खेल लिया। कमलनाथ की सरकार गिराकर शिवराज सिंह चैहान को फिर से मध्य-प्रदेश का मुख्यमंत्री बनवा दिया। इस दांव को चलने के बदले में उन्हें तत्काल राज्यसभा का सदस्य तो भाजपा ने बनाया ही, अब सरकार गिराने का इनाम केंद्रीय मंत्री बनाकर दे दिया। इसी तरह जितिन प्रसाद को भी मंत्री बनाया गया है। वे कांग्रेस से भाजपा में आए हैं। राणे, सिंधिया और जितिन को मंत्री बनाकर भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने यह संदेश दिया है कि जो भी विपक्षी दलों का नेता उनसे हाथ मिलाएगा, उसे समय पर उचित व अपेक्षित सम्मान दिया जाएगा। एक तरह से यह संदेश सचिन पायलट जैसे उन नेताओं के लिए है, जो अपने मूल दल में अनिश्चितता की छटपटाहट से गुजर रहे हैं।

यह विस्तार इसलिए भी भयमुक्त है, क्योंकि इस फेरबदल में किसी भी धमकी की परवाह नहीं की गई। दरअसल विस्तार की खबरों के साथ ही, यह बात चर्चा में थी कि लोक जनशक्ति पार्टी से निष्काषित सांसद पशुपति पारस को मंत्रिमंडल में जगह दी जा सकती है। रामविलास पासवान के निधन के बाद से ही लोजपा के लिए पद रिक्त था। पारस का नाम आते ही चिराग पासवान ने धमकी दी थी कि पारस को मंत्री बनाया गया तो उन्हें अदालत की शरण में जाना होगा, क्योंकि पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष मैं हूं और समर्थन भी मेरे पास है। लिहाजा पार्टी के कोटे से जो नाम मैं प्रस्तावित करूं उसे ही मंत्री पद की शपथ दिलाई जाए।Ó राजनीतिक हलकों में चिराग की सीधे तौर पर इसे प्रधानमंत्री को चुनौती माना गया। लेकिन मोदी ने धमकी को दरकिनार करते हुए हाजीपुर से लोजपा के सांसद पशुपति पारस को मंत्री बना दिया। रिश्ते में पारस, चिराग के चाचा हैं।

नरेंद्र मोदी ने मंत्रिमंडल को हर स्तर पर संतुलित रखने और यहयोगी दलों को महत्व देने की कोशिश की है। शिवसेना और अकाली दल के राजग गठबंधन से बाहर होने के बाद केवल आरपीआई ही सरकार में भागीदार थी। अब बिहार से जदयू, लोजपा और उत्तर-प्रदेश से अपनादल की अनुप्रिया पटेल को भी सरकार में हिस्सेदारी दी गई है। 2022 में उत्तर-प्रदेश और गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनाव का इस फेरबदल में विशेष ध्यान में रखा गया है। इसलिए सात नए सांसदों को प्रतिनिधित्व देकर उत्तरप्रदेश से अब 14 मंत्री हो गए हैं। प्रधानमंत्री समेत 15 सांसद मंत्री हैं। साथ ही यह ध्यान भी रखा गया है कि राज्य के हर क्षेत्र को प्रतिनिधित्व तो मिले ही जातीय समीकरण भी भाजपा के अनुकूल रहे। गोया, पूर्वांचल, अवध, ब्रज, बुंदेलखंड, पश्चिमी क्षेत्र और हरित प्रदेश के सांसदों को सरकार में शामिल किया है। इसी तरह गुजरात से पांच सांसदों को मंत्री बनाया गया है।

ऐसा माना जाता है कि नरेंद्र मोदी के पक्ष में महिलाएं ज्यादा मतदान करती हैं। इस नजरिये से जाति और धर्म का वांछित समन्वय बिठाया है। गोया, 5 महिलाएं अल्पसंख्यक वर्गों से मंत्री बनाने के साथ, ब्राह्मण, भूमिहार, कायस्थ, क्षत्रीय, पटेल लिंगायत, मराठा और रेड्डी जातियों से भी महिलाएं मंत्री बनाई गई हैं। इस जंबों मंत्रिमंडल में 12 दलित और 8 आदिवासी मंत्री हैं। दलित व वंचित को प्रतिनिधित्व देकर मायावती के प्रभुत्व को कमजोर करने की कोशिश है।

पिछड़ा वर्ग से कुल 27 मंत्री हैं। उत्तर-प्रदेश और बिहार में राजनीति के केंद्र में पिछड़े हैं। इसलिए यह लालू और मुलायम की बची-खुची विरासत को खत्म करने का उपाय है। साफ है, जिस सोशल इंजीनियरिंग की शुरूआत मायावती ने उत्तर-प्रदेश में और नीतीश कुमार ने बिहार में की थी, उसका विस्तार भाजपा ने पूरे देश में कर दिया है। यह समीकरण उन्हें अचरज में डालने वाला है, जो भाजपा को सवर्णों की पार्टी मानकर चल रहे हैं। अब भविष्य में देखने वाली बात यह होगी कि जातियों की यह गोलबंदी समन्वय का पर्याय बनती हुई विकास के मार्ग पर कितनी खरी उतरती है। दरअसल कोरोना के इस भयावह संक्रमण काल में, कोरोना से संपूर्ण मुक्ति तो चुनौती है ही, अर्थव्यवस्था को गति और नए रोजगार सृजित करना भी बड़ी चुनौती है।
(लेखक, साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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